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तमिलनाडु के इरोड में वेलोड अभयारण्य के पास ग्रामीणों ने 21वें साल मनाई पटाखों से रहित दिवालीत्योहार
8 नव॰ 2026, 2:52 pm (8 मिनट पहले)· 1

तमिलनाडु के इरोड में वेलोड अभयारण्य के पास ग्रामीणों ने 21वें साल मनाई पटाखों से रहित दिवाली

तमिलनाडु के इरोड जिले में स्थित वेलोड पक्षी अभयारण्य के निकट बसे 10 गांवों ने इस दिवाली भी एक मिसाल कायम की है। यहां के निवासियों ने लगातार 21वें वर्ष तेज शोर और धुएं वाले पटाखे न जलाकर पक्षियों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।

दिवाली का त्योहार आते ही देशभर में आतिशबाजी और दीपोत्सव की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बाजार पटाखों की दुकानों से सज जाते हैं और लोग रोशनी व शोर के साथ उत्सव मनाने की योजना बनाते हैं। हालांकि, तमिलनाडु के इरोड जिले में स्थित वेलोड पक्षी अभयारण्य के आसपास बसे गांवों में दृश्य पूरी तरह से अलग रहता है। यहां के निवासियों के लिए त्योहार का उत्साह अपनी जगह है, लेकिन उससे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण उन बेजुबान पक्षियों की सुरक्षा है जो हर साल हजारों की संख्या में इस इलाके में शरण लेते हैं। इसी भावना के साथ, स्थानीय ग्रामीणों ने इस साल भी बिना किसी तेज आवाज या प्रदूषण वाले पटाखों के दिवाली का त्योहार बेहद सादगी और शांति से मनाया।

प्रकृति और त्योहार का अनोखा संगम

वेलोड अभयारण्य के निकट स्थित 10 से अधिक गांवों में यह परंपरा पिछले दो दशकों से अधिक समय से चली आ रही है। इस वर्ष ग्रामीणों ने लगातार 21वें साल आतिशबाजी से परहेज करने के अपने फैसले को दोहराया। दिवाली के अवसर पर बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने बारूद के शोर से दूरी बनाए रखी। गांव के परिवारों ने पारंपरिक अंदाज में नए वस्त्र धारण किए, अपने घरों को दीपों से सजाया, एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं और मिठाइयां बांटीं। जश्न को फीका न पड़ने देने के लिए बच्चों और युवाओं ने केवल फुलझड़ियों का सहारा लिया, जिससे न तो तेज आवाज पैदा होती है और न ही हानिकारक धुआं निकलता है।

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यदि किसी परिवार या बच्चे का मन पटाखे जलाने का बहुत अधिक होता है, तो वे अभयारण्य के प्रभाव क्षेत्र से दूर अपने रिश्तेदारों के घर चले जाते हैं। इस तरह ग्रामीण अपनी व्यक्तिगत खुशियों और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी के बीच एक सुंदर संतुलन स्थापित करते हैं। इस अनूठी पहल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके पीछे न तो कोई सरकारी आदेश है और न ही प्रशासन का कोई दबाव। यह पूरी तरह से ग्रामीणों का सामूहिक निर्णय है जिसे हर पीढ़ी सहर्ष स्वीकार कर रही है।

वेलोड पक्षी अभयारण्य का समृद्ध इतिहास और भूगोल

यह अभयारण्य तमिलनाडु के प्रमुख प्राकृतिक स्थलों में से एक है। इरोड शहर से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित वेलोड पक्षी अभयारण्य करीब 240 एकड़ के विशाल भूभाग में फैला हुआ है। वर्ष 1996 में केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा इसे आधिकारिक तौर पर पक्षी अभयारण्य घोषित किया गया था। यह तमिलनाडु सरकार द्वारा सूचीबद्ध 16 संरक्षित पक्षी अभयारण्यों की सूची में शामिल है।

राज्य के अन्य अभयारण्यों के विपरीत, वेलोड अभयारण्य की भौगोलिक संरचना थोड़ी भिन्न है। इसके चारों ओर सघन या घने जंगल नहीं हैं, बल्कि इसका पूरा पारिस्थितिक तंत्र पेरियाकुलम झील पर निर्भर करता है। यह विशाल झील यहां आने वाले स्थानीय और प्रवासी पक्षियों के लिए भोजन, पानी, घोंसला बनाने और प्रजनन के लिए एक आदर्श वातावरण प्रदान करती है। यही कारण है कि यह क्षेत्र पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है।

