शादी समारोहों, कार्यस्थलों और कसरत के दौरान अचानक सीने में दर्द उठने या गिरकर जान गंवाने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। आम तौर पर लोगों को लगता है कि दिल का दौरा बिना किसी चेतावनी के अचानक पड़ता है, लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि इस खतरे के संकेत शरीर में वर्षों पहले से मौजूद होते हैं। यदि समय रहते सही चिकित्सीय परीक्षण करा लिया जाए, तो भविष्य में होने वाले गंभीर हृदय रोगों से समय पर बचाव संभव है। विशेषकर उन परिवारों में जहां दिल की बीमारियों का पुराना इतिहास रहा है, वहां प्रारंभिक जांच जीवन रक्षक साबित हो सकती है।
सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट साकेत गोयल (MD DM FACC FSCAI) ने सोशल मीडिया मंच इंस्टाग्राम पर साझा किए गए एक वीडियो में बताया कि सटीक जांच की मदद से हृदयघात की आशंका को समय से पहले पहचाना जा सकता है। उन्होंने एक बेहद महत्वपूर्ण जांच का उल्लेख किया है, जो दिल की बीमारी के आनुवंशिक खतरे को सालों पहले उजागर कर सकती है। उनके अनुसार यह अनुवांशिक कारक इतना मजबूत होता है कि यदि नवजात शिशु की गर्भनाल या गर्भाशय से नमूना लिया जाए, तो उससे यह तक पता लगाया जा सकता है कि बच्चे के माता-पिता को दिल के दौरे का कितना खतरा है।
हर चौथे भारतीय में जोखिम का कारण बनता है यह कारक
सार्वजनिक स्थानों पर लोगों के अचानक अचेत होने और हृदय गति रुकने से होने वाली मौतों के पीछे एक प्रमुख जैविक कारण छिपा हो सकता है। आंकड़ों के अनुसार, प्रत्येक चार भारतीयों में से एक व्यक्ति में इस विशेष घटक का स्तर असामान्य रूप से बढ़ा हुआ पाया जाता है। राहत की बात यह है कि इसकी पहचान के लिए कोई जटिल प्रक्रिया नहीं अपनानी पड़ती, बल्कि एक बेहद साधारण खून की जांच से इसकी स्थिति स्पष्ट हो जाती है।
इस जांच को लिपोप्रोटीन ए (Lipoprotein A) टेस्ट कहा जाता है। यह एक बुनियादी ब्लड टेस्ट है जो अब नैदानिक प्रयोगशालाओं में व्यापक रूप से उपलब्ध है। इसके जरिए रक्त में मौजूद उस विशिष्ट प्रोटीन और वसा के मिश्रण को मापा जाता है जो धमनियों में रुकावट पैदा करने के लिए जिम्मेदार माना जाता है।
जांच के समय न हों भ्रमित और समझें अंतर
यदि जांच रिपोर्ट में लिपोप्रोटीन ए का स्तर अधिक आता है, तो घबराने या परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि चिकित्सकीय मार्गदर्शन में जीवनशैली संबंधी सावधानियां बरतने की जरूरत होती है। इस टेस्ट की एक मुख्य विशेषता यह है कि इसे बार-बार कराने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि यह पूरी तरह से एक आनुवंशिक कारक है जो जीवन भर लगभग स्थिर रहता है।
जांच रिपोर्ट देखते समय एक महत्वपूर्ण तकनीकी अंतर को समझना बेहद आवश्यक है। प्रयोगशालाओं में रूटीन लिपिड प्रोफाइल के साथ अक्सर एपोलिपोप्रोटीन ए और बी यानी ApoA और ApoB की जांच भी शामिल की जाती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि ApoA पूरी तरह से एक अलग जांच है और इसका लिपोप्रोटीन ए से सीधा संबंध नहीं है। मरीज को रिपोर्ट में केवल लिपोप्रोटीन ए के स्तर पर ही गौर करना चाहिए।
रक्त में मानक स्तर और स्वास्थ्य पर प्रभाव
लिपोप्रोटीन ए के परीक्षण परिणामों को मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर (mg/dl) की इकाइयों में आंका जाता है। यदि रिपोर्ट में इसका स्तर 30 mg/dl तक आता है, तो इसे सुरक्षित और सामान्य श्रेणी में माना जाता है। वहीं 30 से 50 mg/dl के मध्य का स्तर बॉर्डरलाइन यानी सीमावर्ती खतरे की ओर इशारा करता है। यदि यह आंकड़ा 50 mg/dl से ऊपर चला जाता है, तो इसे उच्च जोखिम माना जाता है और यह व्यक्ति के हृदय रोग की चपेट में आने की प्रबल संभावना को दर्शाता है।
उच्च स्तर पाए जाने की स्थिति में व्यक्ति को तुरंत अपनी दिनचर्या और खान-पान में व्यापक सुधार करना चाहिए। सूजन रोधी यानी एंटी इंफ्लेमेटरी आहार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके अंतर्गत भोजन में चीनी की मात्रा शून्य करनी होती है और गेहूं के सेवन को बेहद सीमित रखना पड़ता है। इसके अलावा नियमित शारीरिक व्यायाम और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा बनाना आवश्यक होता है।
कोलेस्ट्रॉल के स्तर को 50 से नीचे रखने का लक्ष्य
लिपोप्रोटीन ए के बढ़े होने पर सबसे निर्णायक बदलाव शरीर में एलडीएल (खराब कोलेस्ट्रॉल) के नियंत्रण से जुड़ा होता है। सामान्य स्वास्थ्य वाले व्यक्ति के लिए एलडीएल का सुरक्षित स्तर 100 माना जाता है, जबकि मधुमेह या हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे मरीजों के लिए यह सीमा 70 मानी जाती है।
लेकिन जिन व्यक्तियों के रक्त में लिपोप्रोटीन ए का स्तर उच्च दर्ज किया गया हो, उनके लिए अपने एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को 50 से कम स्तर पर बनाए रखना अनिवार्य माना जाता है। खराब कोलेस्ट्रॉल को इस न्यूनतम स्तर तक घटाना ही वह सबसे बड़ा और प्रभावी चिकित्सकीय कदम है जो भविष्य में दिल के दौरे की आशंका से जीवन की रक्षा कर सकता है।


















