उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के खेतों, ग्रामीण मैदानों, घरेलू आंगनों, बगीचों और सार्वजनिक रास्तों के किनारों पर स्वतः उगने वाली दूब घास को अक्सर लोग एक निरर्थक खरपतवार समझ लेते हैं और उसे उखाड़कर बाहर फेंक देते हैं। हालांकि, भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा तथा आयुर्वेद की समृद्ध परंपरा में इस साधारण सी दिखने वाली घास को अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। वानस्पतिक विज्ञान और आधुनिक वनस्पति शास्त्र में इसे साइनोडोन डैक्टिलोन के नाम से पहचाना जाता है। देश के विभिन्न क्षेत्रों एवं सांस्कृतिक भूभागों में स्थानीय लोग इसे दूर्वा या दूब कहकर पुकारते हैं। अपनी व्यापक औषधीय उपयोगिता के अतिरिक्त, भारतीय हिंदू धर्म एवं सांस्कृतिक परंपरा में होने वाले पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठानों और मांगलिक कार्यों के दौरान भी दूर्वा का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है।
पारंपरिक चिकित्सा और आयुर्वेद में दूब का विशेष स्थान
गोंडा जिले के स्थानीय प्राकृतिक चिकित्सा परंपरा के जानकार वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति के अनुसार, भारतीय लोक चिकित्सा और आयुर्वेद शास्त्र में दूब घास का प्रयोग सदियों से विविध प्रकार की शारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं एवं विकारों के शमन के लिए किया जाता रहा है। पारंपरिक चिकित्सीय मान्यताओं के आधार पर दूब मुख्य रूप से मानव शरीर की आंतरिक अत्यधिक गर्मी को शांत करने वाली, रक्तस्राव को नियंत्रित करने में सहायक और विभिन्न शारीरिक घावों एवं खरोंचों को सुखाने में उपयोगी औषधि मानी गई है। वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति इस बात पर विशेष बल देते हैं कि भले ही इसके कई पारंपरिक स्वास्थ्य लाभ बताए गए हों, लेकिन किसी भी प्रकार की बीमारी या शारीरिक समस्या के उपचार हेतु इसका प्रयोग बिना किसी योग्य विशेषज्ञ या डॉक्टर की सलाह के कदापि नहीं किया जाना चाहिए।
नकसीर और रक्तस्राव नियंत्रण में पारंपरिक प्रयोग और सावधानियां
आयुर्वेदिक सिद्धांतों और ग्रामीण क्षेत्रों की लोक चिकित्सा पद्धतियों में नाक से अचानक खून बहने की समस्या, जिसे नकसीर कहा जाता है, उसके शमन हेतु दूब का पारंपरिक प्रयोग प्रमुखता से वर्णित है। ऐसी पारंपरिक मान्यता रही है कि दूब के पौधे में स्वाभाविक रूप से रक्तस्राव को नियंत्रित करने तथा रक्त का थक्का जमाने वाले प्राकृतिक तत्व मौजूद होते हैं। यही मुख्य कारण है कि उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में प्राचीन काल से ही नकसीर फूटने की स्थिति में दूब की ताजी पत्तियों को साफ करके उनके रस का इस्तेमाल प्राथमिक उपाय के रूप में करने की परंपरा प्रचलित देखने को मिलती है।
हालांकि, आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान और चिकित्सा विशेषज्ञ इस संदर्भ में चेतावनी देते हैं कि यदि किसी व्यक्ति को बार-बार नाक से खून बहने की समस्या होती है, तो इसे केवल एक सामान्य मौसमी परेशानी मानकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। बार-बार नकसीर आने की घटना शरीर के भीतर किसी गंभीर स्वास्थ्य विकृति या उच्च रक्तचाप जैसी स्थिति का संकेत हो सकती है। ऐसी परिस्थिति में केवल पारंपरिक घरेलू उपायों या लोक नुस्खों पर निर्भर रहने के बजाय किसी योग्य चिकित्सक अथवा डॉक्टर के पास जाकर विस्तृत चिकित्सीय जांच कराना अनिवार्य हो जाता है।
घाव भरने और त्वचा संबंधी समस्याओं में दूब का उपयोग
त्वचा पर होने वाली छोटी-मोटी चोटों, खरोंचों और साधारण घावों के प्राथमिक उपचार में भी दूब का पारंपरिक उपयोग लंबे समय से किया जाता रहा है। विभिन्न ग्रामीण अंचलों में दूब के पौधे के स्वच्छ और ताजे हिस्सों को पीसकर उनका लेप घाव पर लगाने की पुरानी लोक परंपरा मौजूद रही है। इसके पीछे मुख्य वैज्ञानिक एवं पारंपरिक तर्क यह रहा है कि दूब में घाव को तेजी से भरने तथा त्वचा के प्राकृतिक पुनर्निर्माण में सहायता करने वाले प्राकृतिक गुण पाए जाते हैं।
