तीर्थनगरी ऋषिकेश केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत गंगा तटों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने सदियों पुराने पावन देवस्थलों के लिए भी विख्यात है। पवित्र नवरात्र के दिनों में यहां के देवी मंदिरों में दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है। इस पावन नगरी में स्थापित हर मंदिर के पीछे एक विशिष्ट इतिहास, तपस्या और जन आस्था की गहरी गाथा विद्यमान है। गंगा के तटवर्ती इलाकों से लेकर रिहायशी कॉलोनियों तक फैले ये शक्तिपीठ श्रद्धालुओं को विशेष आध्यात्मिक अनुभूति कराते हैं।
कलकत्ता से पैदल लाई गई थी त्रिवेणी घाट की मां काली की प्रतिमा
ऋषिकेश के अति प्राचीन और प्रमुख तीर्थ स्थलों में त्रिवेणी घाट स्थित मां काली का मंदिर अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। इस मंदिर की स्थापना से जुड़ी जनश्रुति बेहद रोमांचक है। लोककथाओं के अनुसार महादेव नाम का एक अनन्य साधक मां काली का परम भक्त था। वह देवी की इस भव्य प्रतिमा को सुदूर कलकत्ता से अपने कंधों और हाथों में थामकर पैदल यात्रा करते हुए यहां लाया था। कठोर और दुर्गम पदयात्रा के बाद उसने त्रिवेणी घाट के पावन तट के समीप इस पवित्र विग्रह की स्थापना की थी।
प्रतिमा स्थापित होने के उपरांत यहां एक भव्य मंदिर परिसर का निर्माण कराया गया। सामान्य दिनों में भी यहां मां के दर्शन और आशीर्वाद के लिए श्रद्धालुओं का नियमित आगमन रहता है, लेकिन नवरात्र के पावन पर्व पर यहां भक्तों का भारी जनसैलाब उमड़ पड़ता है। भक्त त्रिवेणी घाट पर पवित्र स्नान करने के उपरांत मां काली की चौखट पर शीश नवाना अनिवार्य मानते हैं।
कुब्जामृग ऋषि की तपस्या स्थली पर स्थापित गौरी शंकर महादेव मंदिर
मायाकुंड के निकट अवस्थित गौरी शंकर महादेव मंदिर भी नगर के अत्यंत प्राचीन तीर्थों में गिना जाता है। यह पावन स्थल ऋषि कुब्जामृग की कुटिया के बेहद करीब स्थित है। इस पावन धाम को लेकर मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु यहां माता गौरी को श्रीखंड का विशेष भोग अर्पित करता है और कठिन चिल्ला अनुष्ठान पूरा करता है, देवी उस पर प्रसन्न होकर उसे संतान प्राप्ति का शुभ वरदान प्रदान करती हैं। इस कारण यहां दूरदराज से निसंतान दंपती विशेष मनोकामना लेकर पहुंचते हैं।
मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी अत्यंत दिव्य मानी जाती है। कहा जाता है कि ऋषि कुब्जामृग की घोर साधना से प्रसन्न होकर माता गौरी ने यमुना को ऋषि के साथ जाने का आदेश दे दिया था। कुछ समय पश्चात देवी को आभास हुआ कि यह निर्णय उचित नहीं था। जब माता गौरी यमुना को वापस लेने ऋषि के आश्रम पहुंचीं, तब ऋषि कुब्जामृग गहन समाधि में लीन थे। ऋषि के ध्यान में व्यवधान न डालते हुए मां गौरी ने उनके तप से उठने तक इसी पावन स्थान पर धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की थी, जिसके चलते यह स्थल पूजनीय बन गया।
त्रिवेणी घाट पर एक साथ होते हैं मां दुर्गा और भगवान शिव के दर्शन
ऋषिकेश के पावन त्रिवेणी घाट पर स्थित मां दुर्गा का मंदिर भी भव्यता और श्रद्धा का अनुपम केंद्र है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां मां दुर्गा के दिव्य स्वरूप के साथ ही पावन शिवलिंग भी प्रतिष्ठापित है। इसके चलते दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को मां जगदंबा और देवाधिदेव महादेव दोनों के एक साथ दर्शन का दुर्लभ पुण्य लाभ प्राप्त होता है। मंदिर परिसर को प्रतिदिन ताजे फूलों और दीपों से अत्यंत आकर्षक ढंग से सुसज्जित किया जाता है।
इस मंदिर की मर्यादा और व्यवस्था के तहत श्रद्धालुओं को गर्भगृह के भीतर जाने की अनुमति नहीं दी जाती है, बल्कि सभी भक्त बाहर से ही मां के दिव्य विग्रह के दर्शन करते हैं। यहां प्रातःकाल और संध्याकाल में विशेष भव्य आरती आयोजित होती है। हर शाम त्रिवेणी घाट पर संपन्न होने वाली विश्वप्रसिद्ध गंगा आरती के तत्काल बाद मां दुर्गा की महाआरती की जाती है, जिसके उपरांत उपस्थित जनसमूह को पावन प्रसाद वितरित किया जाता है।
आईडीपीएल क्षेत्र में सड़क हादसों को रोकने के लिए स्थापित हुआ था धाम
ऋषिकेश के आईडीपीएल इलाके में स्थापित मां दुर्गा का मंदिर स्थानीय निवासियों के अगाध विश्वास का केंद्र बना हुआ है। क्षेत्रीय जनता मां भगवती को अपने क्षेत्र की साक्षात संरक्षिका मानती है। स्थानीय इतिहास के मुताबिक इस मुख्य मार्ग पर पहले आए दिन भीषण सड़क दुर्घटनाएं घटित होती रहती थीं, जिनसे क्षेत्रवासी बेहद भयभीत और दुखी रहते थे। लगातार होने वाले हादसों से मुक्ति पाने के उद्देश्य से स्थानीय लोगों ने सड़क किनारे मां दुर्गा की पावन प्रतिमा स्थापित की थी।
प्रतिमा की स्थापना के बाद लोगों की आस्था लगातार गहरी होती चली गई और कालांतर में वहां एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। क्षेत्रीय निवासियों का दृढ़ विश्वास है कि जब से मां दुर्गा की प्रतिमा वहां विराजित हुई है, तब से उस मार्ग पर होने वाली दुर्घटनाएं लगभग शून्य हो गई हैं। इसी चमत्कारिक अनुभव के चलते लोग अपने परिवार की सुरक्षा, दीर्घायु और सुख शांति की मंगलकामना के साथ नियमित रूप से यहां माथा टेकने पहुंचते हैं।



















