मैड्रिड कॉन्सर्ट में शकीरा का दिखा अनोखा अंदाज, भारतीय डिजाइनर गौरव गुप्ता के लिबास में बिखेरा जलवातमिलनाडु में कक्षा 8 तक के छात्रों को मिलेगा मुफ्त नाश्ता, सीएम विजय ने बढ़ाई योजनातुलसी से लेकर अश्वगंधा तक रसोई के ये पांच पौधे और मसाले सेहत को पहुंचाते हैं बड़े लाभकच्चे तेल में सुधार और दरों के जोखिम के बीच यूएस डॉलर के सामने कनाडाई डॉलर का कड़ा इम्तिहानत्रिपुरा में विलेज कमेटी चुनाव के लिए 28 सितंबर को सवेतन अवकाश घोषितमुर्गी पालन में रिकॉर्ड अंडा उत्पादन के लिए 5 बेहतरीन नस्लें, किसानों की कमाई में होगा इजाफावैश्विक तनाव और फेडरल रिजर्व के रुख से अमेरिकी डॉलर में तेजी, सोना फिसला और बिटकॉइन में सुस्तीपंजाब नेशनल बैंक की 444 दिन वाली एफडी में 3 लाख रुपये लगाने पर कितना रिटर्न मिलेगा, समझें पूरा गणितसंयुक्त राष्ट्र में कूटनीतिक वार्ताओं से पहले कच्चे तेल में स्थिरता, डब्ल्यूटीआई 92 डॉलर प्रति बैरल के पारहोर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की चर्चाओं और कच्चे तेल में गिरावट के बीच कैनेडियन डॉलर में स्थिरता
साल में सिर्फ दो इंजेक्शन से नियंत्रित होगा एचआईवी, भारत में लेनाकेपावीर को जल्द हरी झंडी मिलने की उम्मीदस्वास्थ्य
22 सित॰ 2026, 4:01 pm (32 मिनट पहले)· 0

साल में सिर्फ दो इंजेक्शन से नियंत्रित होगा एचआईवी, भारत में लेनाकेपावीर को जल्द हरी झंडी मिलने की उम्मीद

एचआईवी मरीजों को अब हर दिन दवा निगलने की मजबूरी से राहत मिल सकती है, क्योंकि छह महीने में एक बार लगने वाला लेनाकेपावीर इंजेक्शन भारतीय बाजार में आने के करीब पहुंच गया है। घरेलू दवा निर्माता इसका जेनेरिक संस्करण तैयार कर रहे हैं और 2027 की शुरुआत तक इसके उपलब्ध होने की संभावना है।

मानव इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस यानी एचआईवी से जूझ रहे लोगों के लिए नियमित चिकित्सा दिनचर्या हमेशा से एक बेहद जटिल चुनौती रही है। वर्तमान उपचार प्रणाली में मरीजों को जीवन भर हर रोज गोलियां खानी पड़ती हैं। अगर किसी व्यस्तता या भूलवश एक भी खुराक छूट जाए, तो संक्रमण के दोबारा उग्र होने और स्वास्थ्य बिगड़ने का बड़ा खतरा पैदा हो जाता है। इस दैनिक झंझट को हमेशा के लिए खत्म करने की दिशा में एक क्रांतिकारी चिकित्सीय विकल्प अब भारतीय मरीजों के काफी नजदीक पहुंच रहा है। केवल छह महीने के अंतराल पर लगाया जाने वाला लेनाकेपावीर इंजेक्शन देश में उपलब्ध कराने की प्रक्रिया तेज हो चुकी है, जिससे साल भर में सिर्फ दो टीकों के सहारे संक्रमण पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखा जा सकेगा।

घरेलू कंपनियों की तैयारी और विनियामक मंजूरी की राह

इस आधुनिक दवा का मूल विकास गिलेड साइंसेज द्वारा किया गया है, जो पहले से ही अमेरिका तथा यूरोपीय देशों के बाजारों में मरीजों के उपयोग के लिए स्वीकृत है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके सुरक्षित और प्रभावी साबित होने के बाद, गिलेड ने वर्ष 2024 के दौरान भारत सहित कुल 120 देशों में इसकी सुगम पहुंच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से छह जेनेरिक दवा उत्पादक कंपनियों के साथ रॉयल्टी मुक्त लाइसेंस समझौता किया था। इस ऐतिहासिक समझौते के तहत भारतीय दवा विनिर्माताओं को इसका किफायती जेनेरिक प्रारूप तैयार करने की अनुमति मिली।

ये भी पढ़ें

देश के भीतर एमक्योर फार्मास्यूटिकल्स, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज और हेटेरो जैसी प्रमुख फार्मा कंपनियां इसका जेनेरिक संस्करण बाजार में उतारने की दिशा में तेजी से काम कर रही हैं। एमक्योर फार्मा ने भारतीय औषधि महानियंत्रक यानी डीसीजीआई के समक्ष इस दवा के औपचारिक अनुमोदन हेतु आवेदन प्रस्तुत कर दिया है। कंपनी के निदेशक समित मेहता ने बताया कि मौजूदा वर्ष के अंत तक इस दवा को नियामक संस्था से आवश्यक स्वीकृति मिलने की पूरी संभावना है। मंजूरी मिलते ही इसे घरेलू बाजार में मरीजों को उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