इसके बावजूद, चिकित्सा विशेषज्ञ और आयुर्वेदिक वैद्य इस बात की सख्त ताकीद करते हैं कि यदि शरीर पर घाव खुला हुआ या अत्यधिक गहरा है, तो उस पर बिना डॉक्टरी परामर्श के किसी भी पौधे का कच्चा रस या लेप कदापि नहीं लगाना चाहिए। खुले घाव के प्रत्यक्ष संपर्क में आने वाली मिट्टी, धूल-कणों या दूषित वनस्पतियों के माध्यम से गंभीर जीवाणु संक्रमण फैलने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए किसी भी घाव की समुचित वैज्ञानिक सफाई और डॉक्टरी देखरेख अत्यंत आवश्यक होती है।
शरीर की सूजन और पाचन तंत्र पर प्रभाव की वैज्ञानिक व पारंपरिक समीक्षा
पारंपरिक आयुर्वेदिक पद्धतियों और ग्रंथों में दूब को शरीर के विभिन्न अंगों में होने वाली सूजन को कम करने में सहायक माना गया है। आधुनिक वैज्ञानिक स्तर पर भी साइनोडोन डैक्टिलोन के भीतर मौजूद कुछ जैविक यौगिकों के सूजनरोधी प्रभावों की संभावना पर कई तरह के अध्ययन और अनुसंधान किए गए हैं। इन्हीं वैज्ञानिक और पारंपरिक कारणों से आयुर्वेद में इसे एक बहुउपयोगी औषधि माना जाता है। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से शरीर में सूजन की समस्या से पीड़ित है, तो केवल दूब का इस्तेमाल करके इलाज करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, बल्कि सूजन के वास्तविक अंतर्निहित कारण का पता लगाना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
इसके अतिरिक्त, पेट से जुड़ी विभिन्न आंतरिक पाचन संबंधी समस्याओं के समाधान में भी दूब का पारंपरिक प्रयोग बताया गया है। ग्रामीण इलाकों में पाचन तंत्र की कार्यप्रणाली को सुचारू बनाने तथा पेट की गड़बड़ियों को शांत करने के लिए कई प्रकार के पारंपरिक घरेलू नुस्खों और काढ़ों में इसका मिश्रण किया जाता रहा है। परंतु यदि रोगी को पेट में तीव्र दर्द, लगातार उल्टी, बार-बार दस्त, या मल में खून आने जैसे गंभीर लक्षण दिखाई दें, तो घरेलू नुस्खों के चक्कर में समय गंवाने के बजाय तुरंत अस्पताल जाकर गहन जांच करानी चाहिए।
शीतल प्रकृति और सेवन से जुड़ी अति-आवश्यक सावधानियां
आयुर्वेदिक चिकित्सा शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार दूब घास को ठंडी या शीतल तासीर वाला पौधा माना गया है। इसी शीतल गुण के कारण अत्यधिक भीषण गर्मी के मौसम में शरीर के तापमान को संतुलित बनाए रखने तथा आंतरिक शीतलता प्रदान करने के उद्देश्य से कुछ पारंपरिक पेय पदार्थों में इसका प्रयोग प्राचीन समय से होता आया है। ग्रामीण समाज में लोग इसे शरीर को ठंडक देने वाली प्राकृतिक घास के रूप में पहचानते हैं।
वैद्य विष्णु दत्त प्रजापति स्पष्ट रूप से बताते हैं कि प्रत्येक मनुष्य की शारीरिक प्रकृति और तासीर भिन्न होती है, इसलिए किसी भी पारंपरिक नुस्खे या जड़ी-बूटी का प्रभाव हर व्यक्ति पर एक समान नहीं होता। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों, बुजुर्गों और किसी पुरानी या गंभीर बीमारी से ग्रसित मरीजों को बिना विशेषज्ञ वैद्य की सलाह के इसका सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए।
सुरक्षित उपयोग, स्वच्छता और सेवन की मात्रा से जुड़े कड़े नियम
दूब को एक औषधीय पौधा मानकर हर बीमारी या समस्या में इसका अनियंत्रित सेवन करना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत जोखिमभरा सिद्ध हो सकता है। किसी भी पौधे में मौजूद प्राकृतिक वानस्पतिक तत्व मानव शरीर पर गहरा प्रभाव डालते हैं। दूब का प्रयोग करने से पूर्व यह ध्यान देना बेहद आवश्यक है कि पौधा किस स्थान से तोड़ा गया है, वह स्थान रासायनिक उर्वरकों या गंदगी से मुक्त है या नहीं, उसकी सफाई किस प्रकार की गई है और कितनी मात्रा में उसका सेवन किया जा रहा है।
विशेषज्ञों की सलाह के बिना नियमित रूप से दूब का रस या काढ़ा बनाकर पीना उचित नहीं माना जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति पहले से ही किसी अन्य बीमारी की एलोपैथिक या आयुर्वेदिक दवाएं ले रहा है या किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है, तो उसे विशेष सावधानी बरतनी चाहिए और बिना डॉक्टर की स्पष्ट अनुमति के इसका प्रयोग शुरू नहीं करना चाहिए।



















