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छत्तीसगढ़ के बस्तर में पाठ जतरा पूजन से ऐतिहासिक उत्सव का आगाज, 75 दिनों तक बिना रावण दहन के निकलेगी रथयात्रात्योहार
14 अग॰ 2026, 5:41 am (48 दिन पहले)· 4

छत्तीसगढ़ के बस्तर में पाठ जतरा पूजन से ऐतिहासिक उत्सव का आगाज, 75 दिनों तक बिना रावण दहन के निकलेगी रथयात्रा

छत्तीसगढ़ के बस्तर में 75 दिनों तक चलने वाले विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा का शुभारंभ पाठ जतरा रस्म से हो गया है। इसमें रावण दहन के बजाय पारंपरिक रथयात्रा निकाली जाती है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में दुनिया भर में मशहूर 75 दिनों तक चलने वाले ऐतिहासिक दशहरा पर्व का औपचारिक शुभारंभ हो चुका है। इस महापर्व का आगाज इसकी बेहद पहली और अत्यंत महत्वपूर्ण रस्म 'पाठ जतरा' के निष्पादन के साथ हुआ। पारंपरिक मान्यताओं और अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं से समृद्ध इस उत्सव में प्रचलित परिपाटी के विपरीत रावण दहन का आयोजन नहीं किया जाता है। इसके स्थान पर एक अत्यंत विशाल एवं भव्य रथयात्रा निकाली जाती है, जिसमें पूरे क्षेत्र से उमड़े हजारों श्रद्धालु असीम श्रद्धा के साथ भाग लेते हैं।

पाठ जतरा रस्म और रथ निर्माण की शुरुआत

बस्तर दशहरा की संपूर्ण प्रक्रियाओं में पाठ जतरा को नींव माना जाता है। हरियाली अमावस्या की पावन तिथि पर एक निर्धारित विशेष स्थल से लकड़ी लाकर पूजन स्थल पर रखी जाती है। इसके पश्चात समुदाय के वरिष्ठ प्रमुखों, प्रतिनिधियों और पारंपरिक रथ शिल्पकारों की गरिमामयी उपस्थिति में पूरे विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा संपन्न की जाती है। इस पारंपरिक अनुष्ठान के पूर्ण होते ही आगामी महीनों में आयोजित होने वाले भव्य दशहरा महोत्सव की व्यापक स्तर पर तैयारियां शुरू हो जाती हैं।

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रथ निर्माण में 'ठुरलू खोटला' का पारंपरिक महत्व

दशहरा समिति के उपाध्यक्ष बलराम मांझी के अनुसार, पूजा विधान के उपरांत इस विशेष लकड़ी को 'ठुरलू खोटला' के नाम से संबोधित किया जाता है। रथ निर्माण की प्रक्रिया में इस लकड़ी का विशेष उपयोग लकड़ी के बने हथौड़े के रूप में किया जाता है। विशेषकर विशालकाय रथ के पहियों में बड़ी लकड़ियों को मजबूती से ठोककर सही स्थान पर बैठाने और फिट करने के लिए शिल्पकार इसी का प्रयोग करते हैं।

देवी दंतेश्वरी और कन्या देवी को विशेष भोग व बलि

पूजा विधान के दौरान अंचल की अधिष्ठात्री मां दंतेश्वरी देवी के नाम से बकरे की बलि समर्पित की जाती है। इसके साथ ही, जल स्रोतों और धरती की देवी मानी जाने वाली कन्या देवी को मोगरी मछली अर्पित की जाती है। धार्मिक अनुष्ठान को संपन्न करने के लिए लाली, विविध प्रकार के पुष्प, पत्र, मिष्ठान और नए वस्त्रों सहित अनेक प्रकार की पूजन सामग्रियां भक्तिभाव से अर्पित की जाती हैं।

75 दिनों का अखंड सांस्कृतिक व धार्मिक महोत्सव

पाठ जतरा के संपन्न होते ही बस्तर में लगातार 75 दिनों तक चलने वाली विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक रस्मों का सिलसिला आरंभ हो चुका है। आने वाले सप्ताहों में मांझी-चालकी प्रथा के सदस्यों, बस्तर दशहरा समिति और स्थानीय जनसमुदाय की सक्रिय सहभागिता के साथ अनेक परंपरागत विधान पूरे किए जाएंगे। यह पूरा महोत्सव अंत में एक विशाल पारंपरिक रथयात्रा के साथ अपने मुख्य चरम पर पहुंचेगा।

सवाल-जवाब

बस्तर दशहरा की शुरुआत किस रस्म के साथ होती है?
बस्तर दशहरा का शुभारंभ 'पाठ जतरा' रस्म से होता है, जिसे इस 75 दिवसीय उत्सव का पहला महत्वपूर्ण विधान माना जाता है।
बस्तर दशहरा में रावण दहन क्यों नहीं किया जाता?
बस्तर दशहरा अपनी अनूठी परंपराओं के लिए जाना जाता है, जहां रावण दहन के स्थान पर पूरे धूमधाम से भव्य पारंपरिक रथयात्रा निकाली जाती है।
'ठुरलू खोटला' क्या है और इसका क्या उपयोग होता है?
पूजन के बाद पाठ जतरा की लकड़ी को 'ठुरलू खोटला' कहा जाता है। इसका उपयोग रथ निर्माण के दौरान हथौड़े के रूप में रथ के पहियों में लकड़ियों को ठोककर फिट करने के लिए किया जाता है।
बस्तर दशहरा में किन देवियों को कौन-सी बलि और सामग्री अर्पित की जाती है?
दंतेश्वरी देवी के नाम से बकरे की बलि दी जाती है, जबकि जल स्रोतों की देवी 'कन्या देवी' को मोगरी मछली अर्पित की जाती है। साथ ही लाली, फूल, पत्ते, मिठाई और कपड़े चढ़ाए जाते हैं।
बस्तर दशहरा कितने दिनों तक चलता है?
बस्तर दशहरा लगभग 75 दिनों तक चलता है, जिसमें बस्तर दशहरा समिति, मांझी-चालकी और स्थानीय लोग विभिन्न धार्मिक व सांस्कृतिक रस्में निभाते हैं।
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