पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा देश भर में अपनी भव्यता और अनूठी सजावट के लिए पहचानी जाती है। अगर आप फरीदाबाद में रहकर ही बंगाल के इस पावन उत्सव का वास्तविक आनंद उठाना चाहते हैं, तो इस बार सेक्टर-3 का रुख कर सकते हैं। यहाँ प्रवासी संस्था के तत्वावधान में एक विशेष दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है, जिसने स्थानीय लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचना शुरू कर दिया है। इस वर्ष के पंडाल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे असम की समृद्ध कला और संस्कृति की अनूठी झलक के साथ तैयार किया जा रहा है। पंडाल को सजाने के लिए बांस से बनी पारंपरिक टोकरियों, सूप और प्राचीन हस्तकला का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है, जो इसे बेहद आकर्षक रूप दे रहा है।
डेढ़ महीने की मेहनत और कारीगरों का योगदान
इस भव्य पंडाल को मूर्त रूप देने के लिए पिछले करीब डेढ़ महीने से 12 कुशल कारीगर दिन-रात मेहनत करने में जुटे हुए हैं। इस पूरे निर्माण कार्य पर लगभग 9 लाख रुपये की लागत आने का अनुमान लगाया गया है। आयोजन से जुड़े शायोन सरकार ने जानकारी दी कि प्रवासी संस्था पिछले 31 वर्षों से लगातार यहाँ दुर्गा पूजा का सफल आयोजन करती आ रही है। यह भव्य उत्सव किसी एक व्यक्ति के प्रयासों का परिणाम नहीं है, बल्कि पूरी समिति और टीम के सदस्यों की सामूहिक मेहनत का सुफल है। निर्माण कार्य में जुटे ये 12 कारीगर विशेष रूप से बिहार, पश्चिम बंगाल और असम से फरीदाबाद पहुँचे हैं। असम के स्थानीय कारीगरों की सीधी मौजूदगी से वहाँ की पारंपरिक कला और सूक्ष्म डिजाइनों को समझने तथा पंडाल में उतारने में बहुत मदद मिली है। पंडाल का काम अब अपने अंतिम चरण में है और इसे 14 अक्टूबर की रात 12 बजे से 1 बजे के बीच पूरी तरह तैयार करके सौंपे जाने की पूरी उम्मीद जताई गई है।
संस्कृति का अनूठा संगम और माँ दुर्गा की प्रतिमा
शायोन सरकार के अनुसार, भौगोलिक रूप से असम और बंगाल पड़ोसी राज्य हैं और दोनों की संस्कृति में कई समानताएँ पाई जाती हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए इस बार के पंडाल की परिकल्पना को असम की लोक कला पर आधारित किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य असम की पारंपरिक हस्तशिल्प कला और बंगाल की सांस्कृतिक विरासत को एक ही मंच पर सफलतापूर्वक प्रदर्शित करना है। असम में बांस से सूप और टोकरी जैसी उपयोगी वस्तुएँ बनाई जाती हैं, और इन्हीं पारंपरिक तत्वों से प्रेरित होकर पंडाल का बाहरी हिस्सा सजाया जा रहा है। इसमें की गई बारीक हाथ की कारीगरी असम की कला संस्कृति की जीवंत तस्वीर पेश करती है। दूसरी ओर, पंडाल के अंदरूनी हिस्से में पूरी तरह से बंगाल की पारंपरिक संस्कृति देखने को मिलेगी, जहाँ पूजा-पाठ, अनुष्ठान और मंत्रों का उच्चारित होना पूरी तरह से बंगाली परंपरा के अनुसार ही संपन्न होगा। प्रवासी संस्था की यह हमेशा से विशेषता रही है कि वह हर साल दुर्गा पूजा के लिए एक नई और अलग थीम का चुनाव करती है। पिछले वर्ष इस पंडाल की मुख्य थीम अयोध्या के भव्य राम मंदिर पर आधारित थी, जबकि उससे पहले केदारनाथ और काशी विश्वनाथ जैसे देश के प्रतिष्ठित धार्मिक स्थलों की झांकियाँ भी सजाई जा चुकी हैं। संस्था का निरंतर यही प्रयास रहता है कि सनातन धर्म से जुड़े पवित्र स्थलों और देश की सांस्कृतिक धरोहर की एक सुंदर झलक आम जनता तक पहुँचाई जाए। इसके अलावा, इस बार की दुर्गा पूजा में स्थापित होने वाली माँ की प्रतिमा भी बेहद खास होने वाली है। इस प्रतिमा की कुल ऊँचाई लगभग 14 फीट है और इसे विशेष रूप से दिल्ली में तैयार करवाया जा रहा है। मूर्ति निर्माण के लिए शिल्पकार पश्चिम बंगाल से आते हैं और मूर्ति के लिए आवश्यक पवित्र मिट्टी तथा अन्य समस्त सामग्री भी विशेष रूप से वहीं से मंगाई जाती है।
पंचमी पर डांडिया और आनंद मेला का विशेष आयोजन
इस वर्ष के आयोजनों में कुछ नए आकर्षण भी जोड़े गए हैं, जिनमें पंचमी के दिन पहली बार भव्य डांडिया का आयोजन शामिल है। इसके साथ ही पारंपरिक आनंद मेला भी लगाया जाएगा, जिसमें संस्था से जुड़ी महिलाएँ अपने-अपने घरों से विशेष रूप से स्वादिष्ट पकवान बनाकर लाएँगी और आने वाले श्रद्धालुओं को परोसेंगी। इस तरह के आयोजनों का मुख्य उद्देश्य समाज के सभी वर्गों को आपस में जोड़ना और मिलजुलकर इस महान पर्व का आनंद उठाना है। शायोन सरकार ने बताया कि इस डांडिया कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए अब तक बड़ी संख्या में लोगों ने अपने नाम दर्ज कराते हुए पंजीकरण करवाया है। कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को सर्वोपरि रखते हुए इसमें शामिल होने के लिए 200 रुपये का एक सामान्य टोकन शुल्क रखा गया है। इसका एकमात्र उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बिना उचित व्यवस्था के कोई भी व्यक्ति अनियंत्रित रूप से प्रवेश न कर सके, जिससे पूरे आयोजन के दौरान शांति और सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह से बनी रहे।





















