आजकल महिलाएं करियर, सेहत, शादी और परिवार जैसे बड़े फैसले पहले से कहीं ज्यादा सोच-समझकर ले रही हैं. इसी बदलते नजरिए के बीच एग फ्रीजिंग भी अब एक अहम मेडिकल विकल्प के तौर पर सामने आया है. इस तकनीक की मदद से कोई भी महिला अपनी प्रजनन क्षमता को भविष्य के लिए सुरक्षित रख सकती है, भले ही वह फिलहाल मां बनने की योजना न बना रही हो. इसके बावजूद एग फ्रीजिंग को लेकर समाज में कई तरह की गलतफहमियां अब भी बनी हुई हैं. गुरुग्राम स्थित बिरला फर्टिलिटी एंड IVF की IVF स्पेशलिस्ट डॉ. शिविका गुप्ता ने इन मिथकों के पीछे की असली सच्चाई सामने रखी है. इंटरनेट और सोशल मीडिया पर मौजूद अधूरी जानकारी की वजह से कई महिलाएं इस प्रक्रिया से जुड़ा गैर-जरूरी डर पाल लेती हैं, जबकि कोई भी फैसला लेने से पहले मिथक और तथ्य के बीच का फर्क समझना बेहद जरूरी है.
क्या यह सिर्फ देर हो जाने पर अपनाया जाने वाला विकल्प है?
एक आम धारणा यह है कि एग फ्रीजिंग केवल उन महिलाओं के लिए है, जिन्होंने मातृत्व के बारे में सोचने में उम्र निकाल दी. डॉ. शिविका गुप्ता के मुताबिक हकीकत इससे बिल्कुल अलग है. कई महिलाएं एंडोमेट्रियोसिस, कैंसर के इलाज, समय से पहले ओवेरियन रिजर्व घटने की आशंका, सही जीवनसाथी की तलाश या निजी और पेशेवर वजहों से पहले ही अपनी फर्टिलिटी को सुरक्षित रखना चाहती हैं. इनमें से ज्यादातर महिलाएं फिलहाल मां बनने के लिए तैयार नहीं हैं, लेकिन भविष्य के लिए विकल्प खुला रखना चाहती हैं. यानी यह किसी मजबूरी में लिया गया आखिरी कदम नहीं, बल्कि भविष्य के लिए सोच-समझकर बनाई गई एक योजना का हिस्सा है.
क्या यह प्रक्रिया दर्दनाक और जोखिम भरी है?
बहुत सी महिलाओं को लगता है कि एग फ्रीजिंग में लंबे समय तक दर्द झेलना पड़ता है. जबकि आज की आधुनिक चिकित्सा तकनीकों ने इसे पहले से काफी आसान बना दिया है. इसमें शुरुआत में कुछ दिनों तक हार्मोनल दवाओं की मदद से अंडाशय को अंडे बनाने के लिए तैयार किया जाता है और उसके बाद हल्के सेडेशन में अंडे निकाले जाते हैं. पूरी प्रक्रिया आमतौर पर कम समय में निपट जाती है और ज्यादातर महिलाएं एक-दो दिन के भीतर अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट आती हैं. अनुभवी विशेषज्ञों और आधुनिक सुविधाओं वाले सेंटर में यह प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षित मानी जाती है.
फ्रीज किए अंडों से गर्भधारण की संभावना कितनी रहती है?
पुरानी तकनीकों की तुलना में एग फ्रीजिंग में अब काफी बदलाव आ चुका है. विट्रिफिकेशन नाम की आधुनिक तकनीक अंडों को बेहद कम तापमान पर सुरक्षित रखती है, जिससे भविष्य में उनके इस्तेमाल की संभावना पहले से कहीं बेहतर हो गई है. सफलता कई बातों पर निर्भर करती है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि कम उम्र में, खासकर 35 साल से पहले फ्रीज किए गए अंडों से आगे चलकर बेहतर नतीजे मिलने के आसार ज्यादा रहते हैं. यही वजह है कि विशेषज्ञ महिलाओं को उम्र बढ़ने का इंतजार करने के बजाय समय रहते फैसला लेने की सलाह देते हैं.
क्या यह सुविधा सिर्फ अमीर लोग ही उठा सकते हैं?
कुछ साल पहले तक सीमित सेंटर और ज्यादा खर्च के चलते यह प्रक्रिया हर किसी के लिए आसान नहीं थी. लेकिन अब भारत में कई फर्टिलिटी सेंटर पारदर्शी शुल्क, आसान भुगतान के तरीके और EMI जैसी सुविधाएं भी दे रहे हैं. इलाज का कुल खर्च हर व्यक्ति की मेडिकल स्थिति और जरूरी प्रक्रिया के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है, लेकिन यह विकल्प पहले के मुकाबले अब कहीं ज्यादा सुलभ हो चुका है. यही वजह है कि अब कई महिलाएं इसे सिर्फ खर्च के तौर पर नहीं, बल्कि अपने भविष्य की योजना और मानसिक सुकून के तौर पर देखती हैं.
क्या इससे अंडे खत्म हो जाते हैं और जल्दी मेनोपॉज आ जाता है?
यह भी एक बड़ा भ्रम है. असल में हर महीने महिला के अंडाशय में कई अपरिपक्व अंडे विकसित होना शुरू करते हैं, लेकिन स्वाभाविक रूप से इनमें से सिर्फ एक ही अंडा ओव्यूलेशन तक पहुंच पाता है और बाकी अपने आप खत्म हो जाते हैं. एग फ्रीजिंग के दौरान दी जाने वाली दवाएं उन्हीं अंडों को विकसित होने में मदद करती हैं, जो वैसे भी उसी महीने नष्ट होने वाले थे. मतलब इस प्रक्रिया का भविष्य में बचने वाले अंडों के भंडार पर कोई असर नहीं पड़ता, और इससे समय से पहले मेनोपॉज नहीं आता.
डॉ. शिविका गुप्ता के मुताबिक इन पांचों मिथकों को सही ढंग से समझना हर महिला के लिए जरूरी है, ताकि वे बिना किसी डर या भ्रम के अपनी सेहत और भविष्य से जुड़ा फैसला खुद अपनी समझ से ले सकें.











