उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले की तराई पट्टी अपनी उपजाऊ मिट्टी, घने जंगलों और अनगिनत प्राकृतिक वनस्पतियों के लिए पहचानी जाती है। इस ग्रामीण अंचल में खेतों की मेड़ों, खाली पड़े भूखंडों और बाग-बगीचों में ऐसी ढेरों घास-फूस उग आती हैं, जिन्हें स्थानीय लोग बेकार का खरपतवार मानकर जड़ से उखाड़ फेंकते हैं। हालांकि, भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धति और आयुर्वेद के नजरिए से देखें तो इन्हीं में छुपे होते हैं गंभीर शारीरिक व्याधियों को दूर करने वाले गुणकारी तत्व। ऐसी ही एक बेहद सुलभ लेकिन चमत्कारी वनस्पति है दूर्वा घास, जिसे धार्मिक कार्यों से लेकर शारीरिक उपचार तक में सदियों से महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
आम तौर पर लोग दूर्वा को घरों के आंगन, खुले मैदानों या खेतों की पगडंडियों पर फैली हुई सामान्य घास मान लेते हैं। यह जमीन पर तेजी से फैलती है और यदि इसे जरा सी भी नमी मिल जाए, तो यह फिर से हरी-भरी हो उठती है। इसकी इसी तेजी से फैलने की आदत की वजह से ग्रामीण इसे अनावश्यक मानकर हटा देते हैं। इसके विपरीत, आयुर्वेद की समृद्ध परंपरा में दूर्वा को एक दिव्य जड़ी-बूटी माना गया है, जिसका उपयोग शारीरिक दोषों को संतुलित करने के लिए किया जाता रहा है।
कषाय रस और शीतल तासीर से शांत होते हैं पित्त और कफ दोष
आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. ऋचा श्रीवास्तव बताती हैं कि दूर्वा घास का स्वाद कषाय यानी कसैला और साथ ही मधुर रस से युक्त होता है। प्रकृति के लिहाज से यह अत्यंत शीतल यानी ठंडी तासीर वाली मानी जाती है। आयुर्वेदिक सिद्धांतों के अनुसार, हमारे शरीर में त्रिदोषों का संतुलन ही स्वास्थ्य की आधारशिला है। दूर्वा अपनी ठंडी प्रकृति और विशेष रस विपाक के चलते विशेष तौर पर शरीर में बढ़े हुए पित्त दोष और कफ दोष को शांत करने का कार्य करती है। जब शरीर में अत्यधिक गर्मी या कफ का संचय हो जाता है, तब पारंपरिक नुस्खों में दूर्वा का विविध रूपों में उपयोग किया जाता है।
त्वचा की जलन, एक्जिमा और सोरायसिस में पारंपरिक लेप
डॉ. ऋचा श्रीवास्तव के अनुसार, त्वचा पर होने वाले कई विकारों के निवारण में दूर्वा का ताजा रस अथवा इसका बारीक पेस्ट लगाने की पुरानी परंपरा रही है। जब त्वचा पर भीषण जलन, लालिमा या तीव्र खुजली की समस्या उत्पन्न होती है, तब इसका शीतल लेप तत्काल ठंडक पहुंचाता है। चूंकि इसकी तासीर बेहद ठंडी होती है, इसलिए धूप की कालिमा, लू या अत्यधिक पसीने के कारण पैदा होने वाले त्वचा संक्रमणों में इसका लेप अत्यंत गुणकारी सिद्ध होता है।
कुछ पारंपरिक आयुर्वेदिक प्रयोगों में दूर्वा के पेस्ट को पिसी हुई हल्दी के साथ मिलाकर लगाने की भी सलाह दी जाती है। हल्दी के स्वाभाविक रोगाणुरोधी गुणों और दूर्वा के शीतल प्रभाव का यह मेल त्वचा विकारों पर गहरा असर दिखाता है। डॉ. ऋचा का कहना है कि एक्जिमा, सोरायसिस और पुराने चर्म रोगों जैसी जटिल समस्याओं में भी इस पारंपरिक मिश्रण का उपयोग सदियों से किया जाता आ रहा है, जिससे त्वचा की बेचैनी शांत होती है।
