भोजन करने के बाद पेट में भारीपन, ऐंठन या दर्द महसूस होना एक आम पाचन संबंधी समस्या लग सकती है, लेकिन इसे बार-बार नजरअंदाज करना सेहत पर भारी पड़ सकता है। फरीदाबाद स्थित सर्वोदय हॉस्पिटल के जनरल एंड मिनिमली इनवेसिव सर्जरी विभाग के सीनियर कंसल्टेंट और हेड डॉ. अनुष्टुप डे के अनुसार, ये लक्षण गॉल ब्लैडर यानी पित्ताशय में पथरी बनने के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। आमतौर पर गॉल ब्लैडर में एक या दो पथरी देखने को मिलती है, परंतु कई दुर्लभ मामलों में मरीज के शरीर से 4000 से 5000 तक छोटे-बड़े स्टोन भी निकाले जा चुके हैं। ऐसी स्थिति डॉक्टरों के लिए भी एक बड़ी चिकित्सीय चुनौती पेश करती है।
पित्ताशय में क्यों बनती हैं हजारों की संख्या में पथरियां
गॉल ब्लैडर में पथरी का निर्माण कई जैविक और पर्यावरणीय कारकों पर निर्भर करता है। भारत के कुछ विशेष भौगोलिक क्षेत्रों में लोगों के खानपान की आदतों और आनुवंशिक वजहों से पित्ताशय की पथरी का जोखिम अधिक देखा जाता है। इसके अतिरिक्त आधुनिक जीवनशैली में भोजन के अंदर फाइबर की कमी होना और रिफाइंड या प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन करना इस समस्या को तेजी से बढ़ावा देता है। जब पित्त में मौजूद तत्व असंतुलित हो जाते हैं, तो वे छोटे-छोटे दानों या रेत के कणों जैसी संरचना बनाने लगते हैं। समय बीतने के साथ ये कण आपस में इकट्ठा होकर या अलग-अलग रूप में हजारों की संख्या में तब्दील हो सकते हैं।
महिलाओं और विशेष आयु वर्ग में जोखिम अधिक
पित्ताशय की पथरी का खतरा पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक पाया जाता है। विशेष रूप से 30 से 40 साल की आयु सीमा वाली महिलाओं में इस बीमारी के मामले ज्यादा दर्ज किए जाते हैं। शरीर के भीतर हार्मोनल स्तर में होने वाले उतार-चढ़ाव इस जोखिम को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं। महिलाओं के पित्ताशय में मुख्य रूप से कोलेस्ट्रॉल से निर्मित छोटे-छोटे स्टोन बनने की प्रवृत्ति देखी जाती है। यद्यपि किसी एक व्यक्ति के शरीर में हजारों स्टोन का होना काफी दुर्लभ माना जाता है, लेकिन पित्ताशय के अंदर छोटे-छोटे कई मल्टीपल स्टोन बनना बेहद सहज और संभव बात है।
शुरुआती लक्षणों की पहचान और संभावित जटिलताएं
गॉल ब्लैडर स्टोन के प्राथमिक लक्षणों में खाना खाने के तुरंत बाद पेट में भारीपन, बेचैनी और ऐंठन होना शामिल है। अधिकांश मरीजों को विशेष रूप से रात के समय भारी भोजन लेने के बाद पेट के ऊपरी हिस्से में तेज दर्द का अनुभव होता है। इसके साथ ही जी मिचलाना और उल्टी आने जैसी शिकायतें भी दर्ज की जाती हैं। यदि इन शुरुआती संकेतों को समय पर गंभीरता से न लिया जाए, तो गॉल ब्लैडर से निकलकर यह पथरी पित्त की नली में फंस सकती है। ऐसी स्थिति पैदा होने पर मरीज को पीलिया यानी जॉन्डिस और गंभीर इंफेक्शन जैसी जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
मोटापा और डायबिटीज से बढ़ता है स्टोन का खतरा
शारीरिक मोटापा और डायबिटीज जैसी मेटाबॉलिक बीमारियां गॉल ब्लैडर के सामान्य कामकाज को गहराई से प्रभावित करती हैं। डायबिटीज और मोटापे के कारण पित्ताशय की सिकुड़ने की क्षमता सुस्त पड़ जाती है, जिससे उसमें मौजूद पित्त अधिक गाढ़ा और सांद्र होने लगता है। पित्त का यह गाढ़ापन पथरी बनने की प्रक्रिया को गति प्रदान करता है। इसके अलावा, जो लोग वजन घटाने के लिए अचानक सख्त डाइटिंग करते हैं और तेजी से अपना वजन कम करते हैं, उनमें भी गॉल ब्लैडर के भीतर स्टोन बनने का जोखिम काफी हद तक बढ़ जाता है।
क्या हर मरीज के लिए सर्जरी आवश्यक है
गॉल ब्लैडर में स्टोन की पुष्टि होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि प्रत्येक मरीज को तत्काल ऑपरेशन की टेबल पर जाना पड़े। यदि मरीज के पित्ताशय में पथरी मौजूद है परंतु उसे किसी प्रकार का दर्द या शारीरिक परेशानी नहीं हो रही है, तो डॉक्टर नियमित निगरानी की सलाह देते हैं। हालांकि, जब मरीज को लगातार तेज दर्द, बार-बार उल्टी, पीलिया या गॉल ब्लैडर में संक्रमण जैसी स्थितियां बनने लगें, तब सर्जिकल हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। ऐसी स्थिति में मरीजों को स्वयं दवा लेने के स्थान पर योग्य सर्जन से परामर्श लेना चाहिए।
लैप्रोस्कोपिक सर्जरी और खानपान में आवश्यक सावधानी
वर्तमान समय में गॉल ब्लैडर को निकालने के लिए लैप्रोस्कोपिक सर्जरी को सबसे सुरक्षित और मानक तरीका माना जाता है। इस आधुनिक विधि में पेट पर बहुत छोटे चीरे लगाए जाते हैं, जिससे मरीज को कम दर्द होता है और वह सर्जरी के अगले ही दिन डिस्चार्ज होकर घर लौट सकता है। जब गॉल ब्लैडर के अंदर हजारों की संख्या में पथरियां भरी होती हैं, तब आसपास के अंगों को क्षति पहुंचाए बिना उन्हें बाहर निकालना सर्जिकल टीम के लिए एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। इस समस्या से बचाव के लिए भोजन में फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों का समावेश करें, रिफाइंड फूड से परहेज रखें और वजन को हमेशा संतुलित गति से कम करें।



















