15 अगस्त 1947 को जब भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की, तब देश के समक्ष केवल एक स्वतंत्र राष्ट्र का ढांचा खड़ा करने की ही चुनौती नहीं थी, बल्कि अपने विशाल समुद्री तटों, द्वीपीय क्षेत्रों और रणनीतिक समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए एक सक्षम नौसैन्य बल तैयार करने का भी भारी दायित्व था। भारत के विभाजन के समय तत्कालीन रॉयल इंडियन नेवी की परिसंपत्तियों, प्रमुख जहाजों और मुख्य नौसैनिक अड्डों का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के नियंत्रण में चला गया था। कराची जैसा महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डा और प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान भारत के हाथ से निकल गए थे। इस ऐतिहासिक विभाजन के परिणामस्वरूप भारतीय नौसेना के हिस्से में अत्यंत सीमित संसाधन, कुछ पुराने ब्रिटिश निर्मित जहाज और प्राथमिक तटीय सुरक्षा प्रदान करने वाला एक छोटा बल ही शेष बचा था। हालांकि, इसी सीमित और कठिन शुरुआत से भारत ने एक ऐसी महासागरीय शक्ति बनने का अभूतपूर्व मार्ग तय किया जो आज अत्याधुनिक विमान वाहक पोत, परमाणु संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां, स्टील्थ गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर, आधुनिक फ्रिगेट और उन्नत नौसैनिक विमानन क्षमता से पूरी तरह सुसज्जित है।
भारतीय नौसेना की यह 79 वर्षों की विकास गाथा केवल नए युद्धपोतों के अधिग्रहण की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें रणनीतिक दूरदर्शिता, कठिन युद्धगत चुनौतियों पर विजय, इन-हाउस स्वदेशी डिजाइन क्षमता और तकनीकी क्रांति का एक समृद्ध इतिहास समाहित है। वर्ष 1961 का गोवा मुक्ति संग्राम, 1971 का भारत-पाक युद्ध तथा उसमें संचालित ऐतिहासिक ऑपरेशन ट्राइडेंट और ऑपरेशन पाइथन जैसे घटनाक्रमों ने भारतीय नौसेना की आक्रामक युद्ध रणनीति और परिचालन परिपक्वता को विश्व पटल पर सिद्ध किया। आज भारतीय नौसेना केवल समुद्री सीमाओं की रक्षा करने वाला सैन्य बल नहीं है, बल्कि यह जहाजों का निर्माण और डिजाइन स्वयं करने वाली एक समर्थ बिल्डर्स नेवी बन चुकी है। एयरोस्पेस विशेषज्ञ और नौसेना के पूर्व अधिकारी कमोडोर सी.डी. बालाजी (रिटायर्ड) के अनुसार, 1947 की छोटी तटीय फोर्स से आधुनिक ब्लू-वाटर नेवी बनने की यह यात्रा दशकों के सतत परिश्रम, मजबूत संस्थागत ढांचे के निर्माण, तकनीकी चुनौतियों के समाधान और दूरदर्शी रक्षा फैसलों का ही परिणाम है।
नौसैन्य कायाकल्प के तीन मुख्य ऐतिहासिक चरण
भारतीय नौसेना के इस परिवर्तनकारी सफर को मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और रणनीतिक चरणों के माध्यम से समझा जा सकता है। प्रत्येक चरण ने नौसेना की परिचालन सोच, कमान संरचना, युद्धक सिद्धांतों और तकनीकी आधार को गढ़ने में निर्णायक भूमिका निभाई है।
पहला चरण 1947 से 1960 के दशक की शुरुआत तक फैला हुआ था। स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती वर्षों में भारतीय नौसेना का शीर्ष नेतृत्व ब्रिटिश नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों के पास रहा। 