बिहार के पूर्णिया स्थित भट्ठा बाजार के ऐतिहासिक भट्ठा दुर्गाबाड़ी मंदिर परिसर में इस बार शारदीय नवरात्र का उल्लास ऐतिहासिक स्वरूप में दिखेगा। उत्तर बिहार के सबसे विशाल और भव्य पूजा आयोजनों में गिने जाने वाले इस प्रांगण में श्रद्धालुओं के स्वागत के लिए एक अनोखा पंडाल मूर्त रूप ले रहा है। पारंपारिक कारीगरी और लोक संस्कृति के संगम के रूप में उभर रहे इस पंडाल को पूरी तरह प्राकृतिक सामग्रियों के सहारे तैयार किया जा रहा है, जो पूजा महोत्सव के दौरान पूरे अंचल में आकर्षण का मुख्य केंद्र रहेगा।
111वें वर्ष के उपलक्ष्य में विशेष आयोजन
भट्ठा दुर्गाबाड़ी पूजा समिति इस वर्ष अपने गौरवशाली इतिहास का 111वां वर्ष पूरा कर रही है। इस ऐतिहासिक पड़ाव को यादगार बनाने के लिए मंदिर प्रबंधन ने पर्यावरण हितैषी अवधारणा पर आधारित पंडाल के निर्माण का निर्णय लिया। समिति का उद्देश्य लोक कला, हस्तकला और ग्रामीण परंपराओं को एक बड़े मंच पर पुनर्जीवित करना है। इस विशेष उत्सव के लिए पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत के पारंपरिक शिल्पकर्मियों को आमंत्रित किया गया है, जो अपनी पुश्तैनी कला के जरिए पूरे परिसर को विहंगम रूप देने में जुटे हैं।
पूर्वोत्तर और बंगाल के 30 शिल्पियों की दो महीने की साधना
इस भव्य संरचना के निर्माण में असम, त्रिपुरा और कोलकाता से आए 30 कुशल कारीगर लगातार दो महीने से पसीना बहा रहे हैं। पूरे ढांचे को खड़ा करने में लगभग 15 लाख रुपये की अनुमानित लागत आ रही है। मंदिर समिति के सचिव सुचित्रा कुमार घोष उर्फ बाबू दा के साथ समिति सदस्य निरंजन कुमार दत्ता, चंपक दास और अन्य पदाधिकारियों के अनुसार, प्राचीन परंपरा के अनुरूप यहाँ हर वर्ष बंगाली पूजा पद्धति के जरिए वैदिक अनुष्ठान संपन्न होते हैं। इस बार का पंडाल अपने विशाल आकार और अनूठी निर्माण शैली के कारण समूचे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।
1 लाख बांसों से तैयार हो रहा प्लास्टिक मुक्त ढांचा
पंडाल की सबसे बड़ी विशेषता इसका पूर्णतः इको-फ्रेंडली होना है। इसके निर्माण में करीब 1 लाख बांसों का उपयोग किया गया है। पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने के उद्देश्य से समिति ने निर्माण में प्लास्टिक और कागज के इस्तेमाल पर पूरी तरह पाबंदी रखी है। बांस के ढांचे के साथ शीशे और रंग-बिरंगे धागों का बेहद सलीके से संयोजन किया गया है, जो प्रकाश पड़ते ही अद्भुत आभा बिखेरेंगे।
सूप, डाले और हस्तकला की सजीव झांकियां
कलात्मक सज्जा के लिए पंडाल की भीतरी और बाहरी दीवारों पर ग्रामीण जीवन से जुड़े पारंपरिक हस्तशिल्प को उकेरा गया है। घरेलू उपयोग में आने वाले सूप, डाले और हस्तनिर्मित आकृतियों को बांस के फलकों पर खूबसूरती से सजाया जा रहा है। कारीगरों द्वारा हस्तकला के जीवंत दृश्य उकेरे जा रहे हैं ताकि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से रू-ब-रू हो सके। निर्माण कार्य तेजी से प्रगति पर है और तीसरी पूजा तक इसे श्रद्धालुओं के दर्शन हेतु पूरी तरह पूर्ण कर लिए जाने का लक्ष्य रखा गया है।


















