विदेशी धरती पर काम करने वाले प्रवासियों द्वारा अपने गृह देश भेजा जाने वाला धन दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के बाहरी खातों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाता है। इसके बावजूद, यह जरूरी नहीं कि विदेशी मुद्रा का यह प्रवाह अकेले घरेलू मुद्रा की स्थिरता तय कर सके। प्रवासियों से मिलने वाले धन और विनिमय दर के बीच का यह संबंध सीधा दिखने के बावजूद काफी जटिल है, जिसमें व्यापार घाटा, केंद्रीय बैंकों के फैसले, वैश्विक तेल की कीमतें और विदेशी कर्ज जैसे कई बड़े कारक समानांतर काम करते हैं।
कुल प्रवाह बनाम जीडीपी पर निर्भरता का अंतर
अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा प्रवाह का विश्लेषण करते समय सबसे पहली भूल यह मान लेना होती है कि जिस देश में सबसे ज्यादा पैसा आ रहा है, वह उस पर सबसे अधिक निर्भर है। हकीकत इससे अलग है। भारत सालाना 137.7 बिलियन डॉलर प्राप्त करके दुनिया में सबसे आगे रहता है, लेकिन जब अर्थव्यवस्था के कुल आकार यानी जीडीपी के अनुपात में देखा जाए, तो दक्षिण एशिया के पांच बड़े प्राप्तकर्ताओं में भारत का निर्भरता अनुपात सबसे कम है।
दूसरी ओर नेपाल का मामला बिल्कुल उलट है। नेपाल में डॉलर के लिहाज से कुल रकम अपेक्षाकृत कम है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था का 28.2 प्रतिशत हिस्सा सीधे तौर पर इसी विदेशी आवक पर टिका है। आयात खर्च उठाने के मामले में नेपाल की विदेशी मुद्रा भंडार स्थिति पाकिस्तान की तुलना में कहीं बेहतर है, जहां 12.4 महीनों के आयात की क्षमता मौजूद है, जबकि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था नेपाल से कई गुना बड़ी है। यह तुलना साफ करती है कि केवल डॉलर की भारी मात्रा को देखकर किसी देश की बाहरी वित्तीय मजबूती का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
पाकिस्तान में विदेशी आवक और मुद्रा की स्थिति
हाल के वित्तीय वर्षों में अलग-अलग देशों के भीतर आए बदलावों से इस तंत्र को बेहतर समझा जा सकता है। वित्तीय वर्ष 2024/25 के दौरान पाकिस्तान में प्रवासियों द्वारा भेजे गए धन में 26.6 प्रतिशत की जोरदार बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिससे यह आंकड़ा रिकॉर्ड 38.3 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया।
विदेशी मुद्रा के इस बड़े प्रवाह के साथ पाकिस्तान के चालू खाते में भी बड़ा बदलाव आया। यह 2.1 बिलियन डॉलर के घाटे से उबरकर 2.1 बिलियन डॉलर के अधिशेष में बदल गया। इसी अवधि में स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार 9.4 बिलियन डॉलर से बढ़कर 14.5 बिलियन डॉलर हो गया। इस दौरान पाकिस्तानी रुपये में केवल 1.9 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि दो साल पहले इसमें 28.4 प्रतिशत की भारी गिरावट देखी गई थी।
स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के ईडब्ल्यूएमए माप के अनुसार डॉलर के मुकाबले पाकिस्तानी रुपये की अस्थिरता वित्तीय वर्ष 2023 के 0.96 से घटकर वित्तीय वर्ष 2025 में 0.04 पर आ गई। हालांकि केंद्रीय बैंक ने इस सुधार का मुख्य श्रेय निर्यात वृद्धि के बजाय विदेशी धन और आधिकारिक वित्तीय सहायता को दिया। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मिली किस्तों ने भी भंडार बढ़ाने में मदद की। केंद्रीय बैंक ने रुपये को मजबूत होने देने के बजाय डॉलर की सीधी खरीद की। इसके अलावा अनौपचारिक माध्यमों की जगह औपचारिक बैंकिंग चैनलों को बढ़ावा देने की नीतियों के कारण भी आंकड़ों में यह तेज बढ़ोतरी दिखाई दी।