22 अप्रैल 1958 को एडमिरल रामदास कटारी ने पहले भारतीय नौसेना प्रमुख (चीफ ऑफ द नेवल स्टाफ) के रूप में पदभार ग्रहण किया, जो भारत के नौसैनिक नेतृत्व का एक ऐतिहासिक मील का पत्थर सिद्ध हुआ। इसके पूर्व, 26 जनवरी 1950 को भारत के पूर्ण गणतंत्र बनने पर नौसेना के नाम से 'रॉयल' शब्द को हटा दिया गया था और नया नौसैनिक ध्वज अपनाया गया था। इस शुरुआती दौर में भारत ने ब्रिटिश नौसेना से पुराने क्रूजर युद्धपोत खरीदे, जिनमें एचएमएस एकिलीस का नाम बदलकर आईएनएस दिल्ली रखा गया और उसे बेड़े में शामिल किया गया। इसके बाद वर्ष 1957 में आईएनएस मैसूर और वर्ष 1961 में विमान वाहक पोत आईएनएस विक्रांत (पूर्व नाम एचएमएस हर्कुलिस) को बेड़े में शामिल किया गया। आईएनएस विक्रांत पर सी हॉक लड़ाकू विमान और एलिज पनडुब्बी रोधी विमान तैनात किए गए। आईएनएस विक्रांत के आगमन ने भारत को बहुत शुरुआती दौर में ही संपूर्ण एशिया में विमान वाहक पोत संचालित करने वाली एक प्रमुख और दुर्जेय समुद्री शक्ति बना दिया।
दूसरा चरण 1965 से 1971 के बीच का समय था। वर्ष 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान नौसेना को मुख्य रूप से रक्षात्मक भूमिका में रखा गया था और उसकी गतिविधियां मुख्य रूप से पोरबंदर के दक्षिण में तटीय गश्त और सुरक्षा तक सीमित रही थीं। हालांकि, इस युद्ध ने नौसेना के रणनीतिकारों को अपनी संरचनात्मक और परिचालन कमियों का गहन विश्लेषण करने का एक महत्वपूर्ण अवसर दिया। सतह, पनडुब्बी और नौसैनिक विमानन शाखाओं में आने वाली चुनौतियों को पहचानकर आधुनिक हथियारों, रडार प्रणालियों और सोवियत निर्मित नए प्लेटफॉर्मों को तेजी से अपनाने की नींव इसी दौर में रखी गई। इसी समय भारत ने सोवियत संघ से P-15 मिसाइलों से लैस मिसाइल बोट्स, फॉक्सट्रॉट क्लास पनडुब्बियां और पेट्या क्लास फ्रिगेट हासिल करने के सौदे किए।
तीसरा चरण 1971 के युद्ध से शुरू होकर वर्तमान समय तक निरंतर जारी है। 1971 के युद्ध में भारतीय नौसेना ने अपनी पुरानी रक्षात्मक सोच को पूरी तरह से त्यागकर अत्यंत आक्रामक रणनीति अपनाई। बंगाल की खाड़ी में पूर्वी पाकिस्तान की पूर्ण समुद्री नाकेबंदी करने और पश्चिमी मोर्चे पर कराची बंदरगाह पर भीषण नौसैनिक हमला करने के बाद नौसेना का ब्लू-वाटर विस्तार तेजी से शुरू हुआ। इस चरण में भारत ने सोवियत संघ (रूस) से परमाणु संचालित पनडुब्बी आईएनएस चक्र को लीज पर लिया, यूनाइटेड किंगडम से आईएनएस विराट (पूर्व नाम एचएमएस हर्मीस) खरीदा और बाद में रूस से आईएनएस विक्रमादित्य (पूर्व नाम एडमिरल गोर्शकोव) का अधिग्रहण किया। इसके साथ ही नौसेना ने विदेशी खरीद पर निर्भरता कम करते हुए देश के भीतर ही युद्धपोत निर्माण और बुनियादी ढांचे के विकास पर ध्यान केंद्रित किया, जिसके तहत प्रोजेक्ट 15, प्रोजेक्ट 15A कोलकाता क्लास और प्रोजेक्ट 15B विशाखापट्टनम क्लास गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर तथा प्रोजेक्ट 17A नीलगिरि क्लास स्टील्थ फ्रिगेट्स का स्वदेशी निर्माण शुरू हुआ।
ऑपरेशन विजय: 1961 के गोवा मुक्ति संग्राम में नौसैन्य योगदान
दिसंबर 1961 का गोवा मुक्ति संग्राम, जिसे 'ऑपरेशन विजय' का नाम दिया गया था, आधुनिक भारतीय नौसेना के इतिहास का पहला प्रत्यक्ष आमने-सामने का समुद्री युद्ध था। गोवा, दमन और दीव में 450 वर्षों से चले आ रहे पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन को समाप्त करने के लिए भारतीय नौसेना ने समुद्र की तरफ से गोवा की घेराबंदी करके एक मजबूत और अभेद्य नाकेबंदी स्थापित की थी। इस त्वरित, समन्वित और सटीक सैन्य अभियान ने महज 40 घंटे के भीतर औपनिवेशिक शासन का अंत कर दिया।