स्थानीय परीक्षण से छूट और बाजार में उपलब्धता का समय

भारत में नई दवाओं की उपलब्धता में तेजी लाने के लिए नियामक स्तर पर भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन की विषय विशेषज्ञ समिति ने अगस्त 2026 में इस जेनेरिक दवा के लिए भारत में स्थानीय स्तर पर तीसरे चरण के क्लीनिकल परीक्षण कराने की अनिवार्य शर्त को समाप्त करने की औपचारिक सिफारिश की थी। चूंकि पश्चिमी देशों में इस इंजेक्शन का व्यापक इस्तेमाल पहले से हो रहा है और इसके सुरक्षा आंकड़े पुख्ता हैं, इसलिए स्थानीय परीक्षण से छूट मिलने से दवा के पंजीकरण की प्रक्रिया बेहद तेज हो गई है। सभी अनिवार्य कागजी और गुणवत्ता संबंधी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद, वर्ष 2027 की शुरुआत से ही भारतीय फार्मेसियों और अस्पतालों में इसका जेनेरिक इंजेक्शन बिकना शुरू हो जाएगा।

वायरस के सुरक्षा कवच पर वार करती है अनोखी तकनीक

लेनाकेपावीर मूल रूप से एचआईवी-1 वायरस के उपचार और रोकथाम के लिए तैयार की गई एक विशिष्ट कैप्सिड इनहिबिटर वर्ग की औषधि है। पारंपरिक एंटीरेट्रोवाइरल दवाओं की तुलना में इसकी कार्यप्रणाली पूरी तरह से अलग और सटीक है। एचआईवी वायरस की आणविक बनावट में उसका आनुवंशिक तंत्र एक अत्यंत मजबूत प्रोटीन आवरण के भीतर सुरक्षित बंद रहता है, जिसे चिकित्सीय भाषा में कैप्सिड कहा जाता है। किसी भी स्वस्थ मानव कोशिका पर हमला करने, उसमें अपनी प्रतिकृतियां बनाने और जीवित रहने के लिए वायरस को इसी सुरक्षात्मक कैप्सिड की अनिवार्य जरूरत पड़ती है।

यह आधुनिक इंजेक्शन सीधे तौर पर उसी कैप्सिड प्रोटीन संरचना को अपना निशाना बनाता है। यदि वायरस किसी तरह मानव शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं के करीब पहुंच भी जाए, तो उसे अपना आरएनए कोशिका के भीतर स्थानांतरित करने के लिए अपने खोल को खोलना पड़ता है। लेनाकेपावीर इस प्रोटीन आवरण को टूटने अथवा खुलने ही नहीं देती, जिससे वायरस की आनुवंशिक सामग्री कोशिका के संपर्क में आने से पहले ही बेकार हो जाती है। इतना ही नहीं, यदि किसी स्थिति में वायरस कोशिका के भीतरी हिस्से तक प्रवेश कर भी जाए, तो यह दवा उसके कैप्सिड ढांचे को असंतुलित और अत्यंत कमजोर कर देती है। इस दोहरी रुकावट के चलते वायरस मानव डीएनए के साथ जुड़कर अपनी संख्या बढ़ाने में पूरी तरह विफल हो जाता है।

मरीजों की संख्या और उपचार खर्च में कमी का गणित

आंकड़ों के अनुसार, भारत में वर्तमान समय में लगभग 26 लाख व्यक्ति एचआईवी संक्रमण के साथ जी रहे हैं। इसके अलावा, देश में हर साल करीब 50 हजार नए संक्रमित व्यक्तियों की पहचान की जाती है। इन सभी मरीजों के लिए दैनिक दवा का सेवन न केवल मानसिक तनाव का कारण बनता है बल्कि वित्तीय बोझ भी डालता है। अभी जो रोगी दैनिक गोलियों के जरिए अपनी चिकित्सा जारी रखते हैं, उन्हें सालाना लगभग 5 हजार रुपये का खर्च वहन करना पड़ता है।

लेनाकेपावीर के आने के बाद एक वर्ष में महज दो इंजेक्शन की आवश्यकता होगी। जैसे ही भारतीय कंपनियों द्वारा इसका जेनेरिक संस्करण बड़े पैमाने पर निर्मित होकर बाजार में उतरेगा, इस जीवनरक्षक चिकित्सा का वार्षिक खर्च मौजूदा 5 हजार रुपये के मुकाबले और भी काफी कम हो जाने का अनुमान है। इससे दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले और आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए एचआईवी का उच्च स्तरीय उपचार बेहद सहज और सुलभ हो सकेगा।

सवाल-जवाब

लेनाकेपावीर इंजेक्शन को कितने समय के अंतराल पर लगवाना पड़ता है?
इस दवा को छह महीने में सिर्फ एक बार इंजेक्शन के रूप में दिया जाता है, यानी साल भर में केवल दो खुराकों की आवश्यकता होती है।
यह दवा शरीर में एचआईवी वायरस को फैलने से कैसे रोकती है?
यह वायरस के सुरक्षा कवच यानी कैप्सिड प्रोटीन पर हमला करके उसके आवरण को खुलने से रोकती है, जिससे वायरस मानव कोशिकाओं में अपनी संख्या नहीं बढ़ा पाता।
भारत में किन कंपनियों द्वारा इसका जेनेरिक संस्करण तैयार किया जा रहा है?
एमक्योर फार्मास्यूटिकल्स, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज और हेटेरो जैसी प्रमुख भारतीय दवा कंपनियां इसका जेनेरिक वर्जन तैयार कर रही हैं।
भारत में इस इंजेक्शन के आम मरीजों के लिए कब तक उपलब्ध होने की संभावना है?
नियामक मंजूरी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद वर्ष 2027 की शुरुआत से इस जेनेरिक इंजेक्शन की बिक्री शुरू होने की उम्मीद है।
वर्तमान में भारत में एचआईवी मरीजों की संख्या और दवा का खर्च कितना है?
देश में लगभग 26 लाख मरीज हैं और वर्तमान दैनिक दवाइयों पर सालाना करीब 5 हजार रुपये का खर्च आता है, जो जेनेरिक इंजेक्शन आने पर और घट जाएगा।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp