प्राकृतिक आपदाओं, सुरक्षा खतरों या आपराधिक जांच के दौरान जानवरों की संवेदनशीलता हमेशा इंसानों से आगे रही है। विशेष रूप से कुत्तों की सूंघने की तीव्र क्षमता का उपयोग लंबे समय से सेना और पुलिस बलों द्वारा विस्फोटक एवं नशीले पदार्थों की खोज के लिए किया जाता रहा है। अब यही प्राकृतिक क्षमता चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी मोड़ लेती दिख रही है। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु के पास स्थित स्टार्टअप डॉग्नोसिस ने एक नया शोध पत्र और तकनीक प्रस्तुत की है, जिसमें यह दावा किया गया है कि प्रशिक्षित कुत्ते मानव शरीर में पनप रहे कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की उपस्थिति को भी सूंघकर पहचान सकते हैं।
श्वसन मास्क से कैंसर की जांच की अनोखी प्रक्रिया
डॉग्नोसिस द्वारा विकसित की गई यह जांच प्रक्रिया बेहद सरल और मरीज के लिए पूरी तरह से दर्द-रहित है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले मरीज को लगभग 10 मिनट तक एक विशेष कॉटन मास्क पहनकर उसमें सांस लेनी होती है। 10 मिनट की इस अवधि के दौरान मरीज के सांस छोड़ने से मास्क कपड़े पर शरीर के बारीक वाष्पशील रासायनिक घटक जमा हो जाते हैं। इसके बाद इस मास्क को सुरक्षित रूप से प्रयोगशाला में भेजा जाता है, जहां प्रशिक्षित कुत्तों को सैंपल सूंघने के लिए दिया जाता है।
प्रयोगशाला का दृश्य किसी आधुनिक विज्ञान कथा फिल्म जैसा प्रतीत होता है। जब कुत्ते मास्क के सैंपल को सूंघते हैं, तो उनकी शारीरिक गतिविधियों, सांस लेने के पैटर्न और प्रतिक्रियाओं को उन्नत सेंसरों की सहायता से बारीकी से रिकॉर्ड किया जाता है। इसके बाद इन एकत्रित संकेतों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI एल्गोरिदम द्वारा विश्लेषित किया जाता है। यदि कुत्ता कैंसर से प्रभावित सैंपल पर विशिष्ट प्रतिक्रिया देता है, तो AI सेंसर डेटा के आधार पर इसकी पुष्टि करता है। इस प्रकार केवल 10 मिनट की सांस का सैंपल और कुछ मिनटों का तकनीकी विश्लेषण जांच के परिणाम सामने ला देता है।
कर्नाटक के अस्पतालों में परीक्षण और 90 प्रतिशत सटीकता
यह शोध केवल एक सैद्धांतिक अवधारणा नहीं है, बल्कि इसे व्यापक क्लीनिकल अध्ययनों के माध्यम से परखा गया है। कंपनी के अनुसार, कर्नाटक के 6 प्रमुख अस्पतालों में 1,500 से अधिक लोगों पर यह परीक्षण सफलता पूर्वक आयोजित किया गया। इस अध्ययन के दौरान एकत्र किए गए नमूनों की जांच में कुत्तों और AI के इस एकीकृत मॉडल ने 7 अलग-अलग प्रकार के कैंसर की पहचान करने में 90 प्रतिशत से अधिक सटीकता प्रदर्शित की है।
मेडिकल जगत में 90 प्रतिशत से अधिक की सटीकता दर को अत्यंत भरोसेमंद और आशाजनक माना जाता है। प्रारंभिक स्तर पर इतने बड़े पैमाने पर किए गए परीक्षणों के परिणाम यह दर्शाते हैं कि कुत्तों की सूंघने की शक्ति और एआई तकनीक का मिश्रण भविष्य में प्राथमिक कैंसर स्क्रीनिंग का एक मजबूत विकल्प बन सकता है।
कैंसर के रासायनिक संकेतों को समझने का वैज्ञानिक प्रयास
इस पूरी प्रक्रिया के पीछे का वैज्ञानिक आधार मानव शरीर की जैविक कार्यप्रणाली पर निर्भर करता है। वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का मानना है कि जब मानव शरीर में कैंसर की कोशिकाएं पनपने लगती हैं, तो शरीर कुछ विशिष्ट प्रकार के रासायनिक यौगिकों या वाष्पशील कार्बनिक तत्वों का उत्सर्जन करने लगता है। ये रासायनिक संकेत इतने सूक्ष्म होते हैं कि इंसानी नाक उन्हें महसूस करने में पूरी तरह असमर्थ रहती है।
इसके विपरीत, कुत्तों की सूंघने की ग्रंथि इंसानों की तुलना में कई हजार गुना अधिक संवेदनशील होती है। वैज्ञानिक अध्ययनों में पहले भी यह साबित हो चुका है कि प्रशिक्षित कुत्ते सांस, पसीने और मूत्र के नमूनों में मौजूद गंध के मामूली अंतर को भी तुरंत भांप सकते हैं। बेंगलुरु के वैज्ञानिकों का मुख्य उद्देश्य केवल कुत्तों से जांच कराना नहीं है, बल्कि उन विशिष्ट रासायनिक यौगिकों के पैटर्न को समझना है जिन्हें कुत्ते पहचानते हैं। यदि वैज्ञानिक इन गंध संकेतों की सटीक रासायनिक संरचना को डिकोड कर लेते हैं, तो भविष्य में ऐसी मशीनें बनाई जा सकेंगी जो कुत्तों जितनी ही संवेदनशीलता के साथ कैंसर का पता लगा सकेंगी।
बड़े पैमाने पर मेडिकल स्क्रीनिंग की चुनौतियां और भविष्य
हालांकि शुरुआती नतीजे बेहद उत्साहजनक हैं, लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक को आम अस्पतालों में रोजमर्रा की मेडिकल जांच का हिस्सा बनाने से पहले व्यापक स्तर पर और अधिक टेस्टिंग की आवश्यकता है। किसी शोध के शुरुआती सकारात्मक परिणाम और उसका व्यावहारिक चिकित्सा प्रणाली में इस्तेमाल होना दो अलग बातें हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े पैमाने पर मेडिकल स्क्रीनिंग सिस्टम में कुत्तों को शामिल करना आसान नहीं होगा। कुत्तों की नियमित ट्रेनिंग, उनकी उचित देखभाल, और हर दिन एक समान सटीकता बनाए रखना एक बड़ी व्यावहारिक चुनौती है। वर्तमान स्थिति में यह कहना समय से पहले होगा कि कुत्ते तुरंत डॉक्टरों या पारंपरिक प्रयोगशाला जांचों की जगह ले लेंगे। फिर भी, यह शोध कैंसर की शुरुआती अवस्था में पहचान करने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है और भविष्य में मरीजों की मेडिकल यात्रा में एक सहायक की भूमिका निभा सकता है।



















