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मुन्नार की वादियों में फिर बिखरा नीला जादू, बारह साल बाद खिले दुर्लभ नीलकुरिंजी के फूलस्वास्थ्य
7 सित॰ 2026, 11:02 pm (2 घंटे पहले)· 3

मुन्नार की वादियों में फिर बिखरा नीला जादू, बारह साल बाद खिले दुर्लभ नीलकुरिंजी के फूल

केरल के मुन्नार में बारह साल के लंबे अंतराल के बाद दुर्लभ नीलकुरिंजी के फूल खिल उठे हैं, जिससे पूरा पश्चिमी घाट नीला और बैंगनी रंग में रंग गया है। इस अद्भुत प्राकृतिक नज़ारे को देखने के लिए पर्यटकों का तांता लगा हुआ है।

अगर आपको पहाड़ों की सैर करना और वहां की प्राकृतिक सुंदरता को निहारना पसंद है, तो आपके लिए एक बेहद रोमांचक खबर सामने आई है। केरल के मुन्नार की पहाड़ियों पर एक बार फिर से प्रकृति ने अपनी अद्भुत छटा बिखेरी है। बारह साल के लंबे इंतज़ार के बाद वहां दुर्लभ नीलकुरिंजी के फूल खिल चुके हैं। इन दिनों पूरा पश्चिमी घाट का इलाका नीले और बैंगनी रंगों के खूबसूरत आवरण में लिपटा हुआ नजर आ रहा है। इन खास फूलों के खिलने का यह अनूठा क्रम हर बारह साल में एक बार ही देखने को मिलता है, जिस वजह से इसे देखने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में सैलानी मुन्नार का रुख कर रहे हैं। इस प्राकृतिक चमत्कार के पीछे की वजह और इसका जीवनचक्र बेहद दिलचस्प है।

क्या है नीलकुरिंजी शब्द का अर्थ

नीलकुरिंजी नाम ही इस पौधे के रूप और रंग की पूरी कहानी बयां कर देता है। स्थानीय भाषा में नीला का मतलब नीले रंग से है, जबकि कुरिंजी शब्द का इस्तेमाल फूल के लिए किया जाता है। जब ये पौधे खिलने की अवस्था में आते हैं, तो पूरा पहाड़ नीले और बैंगनी रंग की चादर से ढंक जाता है। सामान्य दिनों में यह पौधा कई सालों तक बिल्कुल साधारण और बिना किसी खास पहचान के गुमनाम रहता है, लेकिन जब इसका चक्र पूरा होता है तो यह अचानक ही चमकीले और आकर्षक फूलों से लद जाता है।

क्यों बारह साल में खिलते हैं ये पौधे

नीलकुरिंजी के बारह साल में एक बार खिलने के पीछे इसका एक खास जैविक चक्र काम करता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में प्लीटीएसियल या सामूहिक पुष्पन चक्र कहा जाता है। इस लंबी प्रक्रिया के दौरान पौधे लगातार कई वर्षों तक केवल अपनी वानस्पतिक वृद्धि करते हैं और बारहवें वर्ष में आकर एक साथ भारी मात्रा में फूल और बीज पैदा करते हैं। यही वजह है कि एक ही समय में लाखों फूल एक साथ खिलते नजर आते हैं। जब फूलों का यह दौर पूरा हो जाता है, तो पौधे सूख जाते हैं और जमीन पर बीज छोड़ जाते हैं। ये बीज अगली बार चक्र शुरू होने तक मिट्टी के भीतर पूरी तरह सुप्त अवस्था में सुरक्षित रहते हैं। इस अनोखी प्रक्रिया को सोशल मीडिया पर भी काफी शेयर किया जा रहा है।

पहाड़ों पर बिछ जाती है नीले रंगों की चादर

जब ये फूल बड़े पैमाने पर खिलते हैं, तो पहाड़ियों का ढलान किसी घने कालीन की तरह दिखाई देता है। दूर-दूर तक फैली पहाड़ियों पर इन फूलों का नजर आना किसी जादुई अहसास से कम नहीं होता है। इतिहास और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, प्रसिद्ध नीलगिरि पहाड़ियों का नामकरण भी इसी विशेष पौधे के नाम पर हुआ है, क्योंकि नीलगिरि का शाब्दिक अर्थ ही नीले पहाड़ होता है।

किन इलाकों में होती है इनकी मौजूदगी

नीलकुरिंजी के पौधे सामान्य तौर पर समुद्र तल से करीब 1,300 से 2,400 मीटर की ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में ही उगते हैं। भारत में मुख्य रूप से केरल के साथ-साथ तमिलनाडु और कर्नाटक के चुनिंदा हिस्सों में ही इनकी उपस्थिति दर्ज की जाती है। केरल के इडुक्की जिले में स्थित मुन्नार का इलाका इन फूलों को देखने के लिए सबसे प्रमुख पर्यटन स्थल माना जाता है। इस दौरान एराविकुलम नेशनल पार्क, मट्टुपेट्टी और आसपास की सभी पहाड़ियां नीले-बैंगनी रंगों से सराबोर नजर आती हैं। इन फूलों के खिलने का मुख्य समय आमतौर पर हर साल सितंबर और अक्टूबर के महीनों के बीच का होता है।

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सवाल-जवाब

नीलकुरिंजी के फूल कितने वर्षों में एक बार खिलते हैं?
नीलकुरिंजी के फूल बारह साल में एक बार खिलते हैं।
इस समय नीलकुरिंजी के फूल कहाँ खिले हैं?
इस समय केरल के मुन्नार की पहाड़ियों पर नीलकुरिंजी के फूल खिले हैं।
नीलकुरिंजी पौधे मुख्य रूप से कितनी ऊंचाई पर उगते हैं?
यह पौधा आमतौर पर समुद्र तल से 1,300 से 2,400 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में उगता है।
नीलकुरिंजी के फूल किस महीने में खिलते हैं?
ये फूल आमतौर पर सितंबर और अक्टूबर के महीनों के दौरान खिलते हैं।
नीलगिरि पहाड़ियों का नाम कैसे पड़ा?
माना जाता है कि नीलगिरि पहाड़ियों का नाम नीलकुरिंजी के नीले फूलों के प्राकृतिक नजारे के कारण पड़ा है।
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