लिवर में होने वाली हेपेटाइटिस की समस्या आज दुनिया भर में लाखों लोगों के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा बन चुकी है। यह गंभीर संक्रमण लिवर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाकर एक्यूट या क्रोनिक लिवर फेल्योर जैसी जानलेवा स्थितियों में बदल सकता है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के विशेषज्ञों ने चेतावनी जारी की है कि यह बीमारी बिना किसी शुरुआती लक्षण के सालों तक शरीर के भीतर चुपचाप पनपती रहती है। यदि समय रहते इसकी पहचान और जांच न की जाए, तो आगे चलकर यह सिरोसिस, लिवर फेलियर या लिवर कैंसर का रूप ले लेती है। इसलिए शुरुआती चरण में ही नियमित जांच करवाना अत्यंत आवश्यक है।
वैश्विक और भारतीय स्तर पर हेपेटाइटिस का खतरनाक आंकड़ा
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में लगभग 25.4 करोड़ लोग क्रोनिक हेपेटाइटिस बी की चपेट में हैं, जबकि 5 करोड़ लोग हेपेटाइटिस सी के संक्रमण से जूझ रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि दुनिया के कुल हेपेटाइटिस बोझ का लगभग दो-तिहाई हिस्सा जिन 10 देशों में मौजूद है, उनमें भारत भी शामिल है।
भारत में इस बीमारी का प्रसार बेहद व्यापक है। स्वास्थ्य अनुमानों के अनुसार भारत में करीब 4 करोड़ लोग क्रोनिक हेपेटाइटिस बी से पीड़ित हैं, वहीं 60 लाख से 1.2 करोड़ लोग हेपेटाइटिस सी से ग्रसित हैं। इसके बावजूद एक बड़ी आबादी अपनी इस बीमारी से अनजान रहती है, जिसके कारण अधिकांश संक्रमित मरीजों को सही समय पर जांच और इलाज की सुविधा नहीं मिल पाती।
लिवर के 500 से अधिक कार्य और हेपेटाइटिस का प्रभाव
एम्स के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रो. प्रमोद गर्ग के अनुसार लिवर मानव शरीर का सबसे महत्वपूर्ण और बहुउपयोगी अंग है। यह पाचन प्रक्रिया को संचालित करने, मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करने, शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी को मजबूत बनाने जैसे 500 से भी अधिक आवश्यक कार्य संपन्न करता है।
जब लिवर के ऊतकों में सूजन आ जाती है, तो उस चिकित्सकीय स्थिति को हेपेटाइटिस कहा जाता है। यह स्थिति अल्पकालिक यानी एक्यूट अथवा लंबी अवधि तक रहने वाली यानी क्रोनिक हो सकती है। यदि संक्रमण 6 महीने से अधिक समय तक बना रहता है, तो उसे क्रोनिक हेपेटाइटिस माना जाता है। क्रोनिक संक्रमण बिना किसी स्पष्ट लक्षण के धीरे-धीरे लिवर की संरचना को नष्ट करता रहता है।
एक्यूट और क्रोनिक हेपेटाइटिस के लक्षण और वायरस के प्रकार
एम्स के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विशेषज्ञ प्रो. शालीमार ने बताया कि एक्यूट हेपेटाइटिस से पीड़ित मरीजों में पीलिया, मतली, उल्टी और भूख न लगने जैसे स्पष्ट लक्षण देखने को मिलते हैं। उचित देखभाल के साथ अधिकांश मरीज 4 से 6 हफ्तों के भीतर पूरी तरह ठीक हो जाते हैं। हालांकि, यदि क्रोनिक हेपेटाइटिस का समय पर इलाज न किया जाए, तो यह बिना कोई संकेत दिए सिरोसिस, लिवर फेलियर और लिवर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों में बदल जाता है। कई मरीजों को अपनी बीमारी का पता तब चलता है जब लिवर को अपूरणीय क्षति पहुंच चुकी होती है।
हेपेटाइटिस की बीमारी मुख्य रूप से पांच प्रमुख वायरसों ए, बी, सी, डी और ई के कारण होती है। इसके अलावा अत्यधिक शराब का सेवन, कुछ दवाओं का दुष्परिणाम और ऑटोइम्यून बीमारियां भी लिवर की सूजन का कारण बनती हैं। इन वायरसों में हेपेटाइटिस बी और सी सबसे अधिक खतरनाक माने जाते हैं क्योंकि ये शरीर को लंबी अवधि तक नुकसान पहुंचाते हैं। प्रसार के मामले में हेपेटाइटिस ए और ई दूषित भोजन और पानी से फैलते हैं, जबकि हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमित रक्त, असुरक्षित सुइयों, असुरक्षित यौन संबंधों और संक्रमित मां से उसके बच्चे में संचारित होते हैं।
इलाज की आधुनिक संभावनाएं और हेपेटाइटिस बी व सी का उपचार
चिकित्सीय क्षेत्र में हुए तकनीकी सुधारों पर बात करते हुए प्रो. शालीमार ने स्पष्ट किया कि वर्तमान समय में हेपेटाइटिस का इलाज पहले की तुलना में काफी बेहतर और सुलभ हो चुका है। हेपेटाइटिस बी के संक्रमण को लंबी अवधि तक दी जाने वाली एंटीवायरल दवाओं के माध्यम से सफलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है।
दूसरी ओर, हेपेटाइटिस सी के उपचार में क्रांतिकारी बदलाव आया है। अब मात्र 3 महीने तक चलने वाले ओरल दवा कोर्स से 95 प्रतिशत से अधिक मरीजों में हेपेटाइटिस सी का पूरी तरह से खात्मा संभव हो चुका है। हालांकि, यदि बीमारी का पता बहुत देर से चलता है और लिवर अत्यधिक क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो मरीज को बचाने के लिए लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बचता है।
गलत जीवनशैली और फैटी लिवर का बढ़ता नया खतरा
वर्तमान दौर में लिवर के लिए केवल हेपेटाइटिस वायरस ही अकेला खतरा नहीं रह गया है। आधुनिक जीवनशैली, मोटापा, डायबिटीज, असंतुलित खान-पान और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण फैटी लिवर की समस्या तेजी से अपने पैर पसार रही है।
विभिन्न शोध अध्ययनों के अनुसार लगभग 38 प्रतिशत भारतीय वयस्क और 35 प्रतिशत बच्चे फैटी लिवर की बीमारी से प्रभावित हैं। इसके साथ ही अत्यधिक मात्रा में शराब पीने की आदत भी लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचा रही है और यह सिरोसिस तथा लिवर फेलियर का एक प्रमुख कारण बनी हुई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह है कि लिवर की सुरक्षा के लिए नियमित जांच और जीवनशैली में बदलाव बेहद जरूरी हैं।



















