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भीड़ भरे शहरों में क्यों बढ़ रहा अकेलापन और तनाव, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने बताए बचाव के तरीकेस्वास्थ्य
6 अक्तू॰ 2026, 7:25 pm (31 मिनट पहले)· 1

भीड़ भरे शहरों में क्यों बढ़ रहा अकेलापन और तनाव, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने बताए बचाव के तरीके

शहरी चकाचौंध के बीच लोग भावनात्मक अलगाव, अनिद्रा और रिश्तों में खिंचाव झेल रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. आरके बंसल ने संवाद, दिनचर्या में सुधार और समय पर मदद लेने को इसका समाधान बताया है।

आधुनिक शहरी चमक, बहुमंजिला सोसाइटियों और व्यस्त जीवनशैली के बीच अकेलापन एक विकराल चुनौती का रूप लेता जा रहा है। सैकड़ों पड़ोसियों और दफ्तर के साथियों के बीच रहने के बाद भी कई नागरिक खुद को अंदर से बिल्कुल तन्हा महसूस कर रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. आरके बंसल का मानना है कि अकेलापन या तनाव सिर्फ आलीशान सोसाइटियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक फैला हुआ है। इंसान के आस-पास का सामाजिक ढांचा, परिवार व दोस्तों से जुड़ाव, पड़ोसियों से संवाद और नशे की लत सीधे तौर पर उसके मानसिक संतुलन को प्रभावित करती है। वास्तविक मेल-जोल घटने और डिजिटल दुनिया पर निर्भरता बढ़ने से यह भावनात्मक खाई और चौड़ी होती जा रही है।

डिजिटल स्क्रीन की गिरफ्त और बिगड़ा हुआ दैनिक चक्र

लोगों के दिनचर्या में मोबाइल फोन और आभासी मंचों ने भारी उथल-पुथल मचाई है। कई लोग पूरी रात फोन और सोशल मीडिया मंचों पर समय गंवाते हैं, सुबह आठ या नौ बजे सोने जाते हैं और शाम को सात-आठ बजे सोकर उठते हैं। उठने के बाद भोजन करते ही वे दोबारा स्क्रीन की दुनिया में खो जाते हैं। बीते दो दशकों के दौरान संचार उपकरणों ने आम दिनचर्या की रूपरेखा ही बदल दी है। अब केवल युवा पीढ़ी ही नहीं, बल्कि अधेड़ उम्र के लोग और बुजुर्ग भी आभासी दुनिया में अत्यधिक समय गुजार रहे हैं। दूसरी ओर, बच्चों में खुले मैदानों के खेलों की जगह स्क्रीन गेम्स ने ले ली है, जिसका नकारात्मक असर उनके शारीरिक और दिमागी विकास पर पड़ रहा है।

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रिश्तों में खटास, शिफ्ट ड्यूटी और आर्थिक उलझनें

मानसिक दबाव के प्रमुख कारणों में आपसी संबंधों का कमजोर होना, वैवाहिक विवाद, तलाक, बेवफाई, अविश्वास और एक-दूसरे को पर्याप्त वक्त न दे पाना शामिल हैं। इसके साथ ही कर्ज और नशे की लत भी स्थिति को बदतर बना देती है। बड़े औद्योगिक शहरों में शिफ्टों में नौकरी करने वाले कर्मचारियों की तादाद बहुत ज्यादा है। जब पति और पत्नी की ड्यूटी अलग-अलग समय पर होती है, तो उन्हें साथ बैठकर बात करने या वक्त बिताने का अवसर नहीं मिलता। किसी भी रिश्ते की मजबूती नियमित बातचीत, समय बिताने और परस्पर देखभाल पर टिकी होती है। कई बार कर्ज के जाल में उलझे लोग अपनी पीड़ा अपने माता-पिता या भाई-बहनों से छिपाते हैं। चाहे वह नशे से उपजा कर्ज हो या अपनों से भावनात्मक दूरी, दोनों ही चीजें व्यक्ति को गहरे अवसाद की ओर धकेलती हैं।

