बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में एक 18 साल के किशोर की जान सिर्फ इसलिए चली गई क्योंकि जनरेटर चलाते वक्त उसका हैंडल अचानक निकल गया और बेहद तेज झटके के साथ उसके पेट के बीचोबीच जा लगा. चोट इतनी गहरी थी कि किशोर कुछ देर तक तो होश में रहा, लेकिन अस्पताल पहुंचते-पहुंचते उसकी हालत बिगड़ गई और डॉक्टर भी उसे बचा नहीं सके, वे भी आखिर में असहाय नजर आए. यह घटना बताती है कि हम अक्सर पेट में लगी चोट को मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि सतह पर मामूली दिखने वाली यह चोट भी कुछ ही मिनटों में जानलेवा साबित हो सकती है, इसीलिए डॉक्टर सलाह देते हैं कि पेट पर लगी किसी भी चोट को बिना जांचे नहीं छोड़ना चाहिए.
पेट के अंदर छिपा है खून का पूरा नेटवर्क
सर गंगाराम अस्पताल के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी डिपार्टमेंट के चेयरमैन डॉ. अनिल अरोड़ा के मुताबिक हमारे पेट के भीतर खून की अनगिनत नलियां यानी ब्लड वैसल्स मौजूद रहती हैं. इनमें सबसे अहम है एब्डोमिनल एओर्टा, जो रीढ़ की हड्डी के ठीक आगे से गुजरती है. यह शरीर की सबसे बड़ी और सबसे चौड़ी धमनी है, जो दिल से शुद्ध खून लेकर पूरे शरीर तक पहुंचाती है. इसके अलावा एक और अहम नस होती है, इन्फीरियर वेना कावा, जो शरीर से अशुद्ध खून वापस दिल तक लेकर आती है. पेट के पास ही शरीर का सबसे बड़ा अंदरुनी अंग लिवर भी मौजूद होता है, जिसके साथ ही स्प्लीन भी होती है. इनके अलावा पेट के भीतर मेसेंटरी नाम की एक दोहरी परत वाली झिल्ली होती है, जो खून से भरी रहती है. यह मेसेंटरी दरअसल नसों और ब्लड वैसल्स का मुख्य हाईवे मानी जाती है, क्योंकि दिल से निकलने वाली मुख्य धमनियां इसी मेसेंटरी से होकर आंतों तक पहुंचती हैं और उन्हें ऑक्सीजन तथा पोषण देती हैं. डॉ. अरोड़ा बताते हैं कि अकेले लिवर में ही डेढ़ लीटर तक खून मौजूद रहता है. अगर पेट में बहुत तेज चोट लगे तो ये सारे अंग फट सकते हैं और उनसे खून बाहर निकलने लगता है. कुछ ही मिनटों में दो से तीन लीटर तक खून शरीर से बाहर आ सकता है, और यह इस बात पर निर्भर करता है कि पेट के अंदर कौन-कौन से अंग फटे हैं.
घातक चोट लगने पर शरीर में क्या होता है
डॉ. अरोड़ा के अनुसार जब पेट में बेहद तेज चोट लगती है तो इसे मेडिकल भाषा में ब्लंट एब्डोमिनल ट्रॉमा कहा जाता है. ऐसी हालत में अगर शरीर के भीतर भारी मात्रा में खून बहने लगे, यानी मैसिव इंटरनल हैमरेज हो जाए, तो मरीज के पास बचने के लिए बहुत ही कम समय बचता है. इसे इस तरह समझा जा सकता है कि जैसे शरीर के भीतर खून ले जाने वाला मेन पाइप ही फट गया हो. जिस तरह कभी-कभी पूरे शहर की बिजली ग्रिड अचानक ठप पड़ जाती है, ठीक उसी तरह खून की इस बड़ी नली के फटते ही पूरा सिस्टम शॉक में चला जाता है. हमारे दिमाग को अगर लगातार तीन मिनट तक खून न मिले, तो उसकी कोशिकाएं मरना शुरू कर देती हैं, जिससे ब्रेन डेड होने का खतरा पैदा हो जाता है. ब्रेन डेड होने के बाद दिमाग हार्ट को किसी भी तरह का निर्देश देने की स्थिति में नहीं रहता. वहीं दूसरी ओर हार्ट को अचानक खून मिलना बंद हो जाने और दिमाग से कोई सिग्नल न मिलने के चलते कार्डिएक अरेस्ट आ जाता है, और मरीज की तुरंत मौत हो जाती है.
