यूरोप के केंद्र में आल्प्स की खूबसूरत वादियों में बसे अनोखे देश लिकटेंस्टीन के कार्यवाहक राष्ट्रप्रमुख प्रिंस एलॉइस रविवार को चार दिनों के आधिकारिक दौरे पर भारत पहुंचे। उनके साथ उनकी धर्मपत्नी प्रिंसेस सोफी और प्रमुख उद्योगपतियों का एक बड़ा व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भी आया है। अपनी इस महत्वपूर्ण यात्रा के दौरान वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के साथ व्यापक द्विपक्षीय बातचीत करेंगे, जिसका मुख्य फोकस दोनों देशों के बीच वाणिज्य, पूंजी निवेश, विज्ञान और आधुनिक नवाचार को बढ़ावा देना है।
कम आबादी लेकिन बेहिसाब आर्थिक ताकत
भौगोलिक रूप से बहुत छोटा होने के बावजूद यह देश वैश्विक पटल पर अपनी जबरदस्त आर्थिक समृद्धि के लिए जाना जाता है। केवल 40,000 की आबादी वाले इस देश ने आर्थिक संपन्नता के कई रिकॉर्ड बनाए हैं। वर्ल्ड एटलस के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2026 में लिकटेंस्टीन की प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP (PPP) 195,372 अमेरिकी डॉलर दर्ज की गई। इसी असाधारण आंकड़े की बदौलत 2026 में इसने दुनिया के सर्वाधिक अमीर राष्ट्र होने का गौरव हासिल किया। प्रकृति की गोद में बसी इस छोटी सी रियासत में साल भर पर्यटकों का तांता लगा रहता है।
स्विस फ्रैंक पर टिकी अर्थव्यवस्था और साझा व्यवस्था
स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रिया की सीमाओं से घिरे इस देश की राजधानी वाडुज़ है। इस संप्रभु मुल्क की सबसे हैरतअंगेज बात यह है कि इसका न तो कोई अपना केंद्रीय बैंक है और न ही अपनी कोई राष्ट्रीय मुद्रा चलती है। यह देश पूरी तरह से स्विस फ्रैंक (CHF) पर निर्भर है, जिसका संचालन स्विस नेशनल बैंक करता है। पड़ोसी स्विट्जरलैंड के साथ सीमा शुल्क और मौद्रिक समझौते के जरिए इस पूरे वित्तीय तंत्र को औपचारिक रूप दिया गया है। पड़ोसी मुल्क पर वित्तीय निर्भरता के बाद भी लिकटेंस्टीन एक पूरी तरह से आजाद और संप्रभु राष्ट्र के रूप में कार्य करता है।
सैकड़ों साल पुराना इतिहास और सैन्य तटस्थता की मिसाल
अमेरिकी विदेश विभाग के दस्तावेजों के अनुसार, इस छोटे राष्ट्र का एक स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व वर्ष 1719 से दर्ज है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो ऑस्ट्रिया के लिकटेंस्टीन राजघराने ने साल 1699 में वाडुज़ और 1713 में शेलनबर्ग के इलाकों को अपने नियंत्रण में लिया था। आगे चलकर 1719 में पवित्र रोमन साम्राज्य के तहत इन दोनों रियासतों को मिलाकर लिकटेंस्टीन नाम से एक स्वतंत्र रियासत का औपचारिक गठन किया गया था।
नेपोलियन के दौर में फ्रांसीसी सेना ने कुछ वर्षों तक इस इलाके पर अधिकार जमाया था, मगर 1815 में बने नए जर्मन परिसंघ के भीतर इस मुल्क को दोबारा पूर्ण स्वतंत्रता मिल गई। इसके बाद वर्ष 1868 में जब यह परिसंघ समाप्त हुआ, तब लिकटेंस्टीन ने एक साहसिक निर्णय लेते हुए अपनी 80 जवानों वाली छोटी सेना को हमेशा के लिए भंग कर दिया और खुद को सैन्य दृष्टि से पूर्णतः तटस्थ घोषित कर दिया। इस ऐतिहासिक तटस्थता का सम्मान दोनों विश्व युद्धों की भारी विभीषिका के दौरान भी पूरी तरह कायम रहा।
यातायात का अनोखा ढांचा: न कोई हवाई अड्डा, न बंदरगाह
लिकटेंस्टीन के पास अपना कोई अंतरराष्ट्रीय या घरेलू हवाई अड्डा नहीं है और चारों तरफ जमीन से घिरे होने के कारण यहां कोई समुद्री बंदरगाह भी मौजूद नहीं है। बाहर से आने वाले यात्री अमूमन पड़ोसी ऑस्ट्रिया अथवा स्विट्जरलैंड के हवाई अड्डों पर उतरते हैं और वहां से रेल, बस या निजी कारों के जरिए सीमा पार करके वाडुज़ पहुंचते हैं। आपात और विशिष्ट उड़ानों के लिए बाल्ज़र्स में केवल एक छोटा हेलीपोर्ट तैयार किया गया है, जो हेलीकॉप्टरों की आवाजाही को संभालता है।
राजशाही और संसद के बीच शक्ति का अनूठा संतुलन
शासन व्यवस्था की बात करें तो लिकटेंस्टीन में वंशानुगत संवैधानिक राजतंत्र प्रणाली लागू है, जहां राजकुमार राष्ट्र के सर्वोच्च प्रमुख होते हैं। राजकुमार विदेशी मंचों पर देश की नुमाइंदगी करते हैं और वैश्विक स्तर की संधियों पर हस्ताक्षर करने का अंतिम अधिकार रखते हैं। वहीं आंतरिक प्रशासन एक सामूहिक निकाय संभालता है, जिसमें सरकार के प्रमुख और चार अन्य पार्षद शामिल होते हैं। संसद की मंजूरी मिलने के उपरांत ही राजकुमार द्वारा इन सभी सरकारी पार्षदों की आधिकारिक नियुक्ति की जाती है।
अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक, देश के कानून निर्माण में राजकुमार को अहम अधिकार हासिल हैं, जिनमें सरकारी विधेयक पेश कराने की पहल और संसदीय फैसलों पर वीटो लगाने की शक्ति शामिल है। राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा जनहित पर बड़ा संकट आने की स्थिति में वे आपातकालीन शाही आदेश जारी कर सकते हैं, यद्यपि इसके वैध होने के लिए सरकार के प्रमुख के प्रति-हस्ताक्षर जरूरी होते हैं।
व्यापारिक साझेदारी को नई गति देने की तैयारी
विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार, प्रिंस एलॉइस के इस चार दिवसीय दौरे से भारत और लिकटेंस्टीन के मध्य सहयोग का नया अध्याय शुरू होगा। विशेष रूप से वर्ष 2025 में प्रभाव में आए भारत-EFTA व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते (TEPA) के उपरांत दोनों पक्षों के व्यापारिक संबंधों में नई ऊर्जा आई है। MEA ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि यह दौरा आपसी साझेदारी को गहरा करने और आर्थिक एवं तकनीकी मोर्चे पर भविष्य के नए रास्ते तलाशने का बेहतरीन मौका साबित होगा।


