पेरियाकुलम झील और प्रवासी पक्षियों का बसेरा

वेलोड पक्षी अभयारण्य में हर साल विभिन्न देशों और भारतीय उपमहाद्वीप के अलग-अलग हिस्सों से दुर्लभ प्रजातियों के पक्षी आते हैं। इनमें पहाड़ी हंस यानी बार-हेडेड गूज और ब्लैक-टेल्ड गॉडविट जैसी दूर-दराज से आने वाली प्रजातियां प्रमुख हैं। इसके अलावा, यूरेशियन स्पूनबिल, स्पॉट-बिल्ड पेलिकन, वेस्टर्न मार्श हैरियर और ब्लू-टेल्ड बी-ईटर जैसे खूबसूरत पक्षी भी इस झील के आसपास बहुतायत में देखे जाते हैं।

आमतौर पर हर साल मार्च से अक्टूबर के महीनों के दौरान इस अभयारण्य में पक्षियों की चहल-पहल चरम पर रहती है। इस अवधि में पक्षी यहां अपने घोंसले बनाते हैं और अंडे देते हैं। हालांकि, ग्रामीणों के अनुसार इस साल अभयारण्य में पक्षियों की आवक थोड़ी कम रही है और फिलहाल कुछ ही स्थानीय व प्रवासी प्रजातियां झील के आसपास नजर आ रही हैं। इसके बावजूद, ग्रामीणों ने अपनी 21 साल पुरानी परंपरा में कोई ढील नहीं दी और पक्षियों की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध रहे।

बिना सरकारी दबाव के जनभागीदारी की अनूठी पहल

पर्यावरण संरक्षण और जीव-दया की इस मिसाल ने यह साबित कर दिया है कि किसी बड़े बदलाव के लिए हमेशा कड़े कानूनों की जरूरत नहीं होती। जब कोई समुदाय स्वयं अपनी जिम्मेदारी समझता है, तो परंपराएं भी पर्यावरण-अनुकूल बन जाती हैं। वेलोड के आसपास के 10 गांवों के लोगों ने यह दिखाया है कि खुशियां बांटने के लिए दूसरों को नुकसान पहुंचाना जरूरी नहीं है।

गांव के बुजुर्ग नई पीढ़ी को बचपन से ही पक्षियों के प्रति संवेदनशील बनना सिखाते हैं। यही कारण है कि आज के बच्चे भी बिना पटाखों के दिवाली मनाने में गर्व महसूस करते हैं। यह पहल न केवल तमिलनाडु बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण है, जो सिखाती है कि त्योहारों के आनंद और प्राकृतिक संतुलन के बीच कैसे सामंजस्य बिठाया जा सकता है।

सवाल-जवाब

तमिलनाडु के किन गांवों ने बिना पटाखों के दिवाली मनाई?
इरोड जिले में स्थित वेलोड पक्षी अभयारण्य के आसपास बसे 10 से अधिक गांवों के निवासियों ने बिना पटाखों के दिवाली मनाई।
ग्रामीणों ने यह परंपरा कितने सालों से जारी रखी है?
यह परंपरा लगातार 21वें साल भी जारी रही, जिसकी शुरुआत ग्रामीणों ने पक्षियों को शोर और धुएं से बचाने के लिए की थी।
वेलोड पक्षी अभयारण्य की स्थापना कब हुई थी और यह कितना बड़ा है?
इस अभयारण्य की स्थापना केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा 1996 में की गई थी, और यह लगभग 240 एकड़ क्षेत्र में फैला है।
इस अभयारण्य में कौन-कौन सी पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं?
यहां पहाड़ी हंस (बार-हेडेड गूज), ब्लैक-टेल्ड गॉडविट, यूरेशियन स्पूनबिल, स्पॉट-बिल्ड पेलिकन, वेस्टर्न मार्श हैरियर और ब्लू-टेल्ड बी-ईटर जैसी प्रजातियां आती हैं।
जिन ग्रामीणों को पटाखे जलाने का मन होता है, वे क्या करते हैं?
वे पटाखे जलाने के लिए अभयारण्य के प्रभाव क्षेत्र से बाहर स्थित अपने रिश्तेदारों के घर चले जाते हैं ताकि गांव में शांति बनी रहे।
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