इस ऐतिहासिक ऑपरेशन में भारतीय नौसेना के प्रमुख युद्धपोतों आईएनएस मैसूर (जो फ्लैगशिप के रूप में कार्य कर रहा था), आईएनएस दिल्ली, आईएनएस बेतवा, आईएनएस ब्यास और आईएनएस त्रिशूल ने मुख्य भूमिका निभाई। मुर्मूगाओ बंदरगाह के समीप पुर्तगाली फ्रिगेट 'अल्फ़ोंसो डी अल्बुकर्क' के साथ हुए समुद्री मुकाबले में भारतीय युद्धपोतों की सटीक गोलाबारी ने पुर्तगाली फ्रिगेट को पूरी तरह नष्ट कर दिया और उसे तट पर पस्त होने के लिए मजबूर कर दिया।
इसके अतिरिक्त, अंजेदिवा द्वीप पर कब्जे के लिए चलाए गए नौसैनिक अभियान के दौरान पुर्तगाली सैनिकों के तीव्र और अप्रत्याशित विरोध का सामना करना पड़ा। भारतीय नौसैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए द्वीप पर लैंडिंग की और भारी गोलाबारी के बीच अंजेदिवा द्वीप को पुर्तगाली कब्जे से मुक्त कराया। इस कार्रवाई में भारतीय नौसेना के 7 वीर सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुति दी। वहीं दीव क्षेत्र में थल सेना के अग्रिम अभियानों को समर्थन देने के लिए आईएनएस दिल्ली ने दुश्मन के सामरिक ठिकानों और तटीय तोपों पर सटीक गोलाबारी की, जिससे पुर्तगाली सेना का मनोबल टूट गया और उसने शीघ्र आत्मसमर्पण कर दिया।
1971 की जंग: ऑपरेशन ट्राइडेंट और ऑपरेशन पाइथन का रणनीतिक प्रहार
वर्ष 1971 का युद्ध भारतीय नौसेना के इतिहास का सबसे स्वर्णिम और गौरवशाली अध्याय माना जाता है, जिसमें नौसैनिक रणनीति, परिचालन जोखिम और तकनीकी नवाचार का अद्भुत प्रदर्शन देखने को मिला। कराची बंदरगाह पर हमला करने के लिए नौसेना के रणनीतिकारों ने 'ऑपरेशन ट्राइडेंट' की एक अत्यंत गोपनीय और साहसिक योजना तैयार की। चूंकि बड़े युद्धपोतों को दुश्मन के लंबी दूरी के रडार बहुत पहले ही डिटेक्ट कर लेते थे, इसलिए भारतीय नौसेना ने एक अनूठा और जोखिम भरा निर्णय लिया। भारत के पास सोवियत संघ द्वारा आपूर्ति की गई P-15 स्टिक्स एंटी-शिप मिसाइलों से लैस Osa-I क्लास की छोटी मिसाइल बोट्स थीं। ये बोट्स आकार में अत्यंत छोटी थीं, जिससे रात के अंधेरे में इन्हें दुश्मन के रडार पर पकड़ना लगभग असंभव था, परंतु इनकी अपनी ईंधन क्षमता और परिचालन रेंज सीमित थी।
रणनीतिकारों ने योजना बनाई कि पेट्या क्लास के बड़े युद्धपोत (जैसे आईएनएस किल्टन और आईएनएस कछल) इन छोटी मिसाइल बोट्स (आईएनएस निपात, आईएनएस निर्घट और आईएनएस वीर) को समुद्र में खींचकर (टो करके) कराची बंदरगाह के करीब तक ले जाएंगे और वहां से इन्हें हमले के लिए छोड़ेंगे। 4 दिसंबर 1971 की रात को चलाए गए ऑपरेशन ट्राइडेंट में इन मिसाइल बोट्स ने कराची बंदरगाह और वहां तैनात पाकिस्तानी बेड़े पर भीषण हमला किया। इस हमले में पाकिस्तानी विध्वंसक युद्धपोत पीएनएस खैबर और माइंसवीपर पीएनएस मुहाफिज समुद्र में डूब गए, जबकि एक मर्चेंट पोत भी नष्ट हो गया। इस ऐतिहासिक और रणनीतिक विजय की स्मृति में ही भारत में प्रतिवर्ष 4 दिसंबर को नौसेना दिवस के रूप में मनाया जाता है।
ऑपरेशन ट्राइडेंट की सफलता के ठीक बाद 8 और 9 दिसंबर की रात को नौसेना ने 'ऑपरेशन पाइथन' लॉन्च किया, जो एक प्रकार से रणनीतिक मुक्केबाजी का 'वन-टू पंच' साबित हुआ। कराची बंदरगाह पहले हमले से संभल भी नहीं पाया था कि आईएनएस विनाश और साथी फ्रिगेट्स आईएनएस त्रिशूल और आईएनएस तलवार ने कराची के मुख्य केमारी तेल भंडारण टैंकों पर सटीक मिसाइलें दागीं। इस हमले के कारण कराची बंदरगाह का 50 प्रतिशत से अधिक ईंधन भंडार भीषण आग में जलकर राख हो गया, जिससे पाकिस्तानी वायुसेना और सेना की आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह ध्वस्त हो गई।
