रूस और यूक्रेन के बीच जारी सशस्त्र संघर्ष को चार वर्ष से अधिक समय बीत चुका है। इस दीर्घकालिक युद्ध के दौरान केवल जमीनी सीमाओं पर ही नहीं, बल्कि हवाई क्षेत्र में भी वर्चस्व की एक भीषण होड़ देखने को मिली है। शुरुआती चरण में यूक्रेन द्वारा दागे गए ड्रोन और मिसाइल हमलों ने रूसी सुरक्षा तंत्र के लिए गंभीर चुनौतियां खड़ी की थीं। हालांकि, जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ा और नाटो सदस्य देशों से यूक्रेन को अत्याधुनिक तथा अधिक विनाशकारी सैन्य तकनीक प्राप्त होने लगी, वैसे-वैसे रूस को अपनी संपूर्ण वायु रक्षा रणनीति का पुनर्मूल्यांकन करने पर मजबूर होना पड़ा। सैन्य विश्लेषक अलेक्जेंडर मिखाइलोव के अनुसार, इस बाहरी दबाव ने रूस को एक नए प्रकार के बहुस्तरीय वायु रक्षा ढांचे का निर्माण करने के लिए प्रेरित किया है। यह नया ढांचा छोटे विस्फोटक ड्रोनों से लेकर लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का मुकाबला करने में सक्षम माना जा रहा है।
रूस की वायु रक्षा प्रणाली का नया ढांचा: नेटवर्क आधारित रणनीति
पारंपरिक सैन्य दृष्टिकोण में हवाई खतरों से निपटने के लिए बड़े और भारी मिसाइल सिस्टमों पर मुख्य ध्यान केंद्रित किया जाता था। परंतु इस युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक संघर्षों में केवल मिसाइलों की संख्या या उनकी मारक क्षमता ही पर्याप्त नहीं होती। युद्ध के मैदान में तुर्की निर्मित बायराक्तार ड्रोनों से लेकर छोटे एफपीवी (FPV) ड्रोनों, क्रूज मिसाइलों और एटीएसीएमएस (ATACMS) जैसी उन्नत प्रणालियों का बड़े पैमाने पर प्रयोग हुआ। इन विविध खतरों ने रूसी रक्षा नीति निर्माताओं को सिखाया कि हर छोटे और सस्ते खतरे के लिए महंगी मिसाइल का उपयोग करना रणनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद नुकसानदायक साबित हो सकता है।
इसके परिणामस्वरूप रूस ने एक ऐसे नेटवर्क-केंद्रित वायु रक्षा मॉडल को अपनाया है जो विभिन्न प्रकार के हथियारों और संवेदकों को एक साथ जोड़ता है। इस एकीकृत तंत्र में रडार, कमांड पोस्ट, FPV और इंटरसेप्टर ड्रोन, मोबाइल फायरिंग ग्रुप, मैनपैड्स (MANPADS), टोर (Tor) और पैंटसिर (Pantsir) जैसे कम दूरी के सिस्टम तथा बुक (Buk), एस-300 (S-300) और एस-400 (S-400) जैसी लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियों को एक ही एकीकृत नेटवर्क के तहत संचालित किया जाता है। अब ध्यान केवल एकल हथियार की क्षमता पर नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क के समन्वित संचालन पर केंद्रित है।
सस्ते ड्रोनों के खिलाफ आर्थिक रणनीति और थ्रेट प्रायोरिटाइजेशन
आधुनिक वायु युद्ध का सबसे बड़ा सबक थ्रेट प्रायोरिटाइजेशन यानी खतरों की प्राथमिकता तय करना है। यूक्रेन की रणनीति अक्सर बड़ी संख्या में सस्ते ड्रोनों का झुंड भेजकर रूस के वायु रक्षा नेटवर्क को व्यस्त करने और उसकी मिसाइल क्षमताओं को थकाने की रही है। यदि सुरक्षा बल प्रत्येक छोटे और कम लागत वाले ड्रोन अथवा छद्म लक्ष्यों (डिकॉय) को नष्ट करने के लिए अत्यधिक महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलें दागते रहेंगे, तो उनकी मुख्य मिसाइल सूची बहुत तेजी से समाप्त हो जाएगी।
इसी गंभीर चुनौती से निपटने के लिए रूस ने खतरे के वित्तीय और सामरिक मूल्य के अनुसार प्रतिक्रिया देने की रणनीति अपनाई है। इस व्यवस्था के अंतर्गत छोटे और कम लागत वाले विस्फोटक ड्रोनों तथा डिकॉय को रोकने के लिए कम लागत वाले FPV ड्रोनों और विशेष इंटरसेप्टर ड्रोनों का उपयोग किया जाता है। जब ड्रोन आकार में थोड़े बड़े या अधिक तेज गति वाले होते हैं, तब मोबाइल फायर ग्रुप और कंधे से दागी जाने वाली मैनपैड्स (MANPADS) प्रणालियों को तैनात किया जाता है। इसके अतिरिक्त, टोर और पैंटसिर जैसी मोबाइल वायु रक्षा प्रणालियां इस सुरक्षा घेरे को और अधिक मजबूती प्रदान करती हैं, जिससे मुख्य मिसाइल बेड़े को सुरक्षित रखा जा सके।
