दफ्तर के लंबे काम, परीक्षा की तैयारी, लंबी यात्रा या फिर स्मार्टफोन पर देर रात तक स्क्रीन देखने की लत की वजह से कई बार रातभर जागना आम बात बन जाती है। जब कोई व्यक्ति लगातार 24 घंटे तक बिना सोए रहता है, तो उसका असर केवल सामान्य सुस्ती या जम्हाई आने तक ही सीमित नहीं रहता। पर्याप्त विश्राम न मिलने के कारण मानव शरीर, मस्तिष्क की कार्यक्षमता, देखने-सुनने की संवेदनशीलता और मूड में कई तात्कालिक और परेशान करने वाले बदलाव आने लगते हैं।
चेहरे की बनावट और त्वचा पर दिखने वाले अस्थायी लक्षण
पूरी एक रात की नींद न मिलने के बाद व्यक्ति का चेहरा सामान्य दिनों की अपेक्षा काफी ज्यादा थका हुआ और बेजान दिखाई देने लगता है। आंखों के आसपास भारीपन, पलकों में सूजन, सुस्ती और ताजगी की भारी कमी साफ नजर आने लगती है। रात में नींद के दौरान शरीर और मस्तिष्क खुद को प्राकृतिक तौर पर रीसेट और रिपेयर करते हैं, जो विश्राम न मिलने पर बाधित हो जाता है।
राहत की बात यह है कि 24 घंटे तक जागे रहने से चेहरे या त्वचा पर कोई स्थायी विकार या नुकसान नहीं होता। जब व्यक्ति दोबारा पर्याप्त और गहरी नींद पूरी कर लेता है, तो आंखों का यह भारीपन और चेहरे पर छाई थकान पूरी तरह से दूर हो जाती है और त्वचा अपनी सामान्य चमक वापस पा लेती है।
मस्तिष्क की क्षमता पर शराब के नशे जैसा असर
लगातार 24 घंटे जागने का सबसे खतरनाक और बड़ा प्रभाव दिमाग के कामकाज पर देखा जाता है। किसी जरूरी काम पर ध्यान केंद्रित करने, जटिल समस्याओं को सुलझाने और त्वरित निर्णय लेने में अत्यधिक परेशानी होने लगती है। याददाश्त भी काफी कमजोर हो जाती है, जिससे छोटी-छोटी बातों को याद रखना या सोचना भी सामान्य से कहीं अधिक कठिन लगने लगता है।
24 घंटे तक बिना सोए रहने की स्थिति में मानव मस्तिष्क की प्रतिक्रिया देने की क्षमता इतनी घट जाती है कि इसकी तुलना शराब के नशे की हालत से की जाती है। इसी कारण रातभर जागने के बाद किसी भी तरह का वाहन चलाना, भारी मशीनरी संभालना या जोखिम भरा काम करना बेहद असुरक्षित और जानलेवा साबित हो सकता है।
व्यवहार में चिड़चिड़ापन और मांसपेशियों का तालमेल बिगड़ना
नींद पूरी न होने से शारीरिक ऊर्जा घटने के साथ-साथ मानसिक संतुलन और मूड भी गहराई से प्रभावित होता है। ऐसा व्यक्ति बेहद चिड़चिड़ा हो जाता है और रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों पर अचानक तेज गुस्सा या झुंझलाहट जाहिर करने लगता है। किसी भी घटना पर प्रतिक्रिया देने की गति और सोचने का नजरिया पूरी तरह असंतुलित हो जाता है।
इसके अलावा हाथ और आंखों के आपसी तालमेल में भारी गिरावट आ जाती है। शरीर में हल्का कंपकंपाना और मांसपेशियों में असामान्य तनाव भी पैदा हो सकता है। इस शारीरिक असंतुलन की वजह से साधारण घरेलू या कामकाजी गतिविधियों में गंभीर गलतियां करने और दुर्घटनाओं का शिकार होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। कुछ मामलों में व्यक्तियों को सामान्य रूप से देखने और सुनने में भी कठिनाई महसूस हो सकती है।
36, 48 और 72 घंटे जागने पर शरीर की स्थिति
एक रात की नींद टूटने और लगातार कई दिनों तक जागते रहने के परिणामों में भारी अंतर होता है। जब कोई व्यक्ति 36 घंटे तक लगातार जागा रहता है, तो उसकी थकान और ध्यान केंद्रित न कर पाने की समस्या पहले से कहीं अधिक गंभीर रूप ले लेती है।
जागने का यह समय बढ़कर यदि 48 घंटे तक पहुंच जाए, तो व्यक्ति को अनजाने में माइक्रोस्लीप का सामना करना पड़ता है। माइक्रोस्लीप की स्थिति में व्यक्ति बिना अपनी मर्जी के महज कुछ सेकंड के लिए झपकी ले लेता है, जो अक्सर घातक हादसों की मुख्य वजह बनती है। वहीं अगर कोई 72 घंटे तक लगातार न सोए, तो उसकी सोचने-समझने, ध्यान लगाने और वास्तविक दुनिया को परखने की पूरी क्षमता पर गंभीर आघात पहुंचता है।
स्वस्थ शरीर के लिए नींद के जरूरी मानक
यद्यपि किसी खास मजबूरी या कभी-कभार एक रात की नींद छूट जाने से शरीर को कोई स्थायी शारीरिक या जैविक नुकसान आमतौर पर नहीं पहुंचता, लेकिन अगर नींद न लेने का यह सिलसिला लगातार जारी रहे, तो यह सेहत के लिए अत्यंत गंभीर समस्याएं खड़ी कर सकता है। स्वास्थ्य मानकों के अनुसार ज्यादातर वयस्क व्यक्तियों को हर रात करीब 7 से 9 घंटे की नियमित और गुणवत्तापूर्ण नींद जरूर लेनी चाहिए।



















