खेल की दुनिया में अपने बच्चों का उज्ज्वल भविष्य तलाश रहे अभिभावकों के लिए जिम्नास्टिक एक शानदार विकल्प बनकर उभर रहा है। सही उम्र में मिली वैज्ञानिक ट्रेनिंग और कड़े अनुशासन के बल पर नन्हे खिलाड़ी राज्य स्तर से लेकर वैश्विक मंचों तक अपनी धाक जमा सकते हैं। हरियाणा के अंबाला छावनी स्थित खेल स्टेडियम में इस समय आधुनिक खेल सुविधाओं का एक मजबूत ढांचा तैयार हो चुका है, जहां न केवल स्थानीय बच्चे बल्कि आसपास के अन्य क्षेत्रों के उभरते खिलाड़ी भी खेल के गुर सीख रहे हैं।
फ्रांस से पहुंचे ओलंपिक स्तर के उपकरण
अंबाला छावनी के खेल परिसर में स्थापित जिम्नास्टिक हॉल उत्तर भारत के सबसे समृद्ध प्रशिक्षण केंद्रों में गिना जाने लगा है। इस हॉल की सबसे बड़ी खासियत यहां मौजूद खेल संसाधन हैं, जिन्हें विशेष रूप से फ्रांस से मंगवाया गया है। यह साजोसामान सीधे ओलंपिक मानकों के अनुरूप है, जिससे बच्चों को शुरुआत से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर के माहौल में अभ्यास करने का अवसर मिलता है। हर सुबह 5:30 बजे करीब 50 नन्हे खिलाड़ी अपनी ट्रेनिंग के लिए स्टेडियम पहुंच जाते हैं और कड़े अभ्यास सत्र में पसीना बहाते हैं।
ट्रेनिंग शुरू करने की सही उम्र और 10 साल की तपस्या
जिम्नास्टिक कोच सतपाल छाबड़ा के अनुसार इस खेल में शीर्ष स्तर पर पहुंचने के लिए प्रारंभिक चरण बेहद अहम होता है। उनका स्पष्ट मानना है कि अगर बच्चे को 5 से 6 साल की उम्र में इस खेल से जोड़ दिया जाए, तो उसके शरीर का लचीलापन और संतुलन बहुत तेजी से विकसित होता है। जिम्नास्टिक कोई ऐसा खेल नहीं है जिसमें दो या तीन साल की ट्रेनिंग के बाद अंतरराष्ट्रीय पदक की उम्मीद की जा सके। शारीरिक मजबूती, संतुलन और जटिल तकनीकी कौशल को पूरी तरह साधने में लगभग 10 साल का समय लग जाता है। यदि कोई नन्हा एथलीट पांच वर्ष की आयु से नियमित अभ्यास शुरू करता है, तो 20 वर्ष का होते-होते वह दुनिया की शीर्ष प्रतियोगिताओं में मुकाबला करने की स्थिति में पहुंच जाता है।
पढ़ाई और खेल के बीच तालमेल जरूरी
अक्सर अभिभावकों को यह चिंता सताती है कि गंभीर खेल अभ्यास से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। कोच छाबड़ा ने स्पष्ट किया कि सुबह के समय लगभग एक घंटे का नियमित अभ्यास दिनचर्या का हिस्सा बनाकर स्कूल की पढ़ाई को भी बिना किसी रुकावट के जारी रखा जा सकता है। शुरुआती दिनों में बच्चों की लगन बनाए रखने के लिए माता-पिता और प्रशिक्षक दोनों की संयुक्त प्रेरणा जरूरी होती है। एक बार जब खेल के प्रति बच्चों की रुचि और अनुशासन स्थापित हो जाता है, तो वे स्वयं सुबह मैदान में आने के लिए उत्साहित रहते हैं।
अंबाला की समृद्ध विरासत और करियर की संभावनाएं
अंबाला की धरती ने जिम्नास्टिक को कई बड़े नाम दिए हैं। इस केंद्र से जुड़ी अंजू दुआ और सुनीता शर्मा को देश के प्रतिष्ठित अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा योगेश्वर भी राष्ट्रीय चैंपियन रहने के साथ अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, जिन्हें सतपाल छाबड़ा ने स्वयं कोचिंग दी थी।
इस खेल में शानदार प्रदर्शन करने वाले युवाओं के लिए आगे चलकर रोजगार के कई मजबूत अवसर खुलते हैं। राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले खिलाड़ी खेल कोटे के जरिए सरकारी नौकरियों के हकदार बनते हैं। इसके अलावा हरियाणा में प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के रहने के लिए स्पोर्ट्स हॉस्टल और उचित खान-पान से जुड़ी आवश्यक सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं, जिससे खिलाड़ी बिना किसी आर्थिक दबाव के अपने खेल पर ध्यान केंद्रित रख सकें।





