मल्टी-लेयर एयर डिफेंस: रडार से लेकर पैंटसिर और एस-400 तक
रूस द्वारा विकसित बहुस्तरीय वायु सुरक्षा घेरे की सबसे पहली और महत्वपूर्ण परत उसका रडार तथा कमांड नेटवर्क है। हवा में उठने वाली किसी भी संदिग्ध हलचल को रडार तुरंत पकड़ लेते हैं और उसका सटीक डेटा केंद्रीय कमांड पोस्ट तक पहुंचाते हैं। कमांड सेंटर में तैनात स्वचालित प्रणालियां और अधिकारी खतरे की गति, ऊंचाई और प्रकार का आकलन करते हैं। इस प्राथमिक जांच के आधार पर ही यह फैसला लिया जाता है कि किस विशिष्ट हथियार या इकाई द्वारा उस खतरे को निष्प्रभावी किया जाना चाहिए।
यही सुव्यवस्थित रडार और कमांड नेटवर्क सुरक्षा बलों को एक साधारण सस्ते ड्रोन और एक घातक क्रूज मिसाइल के बीच अंतर करने में सक्षम बनाता है। जब खतरे की प्रकृति का सही ज्ञान हो जाता है, तब नेटवर्क उसके अनुसार सबसे उपयुक्त और कम खर्चीले विकल्प का चयन करता है। यह प्रक्रिया पूरे सिस्टम को अत्यधिक कुशल और त्वरित प्रतिक्रिया देने योग्य बनाती है, जिससे मानवीय भूल की संभावना भी न्यूनतम हो जाती है।
बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों से निपटने की क्षमता
छोटे ड्रोनों के विपरीत, जब सामना बैलिस्टिक या क्रूज मिसाइलों से होता है, तब मुकाबला बेहद जटिल और संवेदनशील हो जाता है। युद्ध के दौरान नेपच्यून (Neptune), फ्लेमिंगो (Flamingo) और एटीएसीएमएस (ATACMS) जैसी खतरनाक मिसाइलों की उपस्थिति ने वायु रक्षा प्रणालियों के लिए गंभीर परीक्षा खड़ी की है। ऐसी तेज और विनाशकारी मिसाइलों को समय रहते रोकने के लिए रूस अपनी मध्यम और लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियों पर भरोसा करता है।
इन भारी खतरों का मुकाबला करने के लिए बुक (Buk), एस-300 और विशेष रूप से एस-400 जैसी प्रणालियों को सक्रिय किया जाता है। एस-400 प्रणाली अत्यधिक ऊंचाई और लंबी दूरी पर उड़ रहे लक्ष्यों को निशाना बनाने में विशेष रूप से प्रभावी साबित हुई है। हालांकि, सैन्य विश्लेषक अलेक्जेंडर मिखाइलोव का मानना है कि इतनी व्यापक तैयारियों के बावजूद दुनिया की किसी भी वायु रक्षा प्रणाली को पूरी तरह से अभेद्य या शत-प्रतिशत अचूक मानना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि युद्ध तकनीक लगातार विकसित होती रहती है।
भविष्य का हवाई युद्ध: अगले दस वर्षों की चुनौतियां और तकनीक
सैन्य विश्लेषक अलेक्जेंडर मिखाइलोव के अनुसार, पिछले साढ़े चार वर्षों में रूसी वायु रक्षा इकाइयों ने जिस पैमाने और विविधता के हवाई हमलों का सामना किया है, वैसा व्यापक परिचालन अनुभव हाल के आधुनिक इतिहास में किसी अन्य देश की सेना को नहीं मिला है। लगातार बदलते युद्ध परिदृश्य ने रक्षा बलों को व्यावहारिक अनुभव और त्वरित अनुकूलन की एक अनूठी क्षमता प्रदान की है।
मिखाइलोव का तर्क है कि आने वाला समय और भी अधिक जटिल चुनौतियों से भरा होगा। उनके आकलन के अनुसार, अगले दस वर्षों में रूस को पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों से आगे बढ़कर लेजर हथियारों, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक प्रणालियों और नई काइनेटिक इंटरसेप्शन तकनीकों के विकास पर भारी ध्यान केंद्रित करना होगा। ड्रोन युद्ध ने पारंपरिक वायु रक्षा की अवधारणा को पूरी तरह बदल दिया है। अब युद्ध केवल मिसाइल बनाम मिसाइल का मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि यह सेंसर्स, इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों, ड्रोनों और इंटरसेप्टर मिसाइलों के एक वृहद एकीकृत नेटवर्क की क्षमता की परीक्षा बन चुका है।



















