बिहार के गया शहर को कभी फुटबॉल का मक्का कहा जाता था, और यहां की मिट्टी ने ऐसे कई खिलाड़ी दिए जिन्होंने राज्य और राष्ट्रीय स्तर के मैदानों पर अपने दम पर टीमों को खिताब और मेडल दिलाए. इन्हीं में एक चर्चित नाम है मधु पांडे, जिन्हें उनकी आक्रामक खेल शैली और गोल दागने की गजब काबिलियत के चलते बिहार का रोनाल्डो कहा जाने लगा था. मधु पांडे ने करीब 22 साल तक जिला स्तर पर और 10 साल तक बिहार की टीम का प्रतिनिधित्व किया, और इस दौरान विरोधी टीमों के लिए उनका नाम ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया था.
मैदान में उतरते ही 10 मिनट तक गूंजती थीं तालियां
मधु पांडे के खेल का जादू ऐसा था कि जब भी वे मैदान में कदम रखते, दर्शक करीब 10 मिनट तक लगातार तालियां बजाते रहते थे. उनके मुकाबलों की मांग इतनी ज्यादा रहती थी कि टिकट आम बाजार में मिलना मुश्किल हो जाता था और वे ब्लैक में बिकने लगते थे. उनकी लोकप्रियता सिर्फ आम दर्शकों तक सीमित नहीं थी, बड़े अधिकारी भी उनके खेल के मुरीद थे. बिहार के अलावा दूसरे राज्यों में भी मधु पांडे की खासी फैन फॉलोइंग बन चुकी थी.
18 साल की उम्र से पहले ही मिल गई थी सरकारी नौकरी
मधु पांडे की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 18 साल की उम्र पूरी होने से पहले ही इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड ने उन्हें नौकरी का प्रस्ताव दे दिया था. उन्होंने स्पोर्ट्स कोटे के जरिए बिजली विभाग में नौकरी हासिल की. उस दौर में किसी खिलाड़ी के लिए महज खेल के दम पर इतनी कम उम्र में सरकारी नौकरी पाना बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी, और यह मधु पांडे की मेहनत तथा मैदान पर उनके प्रदर्शन का ही नतीजा था.
चाचा भतीजे मधु और मनु की जोड़ी से कांपती थीं विरोधी टीमें
अकेले मधु पांडे ही नहीं, उनके भतीजे मनु पांडे भी उतने ही शानदार खिलाड़ी साबित हुए. जब यह चाचा भतीजे की जोड़ी मैदान में साथ उतरती, तो पूरा मुकाबला दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट और दोनों के नाम की गूंज के बीच खत्म होता था. जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर के फैंसी मुकाबलों और अन्य मैचों को मिला दिया जाए, तो दोनों के नाम सौ से ज्यादा गोल दर्ज हैं. दोनों ने मिलकर दर्जनों गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किए, और अपनी खेल प्रतिभा के बूते ही इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में सरकारी नौकरी भी हासिल की. फिलहाल मधु पांडे रिटायर हो चुके हैं और अपने बच्चों तथा परिवार के साथ जिंदगी गुजार रहे हैं.
गोरखपुर में रेफरी से हुई तीखी बहस, फिर अकेले जड़ दिए 10 गोल
मधु पांडे ने खुद एक पुराना वाकया साझा करते हुए बताया कि 1970 के दशक में गोरखपुर में गया की इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड टीम और उत्तर प्रदेश की टीम के बीच मुकाबला खेला जा रहा था. उस मैच में फॉरवर्ड की भूमिका निभा रहे मधु पांडे की सहायक रेफरी यानी आउटलाइन मैन से मैदान में तीखी बहस हो गई. मधु पांडे का आरोप था कि सहायक रेफरी विपक्षी टीम की तरफदारी कर रहे हैं. उन्होंने इसकी शिकायत मुख्य रेफरी से भी की, लेकिन रेफरी ने भी इस पर कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई.
रेफरी की यह बेरुखी मधु पांडे को इतनी नागवार गुजरी कि उन्होंने अपना पूरा गुस्सा मैदान पर अपने खेल के जरिए निकालने का फैसला किया. नतीजा यह हुआ कि उसी मैच में मधु पांडे ने एक के बाद एक कुल 10 गोल दाग दिए. उस दौर में इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बिहार की टीम का दबदबा इतना बढ़ गया था कि विरोधी टीमें कई बार मैच शुरू होने से पहले ही हार मान लेती थीं. मधु पांडे फॉरवर्ड लाइन के ऐसे खिलाड़ी थे, जिनकी दौड़ने की रफ्तार चीते जैसी थी, और उनकी कमाल की ड्रिबलिंग तथा आपसी जुगलबंदी उनकी आक्रामक खेल शैली को और भी धारदार बना देती थी.
देश भर में बजती थी इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड टीम की तूती
एक दौर ऐसा भी था जब इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड की टीम की तूती पूरे देश में बोलती थी. देश के अलग अलग शहरों में आयोजित होने वाले लगभग सभी बड़े फुटबॉल कप टीम के नाम रहे. मजूमदार फुटबॉल कप, उत्तर प्रदेश मानसून कप और पंजाब पुलिस फुटबॉल कप जैसे प्रतिष्ठित टूर्नामेंट यह टीम आसानी से अपने नाम कर लेती थी. मधु पांडे देश के लगभग हर राज्य में जाकर खेल चुके हैं, और इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने बरसों कड़ी मेहनत और संघर्ष किया. आज भले ही मधु पांडे रिटायरमेंट की जिंदगी बिता रहे हों, लेकिन गया के फुटबॉल इतिहास में उनका नाम और उनके रिकॉर्ड आज भी दर्ज हैं.




