इस महासंग्राम के दौरान पश्चिमी मोर्चे पर भारत को एक दर्दनाक क्षति भी उठानी पड़ी, जब 9 दिसंबर 1971 को दीव के तट के समीप पाकिस्तानी पनडुब्बी पीएनएस हैंगर ने भारतीय युद्धपोत आईएनएस खुकरी पर टॉरपीडो से हमला कर दिया। आईएनएस खुकरी के कमान अधिकारी कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला ने अद्भुत नायकत्व का परिचय दिया। उन्होंने अपनी लाइफ जैकेट एक युवा नाविक को सौंप दी और अपने 176 नाविकों तथा 18 अधिकारियों के साथ डूबते हुए युद्धपोत पर रहते हुए देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। कैप्टन मुल्ला को इस अदम्य वीरता के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। वहीं पूर्वी मोर्चे पर विमान वाहक पोत आईएनएस विक्रांत ने अपने बॉयलर में खराबी के बावजूद 'सी हॉक' और 'एलिज' लड़ाकू विमानों के माध्यम से चटगांव, कॉक्स बाजार और खुलना के बंदरगाहों पर एयर स्ट्राइक की तथा पूर्वी पाकिस्तान की समुद्री सीमा की पूर्ण नाकेबंदी कर दी। इसके अतिरिक्त आईएनएस विक्रांत को निशाना बनाने आ रही पाकिस्तानी परमाणु संचालित पनडुब्बी पीएनएस गाजी को भी विशाखापट्टनम के तट के समीप भारतीय नौसैन्य बलों ने नष्ट कर दिया।
बिल्डर्स नेवी और स्वदेशी शिपयार्ड ढांचे का निर्माण
एक शक्तिशाली और स्थायी ब्लू-वाटर नेवी बनने के मार्ग में सबसे बड़ी चुनौती केवल विदेशों से युद्धपोत खरीदना नहीं थी, बल्कि देश के भीतर ही डिजाइन, विश्लेषण, परीक्षण, सिमुलेशन और जहाज निर्माण का एक व्यापक बुनियादी ढांचा तैयार करना थी। विदेशी निर्भरता को समाप्त करने के लिए भारतीय नौसेना ने 1960 के दशक में ही इन-हाउस जहाजों का खाका तैयार करने के उद्देश्य से 'नेवल डिजाइन ब्यूरो' (वर्तमान में वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो) की स्थापना की। इसके साथ ही देश में सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा शिपयार्डों का एक मजबूत और आत्मनिर्भर नेटवर्क विकसित किया गया।
मुंबई स्थित मझगांव डॉक्स शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL), कोलकाता का गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE), गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) और विशाखापट्टनम का हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (HSL) इस स्वदेशी नौसैन्य क्रांति के मुख्य स्तंभ बने। केवल जहाजों का निर्माण ही पर्याप्त नहीं था; उनके नियमित रखरखाव, ओवरहालिंग, ड्राई-डॉकिंग और आधुनिकीकरण के लिए मुंबई और विशाखापट्टनम स्थित नौसैनिक डॉकयार्ड्स को भी उच्च क्षमता से लैस किया गया। इसी संस्थागत और ढांचागत प्रगति के कारण आज भारतीय नौसेना विदेशी जहाजों के खरीदार से बदलकर स्वयं अत्याधुनिक स्टील्थ युद्धपोत, फ्रिगेट और पनडुब्बियां बनाने वाली 'बिल्डर्स नेवी' में बदल चुकी है।
प्रौद्योगिकी का रूपांतरण: रडार तकनीक से स्टील्थ और नेवल तेजस तक