बांग्लादेश में घाटे से संतुलन की ओर का सफर
बांग्लादेश में भी वित्तीय वर्ष 2024/25 के दौरान इसी तरह की स्थिति देखने को मिली। वहां प्रवासियों की ओर से आने वाले धन में 26.8 प्रतिशत का इजाफा हुआ और कुल आंकड़ा 30.33 बिलियन डॉलर पर पहुंच गया।
इस बढ़ोतरी का सीधा असर देश के बाहरी संतुलन पर पड़ा। बांग्लादेश का चालू खाता 6.60 बिलियन डॉलर के बड़े घाटे से निकलकर लगभग संतुलन की स्थिति में आ गया। बीपीएम6 मानक के आधार पर देश का विदेशी मुद्रा भंडार 21.7 बिलियन डॉलर से बढ़कर 26.7 बिलियन डॉलर हो गया। इसके साथ ही बांग्लादेशी टका की अवमूल्यन दर 8.17 प्रतिशत से घटकर 3.89 प्रतिशत रह गई। हालांकि अर्थशास्त्रियों के अनुसार यह प्रक्रिया दोनों तरफ से काम करती है, जहां मुद्रा की स्थिरता और आधिकारिक विनिमय दरों का आकर्षण लोगों को कानूनी चैनलों से पैसा भेजने के लिए प्रेरित करता है।
श्रीलंका का अनुभव: रिकॉर्ड आवक के बाद भी मुद्रा कमजोर
श्रीलंका का हालिया घटनाक्रम इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो इस धारणा को खारिज करता है कि विदेशी धन का बढ़ना हमेशा मुद्रा को स्थिर रखेगा। वर्ष 2025 में श्रीलंका को 8.1 बिलियन डॉलर का रिकॉर्ड विदेशी धन प्राप्त हुआ, जो 22.8 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्शाता है।
इसके प्रभाव से चालू खाते का अधिशेष बढ़कर 1.7 बिलियन डॉलर हो गया। केंद्रीय बैंक ने लगभग 2.0 बिलियन डॉलर की शुद्ध विदेशी मुद्रा खरीदी और कुल भंडार 6.84 बिलियन डॉलर पर पहुंच गया। इन सभी सकारात्मक आंकड़ों के बावजूद 2025 में श्रीलंकाई रुपये में 5.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके बाद वर्ष 2026 की पहली छमाही में श्रीलंका को 4.6 बिलियन डॉलर मिले, जो पिछले साल की समान अवधि से 23.2 प्रतिशत अधिक थे। फिर भी मध्य पूर्व के संघर्ष से उपजे बाहरी दबावों के कारण जुलाई के अंत तक श्रीलंकाई रुपये में 7.8 प्रतिशत की गिरावट आ गई।
विदेशी मुद्रा प्रवाह और विनिमय दर का बुनियादी तंत्र
सैद्धांतिक रूप से जब प्रवासी विदेशी मुद्रा भेजते हैं, तो उसके पीछे का तंत्र काफी स्पष्ट होता है। विदेश से आने वाली मुद्रा को स्थानीय बैंकों में बदला जाता है, जिससे घरेलू बाजार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ती है और स्थानीय मुद्रा पर से बिकवाली का दबाव कम होता है।
यदि इस दौरान केंद्रीय बैंक अतिरिक्त डॉलर को बाजार से खरीद लेता है, तो इसका नतीजा मुद्रा की कीमत बढ़ने के बजाय देश के विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी के रूप में सामने आता है। लेकिन व्यवहार में कई अन्य वैश्विक और घरेलू ताकतें इस प्रवाह के असर को कमजोर कर देती हैं
- कच्चे तेल की कीमतें: दक्षिण एशिया के सभी पांच प्रमुख देश ऊर्जा आयातक हैं, इसलिए तेल की कीमतों में उछाल विदेशी मुद्रा को तेजी से बाहर खींचता है।
- बढ़ता आयात बिल: आवश्यक वस्तुओं और ऊर्जा का बढ़ता आयात प्रवासियों से आने वाली अतिरिक्त विदेशी मुद्रा की तुलना में अधिक हो सकता है।
- विदेशी कर्ज का भुगतान: अंतरराष्ट्रीय कर्जों की किस्तें चुकाने में भारी भंडार खर्च होता है, भले ही प्रवासियों से कितना भी पैसा क्यों न आ रहा हो।