एसिडिटी और पाचन तंत्र की विकृतियों में अत्यंत असरदार
वर्तमान दौर में खान-पान की अस्वास्थ्यकर आदतों, देर रात भोजन करने और तनाव भरी जीवनशैली के चलते पेट से जुड़ी परेशानियां आम हो चुकी हैं। गैस, खट्टी डकारें, सीने में जलन और एसिडिटी की समस्या से हर दूसरा व्यक्ति परेशान रहता है। आयुर्वेद में जठराग्नि को संतुलित करने और आमाशय की अम्लता घटाने के लिए कई प्राकृतिक वनस्पतियों का आश्रय लिया जाता है, जिनमें दूर्वा प्रमुख मानी जाती है। पाचन को सुचारू रखने के लिए दूर्वा के ताजे रस का सेवन पारंपरिक रूप से किया जाता है। यह रस पेट के भीतर बढ़ी हुई गर्मी और तेजाबियत को शांत करने में सहायक होता है।
कब्ज, अतिसार और दस्त की समस्या में घरेलू देखभाल
दूर्वा की उपयोगिता सिर्फ एसिडिटी को कम करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण पाचन संस्थान के कार्यकलाप को सुधारने में भी प्रभावी भूमिका निभाती है। डॉ. ऋचा बताती हैं कि आयुर्वेद में दूर्वा का उपयोग कब्ज के साथ-साथ अतिसार यानी दस्त की स्थिति में भी किया जाता रहा है। पेट की गड़बड़ी के कारण आंतों में होने वाली हलचल और दस्त के अलग-अलग चिकित्सीय कारण हो सकते हैं।
यदि समस्या बहुत सामान्य या हल्की हो, तो ऐसे में घरेलू देखभाल और दूर्वा के पारंपरिक उपयोग से आराम मिल सकता है। लेकिन इस संदर्भ में सतर्कता बरतना भी आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति को लगातार दस्त लग रहे हों, शरीर में पानी की गंभीर कमी महसूस हो रही हो, तेज बुखार आ जाए या फिर मल में खून के अंश दिखाई दें, तो ऐसी स्थिति में घरेलू उपायों पर निर्भर न रहकर तत्काल किसी योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना अनिवार्य हो जाता है।
ओस भीगी दूर्वा पर नंगे पैर चलने से आंखों को लाभ
भारत के ग्रामीण समाज में दूर्वा को लेकर स्वास्थ्य संबंधी कई गहरे अनुभव और लोक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। इन्हीं में से एक बेहद लोकप्रिय और आजमाया हुआ तरीका है सुबह के समय ओस से भीगी दूर्वा घास पर नंगे पैर टहलना। माना जाता है कि प्रातःकाल ताजी हरी दूर्वा पर ओस की बूंदों के बीच नंगे पांव चलने से नेत्र ज्योति बढ़ती है और आंखों का तनाव दूर होता है। डॉ. ऋचा श्रीवास्तव का भी कहना है कि दूर्वा की शीतल प्रकृति के कारण इसे प्राचीन समय से ही दृष्टि और आंखों की शीतलता के लिए बेहद लाभकारी और सुखद माना गया है।
मूत्र मार्ग की जलन और गर्मी के प्रभाव से बचाव
दूर्वा घास का औषधीय दायरा मूत्र संबंधी व्याधियों में भी अत्यंत कारगर बताया जाता है। डॉ. ऋचा श्रीवास्तव के मुताबिक, दूर्वा के ताजे रस का सीमित सेवन करने से पेशाब में होने वाली तीखी जलन से राहत मिलती है। अक्सर गर्मी के मौसम में तेज धूप, पसीने और पानी की कमी के चलते यूरिनरी ट्रैक्ट में जलन की शिकायत बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में शरीर को शीतल रखने वाले पेय और पर्याप्त मात्रा में पानी पीना बेहद जरूरी है, जिसके साथ दूर्वा का पारंपरिक सेवन जलन को शांत करने में मददगार साबित होता है।



















