रक्त शर्करा की नियमित निगरानी के लिए उंगलियों में बार-बार सुई चुभाना डायबिटीज के मरीजों के लिए हमेशा से एक कष्टदायक प्रक्रिया रही है। सामान्य तौर पर जब मानव शरीर इंसुलिन हार्मोन का समुचित उपयोग करने में असमर्थ हो जाता है, तब खून में ग्लूकोज की मात्रा अनियंत्रित रूप से बढ़ जाती है जिसे टाइप-2 डायबिटीज कहा जाता है। पारंपारिक चिकित्सा पद्धति में इसकी पुष्टि के लिए मरीजों को फास्टिंग प्लाज्मा ग्लूकोज अथवा रैंडम प्लाज्मा ग्लूकोज जैसे प्रयोगशाला परीक्षण करवाने पड़ते हैं। अब चिकित्सा विज्ञान और आधुनिक तकनीक के गठजोड़ ने एक ऐसा विकल्प खोज निकाला है, जिसमें रोगी को एक बूंद खून दिए बिना केवल अपनी आवाज के सहारे संभावित खतरे की जानकारी मिल सकती है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ध्वनि तरंगों का अनूठा मेल
इस नई तकनीकी जांच प्रणाली को ऑस्ट्रेलिया स्थित आरएमआईटी यूनिवर्सिटी तथा तकनीकी कंपनी थाइमिया ने संयुक्त प्रयासों से तैयार किया है। इस विशेष एल्गोरिदम को प्रशिक्षित करने के लिए शोध दल ने ब्रिटेन एवं अमेरिका के 21,129 नागरिकों से एकत्रित 63,000 से अधिक वॉयस सैंपल्स का गहन विश्लेषण किया। प्रतिभागी जब लगभग बीस सेकंड तक कुछ वाक्य बोलते हैं, तब यह डिजिटल टूल उनकी ध्वनि तरंगों में मौजूद बारीक असमानताओं को रिकॉर्ड करके डेटाबेस से मिलान करता है। इटली के मिलान शहर में आयोजित यूरोपियन एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ डायबिटीज (EASD) के वार्षिक वैज्ञानिक सम्मेलन के दौरान इस महत्वपूर्ण अध्ययन के निष्कर्ष दुनिया के सामने रखे गए।
गले की आवाज में छिपे हैं बीमारी के संकेत
सामान्य कानों से सुनने पर किसी व्यक्ति की आवाज में कोई खास फर्क महसूस नहीं होता, लेकिन डायबिटीज जैसी चयापचय संबंधी बीमारी आंतरिक तंत्र को गहराई से प्रभावित करती है। जब रक्त में शर्करा का स्तर लंबे समय तक असंतुलित रहता है, तो उसका सीधा असर नसों, सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं तथा वोकल कॉर्ड से जुड़ी मांसपेशियों पर पड़ता है। इन शारीरिक परिवर्तनों के कारण मरीज के बोलने की गति, सुरों की ऊंचाई-नीचाई यानी पिच और ध्वनि के ठहराव में अत्यंत सूक्ष्म अंतर आ जाता है। यह नवीन उपकरण इन्हीं अनदेखे ध्वन्यात्मक पैटर्नों का सूक्ष्म गणितीय विश्लेषण करता है और ऐसे संयुक्त संकेतों को खोज निकालता है जिनका संबंध उच्च रक्त शर्करा से जुड़ा हुआ है।
परीक्षण के आंकड़े और तकनीकी सटीकता
वैज्ञानिक परीक्षणों के दौरान इस डिजिटल मॉडल की कार्यक्षमता का कड़ा मूल्यांकन किया गया। जिन प्रतिभागियों ने पूर्व में स्वयं को डायबिटीज से पीड़ित घोषित किया था, उनमें से 80 प्रतिशत लोगों की आवाज में इस सिस्टम ने उच्च जोखिम की सटीक पहचान दर्ज की। इसके अलावा जब प्रयोगशाला में हुए रक्त परीक्षणों के वास्तविक नतीजों से इस तकनीक का मिलान किया गया, तो यह प्रणाली 75 प्रतिशत मामलों में सही साबित हुई। पूरे अध्ययन के दौरान इसकी संवेदनशीलता दर करीब 82 प्रतिशत आंकी गई, जिसका अर्थ है कि इसने शुगर से प्रभावित अधिकांश लोगों को सफलतापूर्वक चिह्नित किया।
गलत सकारात्मक नतीजों की चुनौती और सीमाएं
हालांकि इस नई खोज में कई क्रांतिकारी संभावनाएं हैं, लेकिन इसके साथ कुछ तकनीकी चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। क्लिनिकल आंकड़ों के मुताबिक इस मॉडल की गलत सकारात्मक दर 47 प्रतिशत दर्ज की गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि परीक्षण के दौरान कई ऐसे पूर्णतः स्वस्थ व्यक्तियों को भी उच्च जोखिम की श्रेणी में दिखा दिया गया, जिन्हें वास्तव में कोई बीमारी नहीं थी। इसी वजह से शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि यह तकनीक किसी भी सूरत में पारंपरिक क्लिनिकल ब्लड टेस्ट की जगह नहीं ले सकती। इसे केवल एक प्रारंभिक स्क्रीनिंग उपकरण के रूप में देखा जाना चाहिए जो व्यक्ति को सचेत कर डॉक्टर के पास जाने की सलाह दे सकता है।
घर बैठे शुरुआती जांच का नया रास्ता
सम्मेलन में इस शोध पत्र को प्रस्तुत करने वाली थाइमिया की रिसर्च साइंटिस्ट गिएद्रे सेपुकाइटीते ने अध्ययन की महत्ता रेखांकित करते हुए कहा, 'यह अब तक का सबसे बड़ी रियल-वर्ल्ड स्टडी है, जिसमें आवाज के जरिए टाइप-2 डायबिटीज की स्क्रीनिंग की गई है।' उनका मानना है कि यह नवाचार उन लाखों लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी होगा जिन्हें हर तिमाही या छमाही पर क्लिनिक जाकर जांच करानी पड़ती है। बिना अस्पताल जाए केवल स्मार्टफोन के माइक्रोफोन में बोलकर शुरुआती रुझान जान लेना स्वास्थ्य प्रबंधन को बेहद सरल बना देगा। इस प्रारंभिक चेतावनी के बाद संबंधित व्यक्ति समय रहते पैथोलॉजी लैब पहुंचकर अपने संपूर्ण स्वास्थ्य की पुष्टि कर सकता है।


