पेट के अंदर ज्यादा खून बहने पर बॉडी कैसे टूटती है
अगर पेट में इतनी तेज चोट लगे कि लिवर, एब्डोमिनल एओर्टा, इन्फीरियर वेना कावा या स्प्लीन जैसी खून की नलियां फट जाएं, तो शरीर से जबरदस्त मात्रा में खून बहने लगता है. डॉ. अरोड़ा बताते हैं कि ऐसी स्थिति में शरीर के भीतर एक साथ कई खतरनाक चक्र शुरू हो जाते हैं. सबसे पहले हाइपोवोलेमिक शॉक लगता है, यानी खून की मात्रा तेजी से घटने के कारण ब्लड प्रेशर बहुत तेजी से गिरकर लगभग शून्य पर आ जाता है. इसके चलते दिमाग, हार्ट और किडनी जैसे शरीर के सबसे जरूरी अंगों तक ऑक्सीजन युक्त खून पहुंचना बंद हो जाता है. जब इन अंगों को ऑक्सीजन नहीं मिलती तो इनकी कोशिकाएं मरने लगती हैं. दिल की मांसपेशियों को ऑक्सीजन न मिलने से धड़कनें अनियमित हो जाती हैं और अंततः कार्डियक अरेस्ट से मौत हो जाती है. इतना ही नहीं, अत्यधिक ब्लीडिंग की वजह से शरीर में हाइपोथर्मिया, एसिडोसिस और कोएगुलोपैथी जैसी जानलेवा प्रक्रियाएं भी एक साथ शुरू हो जाती हैं. जो थोड़ा-बहुत खून बचता भी है, वह भी एसिड में बदलने लगता है और मांसपेशियों में लैक्टिक एसिड बनने लगता है. यह पूरी प्रक्रिया मौत को और तेजी से करीब ले आती है.
ऐसी हालत में तुरंत क्या करना चाहिए
डॉ. अनिल अरोड़ा की सलाह है कि पेट में गंभीर चोट लगने की स्थिति में मरीज को जितनी जल्दी हो सके अस्पताल पहुंचाया जाना चाहिए. अगर तुरंत बड़े अस्पताल तक पहुंचना संभव न हो, तो नजदीकी किसी भी प्राथमिक उपचार केंद्र में मरीज को ड्रिप चढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि शरीर में तरल पदार्थ की कमी कुछ हद तक पूरी की जा सके. इंटरनल ब्लीडिंग की स्थिति में मरीज को सबसे ज्यादा जरूरत ब्लड चढ़ाने की होती है, इसलिए जिस अस्पताल का इंफ्रास्ट्रक्चर जितना बेहतर होगा, मरीज के बचने की संभावना भी उतनी ही ज्यादा होगी. अगर चोट गंभीर है लेकिन मरीज होश में है, तो उसके पैरों को ऊपर की ओर उठा देना चाहिए, ताकि नीचे की तरफ जा रहा खून वापस हार्ट की दिशा में बहे. अगर शरीर से बाहर की तरफ खून बह रहा है, तो उसे रोकने की तुरंत कोशिश करनी चाहिए. डॉ. अरोड़ा साफ कहते हैं कि पेट की ऐसी चोट कितनी गंभीर है, यह सिर्फ डॉक्टर ही सही तरीके से समझ सकते हैं, इसलिए देर किए बिना तुरंत अस्पताल पहुंचना ही सबसे समझदारी भरा कदम है.