- पूंजी की निकासी: वैश्विक निवेशक जोखिम के माहौल में अपना पोर्टफोलियो निवेश तेजी से निकालते हैं, जिसका प्रवासियों के पैसे से कोई संबंध नहीं होता।
- केंद्रीय बैंक की नीतियां: केंद्रीय बैंक यह तय करता है कि आने वाले डॉलर से भंडार बढ़ाया जाए या बाजार में मुद्रा की विनिमय दर को संभाला जाए।
श्रीलंका इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जहां 2025 में आयात प्रतिबंध हटाए जाने के बाद व्यापारिक आयात में इतनी तेजी आई कि उसने रिकॉर्ड विदेशी धन के सकारात्मक प्रभाव को पूरी तरह निष्प्रभावी कर दिया।
भारत और नेपाल की विशिष्ट व्यवस्था
भारत के आंकड़े पहली नजर में इस सिद्धांत का समर्थन करते दिखते हैं क्योंकि यहां सबसे अधिक विदेशी धन आता है, विदेशी मुद्रा भंडार सबसे बड़ा है और मुद्रा में अस्थिरता सबसे कम है। वित्तीय वर्ष 2025 की पहली छमाही में भारतीय रुपये की एक महीने की अनुमानित अस्थिरता औसतन केवल 2.2 प्रतिशत रही। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार रुपये की यह स्थिरता भारतीय रिजर्व बैंक के सक्रिय विदेशी मुद्रा प्रबंधन और बाजार हस्तक्षेप का परिणाम है, न कि केवल विदेशी धन के बड़े प्रवाह की वजह से।
नेपाल की स्थिति दूसरी दिशा में जाती है। वहां सकल घरेलू उत्पाद का 28.2 प्रतिशत प्रवासियों के धन से आता है और 12.4 महीनों का मजबूत आयात कवर मौजूद है। लेकिन नेपाल की मुद्रा वर्ष 1993 से भारतीय रुपये के साथ 1.60 नेपाली रुपये बराबर 1 भारतीय रुपये की निश्चित दर पर बंधी हुई है। नेपाल राष्ट्र बैंक के अनुसार डॉलर के मुकाबले नेपाली रुपये का उतार-चढ़ाव सीधे भारतीय रुपये की चाल पर निर्भर करता है। इसलिए नेपाल में मुद्रा की स्थिरता का श्रेय केवल प्रवासियों के धन को नहीं दिया जा सकता।
तीन स्तरों पर सामने आते निष्कर्ष
दक्षिण एशिया के इन पांच देशों की तुलना तीन अलग-अलग स्तरों को रेखांकित करती है, जिनमें प्रत्येक अगला स्तर पिछले से कमजोर पड़ता जाता है
- चालू खाते पर असर: विदेशी मुद्रा की आवक व्यापार घाटे को पाटने और चालू खाते को मजबूत करने में बेहद कारगर साबित होती है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका सभी में इसके ठोस प्रमाण मिले हैं।
- विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति: प्रवासियों का धन केंद्रीय बैंकों को डॉलर संचय का अवसर देता है, लेकिन भंडार की सुरक्षा क्षमता का अनुपात एक समान नहीं रहता। नेपाल 28 प्रतिशत निर्भरता के साथ 12.4 महीने का आयात कवर रखता है, पाकिस्तान 10 प्रतिशत निर्भरता पर केवल 2.4 महीने का कवर रख पाता है, जबकि भारत मात्र 3.5 प्रतिशत निर्भरता के बावजूद 8.4 महीने का आयात कवर संभालता है।
- विनिमय दर की स्थिरता: मुद्रा की कीमत को स्थिर रखने में केवल विदेशी धन की भूमिका सबसे कमजोर पाई गई है। श्रीलंका में रिकॉर्ड आमद के बाद भी मुद्रा टूटी, भारत में कम निर्भरता के बाद भी स्थिरता रही, और नेपाल में स्थिरता का कारण विदेशी मुद्रा का प्रवाह नहीं बल्कि विनिमय दर की निश्चित व्यवस्था है।
समग्र रूप से प्रवासियों द्वारा भेजा जाने वाला धन अर्थव्यवस्था के लिए एक बाहरी झटके को सहने वाले माध्यम के रूप में कार्य करता है। यह विदेशी मुद्रा की आपूर्ति बढ़ाकर गिरावट के दबाव को धीमा जरूर कर सकता है, लेकिन यह कभी भी मजबूत निर्यात, टिकाऊ आयात स्तर, नियंत्रित विदेशी कर्ज और एक भरोसेमंद मौद्रिक नीति का विकल्प नहीं बन सकता।



















