कैंसर का निदान सामने आते ही मरीजों और उनके परिजनों में भय का माहौल बनना स्वाभाविक है, लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के विकास के साथ इस बीमारी के उपचार की तस्वीर भी तेजी से बदली है। वर्तमान समय में कैंसर की समय पर पहचान मरीज की जिंदगी बचाने और ट्यूमर को शरीर के बाकी हिस्सों में फैलने से रोकने में सबसे कारगर साबित हो रही है। कुछ कैंसर ऐसे हैं जिनमें आधुनिक चिकित्सा के जरिए पूरी तरह ठीक होने या बीमारी को लंबे समय तक नियंत्रित रखने की संभावनाएं काफी प्रबल होती हैं। वहीं दूसरी तरफ, कुछ कैंसर ऐसे भी हैं जिन्हें अत्यधिक जोखिम भरा और आक्रामक माना जाता है, विशेष रूप से तब जब उनकी पहचान अंतिम चरणों में होती है। इस अंतर को समझने के लिए कैंसर के जैविक व्यवहार और चिकित्सीय विकल्पों को गहराई से देखना आवश्यक है।
ट्यूमर का व्यवहार तय करता है बीमारी की गंभीरता
डॉक्टर प्रभात रंजन, कंसल्टेंट मेडिकल ऑन्कोलॉजी (फोर्टिस ग्रेटर नोएडा) बताते हैं कि कैंसर की हर श्रेणी एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती प्रस्तुत करती है, मगर हर ट्यूमर का जैविक व्यवहार एक समान नहीं होता है। किसी भी कैंसर की घातकता और जोखिम का स्तर मुख्य रूप से तीन प्रमुख पैमानों पर आंका जाता है। पहला पैमाना यह है कि कैंसर कोशिकाएं कितनी तेजी से विभाजित होकर बढ़ रही हैं। दूसरा यह कि क्या वे पास के ऊतकों और शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंगों में तेजी से फैलने की प्रवृत्ति रखती हैं। तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि उस विशेष कैंसर के विरुद्ध उपलब्ध उपचार पद्धतियां कितनी प्रभावी सिद्ध होती हैं। इन्हीं आधारों पर चिकित्सा विशेषज्ञ किसी ट्यूमर के खतरे का मूल्यांकन करते हैं।
किन कैंसरों को माना जाता है अधिक आक्रामक और जोखिम भरा?
चिकित्सीय दृष्टिकोण से अत्यधिक आक्रामक और जानलेवा माने जाने वाले कैंसरों में अग्न्याशय यानी पैंक्रियाज, फेफड़े, लिवर तथा मस्तिष्क के कुछ विशिष्ट प्रकार के कैंसर मुख्य रूप से शामिल हैं। इन अंगों के कैंसर की सबसे बड़ी जटिलता यह होती है कि प्राथमिक अवस्था में मरीज को किसी स्पष्ट या गंभीर शारीरिक कष्ट का अनुभव नहीं होता है। लक्षण न दिखने या बहुत मामूली होने के कारण अधिकांश मामलों में इन बीमारियों की पहचान काफी देर से होती है। जब कैंसर कोशिकाएं प्राथमिक अंग से निकलकर शरीर के अन्य दूरस्थ अंगों में अपनी जड़ें जमा लेती हैं, तो ऑन्कोलॉजिस्ट्स के लिए उनका पूर्ण और प्रभावी उपचार करना अत्यधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है। यही कारण है कि इन अंगों के कैंसर में मृत्यु दर का जोखिम अन्य किस्मों की तुलना में कहीं अधिक देखा जाता है।
कम जोखिम वाले कैंसर और प्रभावी नियंत्रण की संभावनाएं
इसके विपरीत, कैंसर के कुछ ऐसे रूप भी हैं जिनकी यदि सही समय पर पहचान कर ली जाए तो उन्हें सफलतापूर्वक ठीक या नियंत्रित किया जा सकता है। शुरुआती चरणों में पकड़े गए स्तन कैंसर, थायरॉइड कैंसर और प्रोस्टेट कैंसर इस श्रेणी के प्रमुख उदाहरण हैं। इसके साथ ही रक्त से संबंधित कुछ विकारों, जैसे लिंफोमा और ल्यूकेमिया के मामलों में भी आधुनिक दवाओं और लक्षित थेरेपी के चलते अत्यधिक सकारात्मक परिणाम प्राप्त हो रहे हैं। इन बीमारियों के मरीजों में जीवित रहने की दर काफी बेहतर पाई जाती है। इसके बावजूद डॉक्टरों का कहना है कि इन कैंसरों का जैविक व्यवहार भी उनके विशिष्ट प्रकार, उप-प्रकार और मरीज की आनुवंशिक संरचना के आधार पर अलग-अलग मरीजों में भिन्न हो सकता है।
कम जोखिम का अर्थ उपचार में लापरवाही बिल्कुल नहीं
मरीजों और उनके देखभालकर्ताओं के लिए यह स्पष्ट समझना अनिवार्य है कि किसी कैंसर को कम खतरनाक कहे जाने का आशय यह कतई नहीं है कि उसमें चिकित्सीय हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में, शुरुआती चरण में पहचान ही हर प्रकार के कैंसर के सफल उपचार की सबसे बड़ी कुंजी है। किसी भी बीमारी की वास्तविक गंभीरता केवल उसके सामान्य नाम से निर्धारित नहीं होती, बल्कि इसके लिए ट्यूमर का सटीक प्रकार, उसकी स्टेज, ग्रेडिंग, शरीर में उसके प्रसार की सीमा, मरीज का समग्र स्वास्थ्य स्तर तथा उपलब्ध उपचार विकल्पों की उपलब्धता जैसे कारक समान रूप से उत्तरदायी होते हैं।
लक्षणों की समय पर पहचान और विशेषज्ञ की सलाह
शरीर में महसूस होने वाले किसी भी असामान्य बदलाव अथवा लगातार बने रहने वाले अस्वस्थ लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। यदि किसी व्यक्ति को कैंसर से जुड़े किसी भी प्राथमिक लक्षण का संदेह हो, तो बिना विलंब किए ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञ से परामर्श लेकर आवश्यक नैदानिक जांचें करवानी चाहिए। ट्यूमर जितनी प्रारंभिक अवस्था में चिन्हित किया जाएगा, चिकित्सकों के पास उपचार के उतने ही बेहतर विकल्प उपलब्ध होंगे और मरीज के स्वस्थ होने के परिणाम भी उतने ही अनुकूल प्राप्त किए जा सकते हैं।



