पारंपरिक जहाजों से आधुनिक स्टील्थ गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर तक का तकनीकी सफर अत्यंत चुनौतीपूर्ण और बहुआयामी रहा है। किसी भी नई तकनीक को अपनाने के लिए नौसैनिक प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचे और डॉकयार्ड की मरम्मत सुविधाओं में भारी बदलाव की आवश्यकता होती है। जब कोई नौसेना पारंपरिक प्लेटफॉर्म से 'स्टील्थ' तकनीक की ओर बढ़ती है, तो जहाज निर्माण की सामग्री, पतवार (Hull) के डिजाइन, कम रडार सिग्नेचर (RCS) और रडार रोधी कोटिंग की शैली पूरी तरह बदल जाती है।
नौसेना ने पुराने वैक्यूम ट्यूब रडार के स्थान पर आधुनिक एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (AESA) रडार प्रणालियों (जैसे MF-STAR रडार) को अपनाया। जहां पहले जहाजों पर तोपों का संचालन मैन्युअल गन क्रू द्वारा होता था, वहीं आज स्वचालित गाइडेड मिसाइल सिस्टम और क्लोज-इन वेपन सिस्टम (CIWS) तैनात हैं। विमानन क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव आया है; पूर्व में आईएनएस विक्रांत पर उपयोग होने वाले फ्रांसीसी टर्बो-प्रॉपेलर एलिज विमानों से लेकर आज स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान तेजस के नौसैन्य संस्करण (Naval LCA Tejas) तक का सफर तय किया गया है। कमोडोर सी.डी. बालाजी (रिटायर्ड), जिन्होंने एयरोस्पेस में मास्टर्स और पीएचडी की डिग्री हासिल की है, ने एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) में नेवल तेजस कार्यक्रम के निदेशक के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 2003 में कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद गोवा में शोर बेस्ड टेस्ट फैसिलिटी (SBTF) पर स्की-जंप टेक-ऑफ और अरेस्टेड लैंडिंग जैसी जटिल तकनीकों का परीक्षण किया गया, जिसके परिणामस्वरूप 2012 में नेवल तेजस की पहली सफल उड़ान आयोजित की जा सकी। बाद में नेवल तेजस ने आईएनएस विक्रमादित्य और स्वदेशी आईएनएस विक्रांत पर भी सफल अरेस्टेड लैंडिंग करके इतिहास रचा।
परमाणु प्रतिरोधकता और ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल का प्रभाव
समुद्री सुरक्षा और वैश्विक भू-राजनीति में भारत की धाक जमाने में 'सी-बेस्ड न्यूक्लियर डेटरेंस' (समुद्री परमाणु प्रतिरोधक क्षमता) की अहम भूमिका रही है। वास्तविक प्रतिरोधक क्षमता समुद्र की गहराइयों में छिपी पनडुब्बियों से प्राप्त होती है। पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों (SSK) को अपनी बैटरी चार्ज करने और स्नॉर्कलिंग के लिए समय-समय पर समुद्र की सतह पर आना पड़ता है, जिससे दुश्मन के रडार और उपग्रहों द्वारा उनके पकड़े जाने का जोखिम रहता है। इसके विपरीत परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियां कई महीनों तक बिना सतह पर आए समुद्र के भीतर छिपी रह सकती हैं, जिनकी परिचालन सीमा केवल चालक दल के भोजन और रसद पर निर्भर करती है।
रूसी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस चक्र को दो बार लीज पर लेकर (1988 और 2012 में) परिचालन अनुभव प्राप्त करने के बाद भारत ने एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल (ATV) परियोजना के तहत स्वदेशी परमाणु संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत का निर्माण किया। आईएनएस अरिहंत के बेड़े में शामिल होने से भारत का 'न्यूक्लियर ट्रायड' (जल, थल और नभ से परमाणु हमला करने की क्षमता) पूरी तरह से पूरा और सक्षम हो गया।