समस्याओं को बड़ा मान लेने की प्रवृत्ति और चिकित्सा सहायता

अक्सर मानसिक दबाव से घिरे लोग अपनी परेशानी को सोच-सोचकर वास्तविकता से कहीं अधिक गंभीर मान बैठते हैं। लगभग 99 प्रतिशत मामलों में इंसान अपनी तकलीफ को मन ही मन इतना विशाल बना लेता है कि उसे आगे का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। इसके बावजूद डिप्रेशन या मानसिक व्याधियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर पेशेवर मनोचिकित्सक से परामर्श, काउंसलिंग और चिकित्सकीय दवाओं का सहारा लेना बेहद जरूरी है। सामाजिक झिझक के चलते कई लोग अपनी निजी व्यथा अपने स्वजनों तक नहीं पहुंचा पाते, जिससे मानसिक घुटन बढ़ती चली जाती है।

क्षणभंगुर नकारात्मक विचार और गीता के संवाद से सीख

आत्महत्या का ख्याल कई बार केवल कुछ सेकंड या कुछ मिनटों के लिए दिमाग पर हावी होता है। ऐसे नाजुक पलों में व्यक्ति को बिल्कुल अकेला नहीं रहना चाहिए। तुरंत किसी मित्र, माता-पिता, भाई-बहन, पड़ोसी या भरोसेमंद साथी से फोन पर बात शुरू कर देनी चाहिए। थोड़ी देर का यह संवाद उस नकारात्मक विचार की तीव्रता को कमजोर कर देता है। जीवन की कोई भी विषम परिस्थिति हमेशा रहने वाली नहीं होती, वक्त बदलने के साथ हालात सुधर जाते हैं। इसलिए डरने के बजाय अपनी बात अपनों से साझा करनी चाहिए। यदि किसी परिचित के व्यवहार में अचानक असामान्य बदलाव, भारी तनाव या गहरी निराशा दिखाई दे, तो तुरंत सतर्क होकर विशेषज्ञ की मदद दिलानी चाहिए। सोसाइटियों के पार्कों और साझा परिसरों में जाकर लोगों से बातचीत बढ़ाने से अकेलापन घटता है। इसके अलावा, श्रीमद्भगवद्गीता को एक तरह की जीवन काउंसलिंग पुस्तक माना जा सकता है, जिसमें संकटों से निपटने और संवाद के जरिए समाधान खोजने का मार्गदर्शन मिलता है।

सवाल-जवाब

क्या अकेलापन केवल बड़े शहरों और बहुमंजिला इमारतों की समस्या है?
नहीं, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के अनुसार अकेलापन और अवसाद केवल हाईराइज सोसाइटियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह कस्बों और ग्रामीण इलाकों में भी देखा जाता है।
स्क्रीन की लत का आम दिनचर्या पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
कई लोग पूरी रात फोन पर समय बिताते हैं और दिन में सोते हैं, जिससे उनकी स्वाभाविक दिनचर्या और शारीरिक व मानसिक विकास बाधित हो रहा है।
रिश्तों में तनाव का प्रमुख कारण क्या सामने आया है?
अलग-अलग शिफ्ट में काम करना, एक-दूसरे को समय न दे पाना, बातचीत का अभाव, शक और कर्ज जैसी समस्याएं रिश्तों में तनाव पैदा कर रही हैं।
आत्मघाती विचार आने पर व्यक्ति को तुरंत क्या कदम उठाना चाहिए?
ऐसे विचार क्षणिक होते हैं, इसलिए अकेले रहने के बजाय तुरंत किसी परिजन, मित्र या पड़ोसी से फोन पर बात करनी चाहिए।
सोसाइटियों में अकेलापन घटाने के लिए क्या उपाय सुझाए गए हैं?
कमरे में बंद रहने के बजाय पार्क और कॉमन एरिया जैसी जगहों पर जाकर पड़ोसियों से संवाद बढ़ाना चाहिए।
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