दैनिक जीवन की आपाधापी, असंतुलित खानपान और कई घंटों तक एक ही कुर्सी पर लगातार बैठकर काम करने की आदत अक्सर पाचन तंत्र की कार्यप्रणाली को प्रभावित करती है। इसके परिणामस्वरूप बहुत से लोगों को पेट में गैस बनना, पेट फूलना, भारीपन और अपच जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इन असुविधाओं से निपटने के लिए योग में कई मुद्राओं का उल्लेख मिलता है, जिनमें पवनमुक्तासन को पेट से जुड़ी समस्याओं में विशेष रूप से सहायक माना जाता है। यह आसन पेट के आंतरिक अंगों पर हल्का दबाव डालकर जकड़ी हुई वायु को बाहर निकालने में मदद करता है।
नाम का अर्थ और मुद्रा की शारीरिक प्रक्रिया
पवनमुक्तासन शब्द संस्कृत के तीन अलग शब्दों से मिलकर तैयार हुआ है। इसमें पवन का आशय वायु या गैस से है, मुक्त का अर्थ उसे छोड़ना या आजाद करना है, और आसन शरीर की विशेष स्थिति को दर्शाता है। इसे सामान्य भाषा में विंड-रिलीविंग मुद्रा भी कहा जाता है। इस योगासन को करने के लिए व्यक्ति को पहले पीठ के बल फर्श पर सीधा लेटना होता है। इसके बाद दोनों घुटनों को मोड़कर धीरे-धीरे छाती और पेट के पास लाया जाता है। जब पैरों को दोनों हाथों से पकड़कर पेट की ओर दबाया जाता है, तो उदर क्षेत्र पर एक संतुलित दबाव बनता है। यही दबाव आंतों में रुकी हुई अतिरिक्त गैस को सुगमता से बाहर निकलने का रास्ता देता है।
पाचन तंत्र और मांसपेशियों को मिलने वाले लाभ
आयुष मंत्रालय के योग से जुड़े दिशा-निर्देशों के अनुसार, यह शारीरिक मुद्रा सीधे तौर पर उदर भाग पर कार्य करती है और पाचन प्रक्रिया को सक्रिय बनाने में सहायक हो सकती है। जब पेट की सतह दबती है, तो अंदरूनी पाचन अंगों में गतिशीलता बढ़ती है। इसके अलावा, इस मुद्रा के दौरान केवल पेट ही नहीं बल्कि शरीर का निचला हिस्सा, कमर और पेल्विक क्षेत्र की मांसपेशियां भी पूरी तरह सक्रिय हो जाती हैं। नियमित रूप से सही तकनीक के साथ इस आसन का अभ्यास करने से शरीर का लचीलापन सुधरता है और मांसपेशियों पर नियंत्रण बेहतर होता है। हालांकि, इसे किसी भी गंभीर बीमारी का स्थायी इलाज या पेट की चर्बी घटाने और मासिक धर्म की जटिलताओं को पूरी तरह समाप्त करने का अचूक साधन नहीं माना जा सकता, क्योंकि ऐसे दावों के पक्ष में ठोस वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं हैं।
अभ्यास के दौरान जरूरी सावधानियां
इस आसन को दिनचर्या में शामिल करने से पहले अपनी शारीरिक स्थिति और पूर्व स्वास्थ्य समस्याओं का आकलन करना अनिवार्य है। यदि किसी व्यक्ति की हाल ही में पेट या रीढ़ की हड्डी से जुड़ी कोई सर्जरी हुई हो, या कमर में कोई पुरानी चोट हो, तो बिना डॉक्टरी परामर्श के यह अभ्यास नहीं करना चाहिए। गर्भावस्था के समय भी इस मुद्रा से पूरी तरह परहेज करने की सलाह दी जाती है, क्योंकि पेट पर पड़ने वाला दबाव इस दौरान नुकसानदेह हो सकता है। इसके अलावा, हर्निया के मरीजों, अनियंत्रित उच्च रक्तचाप से जूझ रहे लोगों या पेट के गंभीर संक्रमण वाले व्यक्तियों को किसी योग्य योग विशेषज्ञ अथवा चिकित्सक की निगरानी में ही अभ्यास करना चाहिए।


