इसी प्रकार भारत और रूस के संयुक्त उद्यम द्वारा विकसित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के नेवल वर्जन ने भारतीय युद्धपोतों की मारक क्षमता को एक नई परिभाषा दी है। Mach 3 से अधिक की सुपरसोनिक गति से उड़ने वाली ब्रह्मोस मिसाइल को दुश्मन के आधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम द्वारा डिटेक्ट करना और नष्ट करना लगभग असंभव होता है। यह मिसाइल 'सी-स्किमिंग' तकनीक पर कार्य करती है, अर्थात यह समुद्र की सतह से महज 10 मीटर की ऊंचाई पर उड़ती है जिससे रडार की पकड़ में नहीं आती। ब्रह्मोस भारतीय नौसेना के अग्रिम पंक्ति के विध्वंसक जहाजों को समुद्र में जहाजों पर और जमीन पर स्थित ठिकानों पर अचूक और विनाशकारी हमला करने की क्षमता प्रदान करती है।
साइबर वॉरफेयर, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और एआई का समावेश
आधुनिक नौसैन्य युद्ध में केवल पारंपरिक तोपों और मिसाइलों का महत्व नहीं रह गया है, बल्कि साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर ने युद्ध रणनीति को अत्यधिक जटिल और संवेदनशील बना दिया है। इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में स्पेक्ट्रल डोमिनेंस (Spectral Dominance) महत्वपूर्ण होता है, जिसका अर्थ है हथियारों का प्रयोग करने से पूर्व रेडियो, रडार और संचार फ्रीक्वेंसी को नियंत्रित करना या दुश्मन के सिग्नलों को जैम करना। भारतीय नौसेना इसके लिए पैसिव इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर रिसीवर्स (Passive EW Receivers) और मिसाइलों को भटकाने वाले चैफ (Chaff) तथा फ्लेयर्स (Flares) जैसे काउंटर्मेशर्स का उपयोग करती है। इसके अतिरिक्त नौसैनिक जहाजों के कमांड और कंट्रोल सॉफ्टवेयर को संभावित साइबर हमलों से सुरक्षित रखना प्राथमिक सुरक्षा नीति बन चुका है।
दुश्मन के युद्धपोतों और पनडुब्बियों की गतिविधियों को ट्रैक करने तथा त्वरित निर्णय लेने में उपग्रह इमेजरी तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का व्यापक उपयोग हो रहा है। पूर्व में ली गई उपग्रह तस्वीरों का मैन्युअल विश्लेषण किया जाता था जिसमें काफी समय लगता था, परंतु आज उन्नत कंप्यूटर विजन मॉडल और मशीन लर्निंग एल्गोरिदम का उपयोग करके रियल-टाइम में असामान्य गतिविधियों या दुश्मन के जहाजों की आवाजाही का पता लगाया जाता है। यह मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस (MDA) को मजबूत करता है।
विजन 2047: पूर्ण आत्मनिर्भर नौसेना की दिशा में कदम
वर्ष 1947 में ब्रिटिश निर्मित पुराने जहाजों पर निर्भर रहने वाली नौसेना आज अपनी आजादी के 100वें वर्ष यानी 2047 तक पूर्ण रूप से 'आत्मनिर्भर नौसेना' बनने के लक्ष्य पर काम कर रही है। भारत 'बायर्स नेवी' से 'बिल्डर्स नेवी' तो बन चुका है, लेकिन अभी 100 प्रतिशत स्वदेशीकरण का लक्ष्य हासिल करना बाकी है।
वर्तमान समय में भी कुछ जटिल प्रणालियों, विशेषकर प्रोपल्शन सिस्टम और मरीन गैस टर्बाइन इंजनों के लिए भारत को विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर नए स्वदेशी विमान वाहक पोत आईएनएस विक्रांत (IAC-1) में इस्तेमाल होने वाला GE LM 2500 मरीन गैस टर्बाइन इंजन संयुक्त राज्य अमेरिका से आयात किया गया है। वर्ष 2047 तक भारतीय नौसेना का मुख्य विजन यही है कि इन मुख्य घटकों, अत्याधुनिक सेंसरों और मरीन इंजनों का निर्माण भी देश के भीतर ही किया जाए ताकि भारत समुद्री क्षेत्र में एक पूर्णतः आत्मनिर्भर, आधुनिक और अजेय महाशक्ति के रूप में स्थापित हो सके।



















