ग्लैमर की दुनिया में जब भी लिप फिलर्स या प्लास्टिक सर्जरी का जिक्र होता है, अक्सर किसी चैट शो में कलाकारों के लुक्स पर की गई टिप्पणियों की याद ताजा हो जाती है। लेकिन आज बोटॉक्स, फिलर्स और तरह-तरह के कॉस्मेटिक इंजेक्शन केवल फिल्म उद्योग या मॉडल्स तक सीमित नहीं रह गए हैं। शादी ब्याह के अवसर, किसी खास समारोह की तैयारी या फिर इंटरनेट पर अधिक आकर्षक दिखने की ललक में आम लोग भी इन प्रक्रियाओं का सहारा लेने लगे हैं। चेहरे के हर हिस्से को त्रुटिहीन या मनमुताबिक तराशने की यह बेताबी कई बार रूप-रंग के बजाय किसी आंतरिक बेचैनी का संकेत हो सकती है। ब्रिटेन के राष्ट्रीय स्वास्थ्य और देखभाल उत्कृष्टता संस्थान (NICE) का कहना है कि लोगों को बोटॉक्स या डर्मल फिलर्स देने से पहले उनके मानसिक स्वास्थ्य की जांच की जानी चाहिए।
चेहरे की बनावट से आगे आंतरिक उलझनों को समझने की जरूरत
बहुत से लोग लगातार यह महसूस करते हैं कि उनकी नाक ठीक नहीं दिखती या उनके होंठों का आकार आकर्षक नहीं है। इस सोच के वशीभूत होकर वे बार-बार दर्पण के सामने वक्त बिताते हैं, डिजिटल तस्वीरों में बदलाव करते हैं और कई तरह की कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं के फेर में पड़ जाते हैं। अपने रूप-रंग की परवाह करना स्वाभाविक है, परंतु समस्या तब खड़ी होती है जब दोष शारीरिक विशेषताओं में नहीं बल्कि व्यक्ति की स्वयं को देखने की दृष्टि में होता है। जानकारों का कहना है कि ऐसी स्थिति अक्सर बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर (BDD) अथवा ऑब्सेसिव-कम्पल्सिव डिसऑर्डर (OCD) जैसी मानसिक अवस्थाओं से जुड़ी हो सकती है। इन विकारों से प्रभावित व्यक्ति अपने शरीर या चेहरे के अत्यंत सामान्य या मामूली हिस्से को भी एक विशाल खामी मान बैठते हैं। ऐसे लोगों में इन लक्षणों को पहले ही पहचानना आवश्यक है क्योंकि यह अनदेखे रह जाते हैं।
बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर और असंतोष का अंतहीन चक्र
बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर को सामान्य शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है कि यह वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने शरीर या चेहरे के किसी खास पहलू को लेकर अस्वाभाविक रूप से चिंताग्रस्त रहता है। कई बार वह कमी इतनी सूक्ष्म होती है कि आसपास के अन्य लोगों को नजर भी नहीं आती। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी महिला को अपने होंठ बहुत पतले लगते हैं, तो वह पहली बार फिलर लगवा सकती है। कुछ ही दिनों बाद असंतोष रहने पर वह दोबारा इंजेक्शन लेती है और फिर तीसरी बार भी प्रक्रिया दोहराती है, लेकिन मानसिक सुकून तब भी नहीं मिलता। इसका स्पष्ट कारण यह है कि वास्तविक अड़चन होंठों की बनावट में नहीं, बल्कि मन पर बने उस निरंतर दबाव में है जो बार-बार बदलाव के लिए प्रेरित कर रहा है।
डिजिटल स्क्रीन, कृत्रिम फिल्टर और गहराता मानसिक दबाव
ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (NHS) स्पष्ट तौर पर यह परामर्श देती है कि किसी भी कॉस्मेटिक बदलाव का चयन करने से पूर्व व्यक्ति को यह भलीभांति जान लेना चाहिए कि वह यह बदलाव वास्तव में क्यों चाहता है। जब अपेक्षाएं अवास्तविक होती हैं या व्यक्ति यह मान बैठता है कि एक सुई या इंजेक्शन उसकी पूरी जिंदगी बदल देगा, तो उपचार के बाद भी संतोष नहीं मिलता। इसके विपरीत, यदि प्रक्रिया का परिणाम इच्छा के अनुकूल न रहे, तो यह मानसिक तनाव को और अधिक बढ़ा सकता है। इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित फोटो फिल्टरों ने रूप-सौंदर्य के सामान्य मानकों को बहुत हद तक बदल डाला है। स्क्रीन पर दिखने वाली संवरती छवियों को सच मानकर लोग अपने वास्तविक चेहरे को भी वैसा ही रूप देना चाहते हैं। यह दबाव खासतौर पर युवा पीढ़ी के आत्मसम्मान और संतुष्टि को प्रभावित कर रहा है, जिससे बार-बार क्लीनिक जाने का सिलसिला शुरू हो जाता है।
स्वास्थ्य सुरक्षा और अप्रशिक्षित हाथों का बड़ा खतरा
मानसिक पहलू के अलावा कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं से जुड़ी शारीरिक सुरक्षा भी एक अत्यंत संवेदनशील मामला है। ब्रिटेन में संसदीय समितियों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस बात पर कड़ी चिंता जताई है कि अनेक स्थानों पर बिना किसी विधिवत प्रशिक्षण के लोग फिलर्स और अन्य इंजेक्शन लगा रहे हैं। बाजार में नकली और गैर-मान्यता प्राप्त उत्पादों के उपयोग से कई गंभीर शारीरिक समस्याएं सामने आई हैं। स्वास्थ्य सेवा के अनुसार, डर्मल फिलर्स के कारण त्वचा में संक्रमण, नसों को स्थायी क्षति और कुछ दुर्लभ परिस्थितियों में आंखों की रोशनी जाने तक का गंभीर जोखिम रहता है। किसी भी प्रक्रिया में यह खतरे तब और बढ़ जाते हैं जब उसे अप्रशिक्षित केंद्रों पर कराया जाता है।
भारतीय संदर्भ में कॉस्मेटिक प्रक्रियाएं और उचित चयन
भारत में भी बोटॉक्स और फिलर्स का दायरा बहुत तीव्र गति से फैल रहा है। बड़े शहरों में जगह-जगह आधुनिक एस्थेटिक क्लीनिक खुल रहे हैं और लोगों का रुझान बढ़ रहा है। देश में अभी ऐसी प्रक्रियाओं से पहले मानसिक स्वास्थ्य की अनिवार्य जांच का कोई औपचारिक नियम लागू नहीं है। इसके बावजूद मनोचिकित्सक और प्लास्टिक सर्जन लगातार यह विचार रखते हैं कि जिन व्यक्तियों में बहुत अधिक घबराहट, गहरा असंतोष या शारीरिक रूप को लेकर जुनूनी सोच दिखाई देती है, उनकी मनोवैज्ञानिक पड़ताल अवश्य होनी चाहिए। विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि किसी भी व्यक्ति से सिर्फ यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि वह क्या बदलना चाहता है, बल्कि सबसे अहम सवाल यह है कि वह यह बदलाव क्यों कराना चाहता है। कॉस्मेटिक इंजेक्शन स्वयं में गलत नहीं हैं और वे कई बार लोगों का आत्मविश्वास भी बढ़ाते हैं, परंतु यह निर्णय तभी सुरक्षित और सार्थक होता है जब इसे सही वजहों और पूरी समझदारी के साथ लिया जाए।



















