इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रयागराज में लगभग तीन दशक पहले हुए बहुचर्चित हत्याकांड से जुड़े मामले में सजायाफ्ता अभियुक्तों को राहत देने से साफ मना कर दिया है। अदालत की दो सदस्यीय पीठ ने पूर्व सांसद कपिल मुनि करवरिया, पूर्व एमएलसी सूर्यभान करवरिया तथा उनके साथी रामचंद्र त्रिपाठी उर्फ कल्लू की दूसरी जमानत याचिकाओं को निरस्त कर दिया। न्यायिक मंच के इस कड़े रुख के उपरांत कारागार की सलाखों के पीछे आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे इन तीनों दोषियों के तत्काल जेल से रिहा होने की संभावनाएं पूरी तरह धूमिल हो गई हैं।
दिनदहाड़े स्वचालित हथियार से हुआ था जानलेवा हमला
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में यह घटनाक्रम सबसे सनसनीखेज खूनी टकरावों में गिना जाता है। इलाहाबाद के अति व्यस्त सिविल लाइंस क्षेत्र में 13 अगस्त 1996 को उस समय के सपा विधायक जवाहर यादव उर्फ जवाहर पंडित पर घात लगाकर हमला किया गया था। हमलावरों ने चौतरफा घेराबंदी कर विधायक के ऊपर एके-47 राइफल से अंधाधुंध गोलियों की बौछार कर दी थी, जिससे उनकी मौके पर ही जान चली गई थी। सरेराह हुए इस भीषण गोलीकांड ने समूचे राज्य के राजनीतिक गलियारों को गहरे सदमे में डाल दिया था। प्रयागराज की ही धरती पर बाद में साल 2005 के दौरान भी एक ऐसा ही खूनी खेल देखने को मिला था, जब तत्कालीन बसपा विधायक राजू पाल को दिन के उजाले में फिल्मी अंदाज में गोलियों से भूनकर मौत के घाट उतार दिया गया था।
निचली अदालत का फैसला और अपीलीय प्रक्रिया
विधायक जवाहर पंडित की हत्या के मुकदमे में कानूनी प्रक्रिया दशकों तक खिंचती चली गई। विभिन्न गवाहियों और साक्ष्यों के गहन परीक्षण के उपरांत आखिरकार साल 2019 में ट्रायल कोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुनाया। विचारण न्यायालय ने करवरिया बंधुओं समेत अन्य सह-अभियुक्तों को हत्या के गंभीर अपराध का प्रत्यक्ष दोषी ठहराया और सभी को आजीवन कारावास का कड़ा दंड दिया। ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए इस दोषसिद्धि के निर्णय को चुनौती देने के उद्देश्य से दोषियों ने उच्च न्यायालय की शरण ली और अपनी सजा के खिलाफ नियमित आपराधिक अपील दाखिल की।
डिविजन बेंच का जमानत देने से साफ इनकार
अपील विचाराधीन रहने के दौरान ही जेल में बंद रामचंद्र त्रिपाठी उर्फ कल्लू, पूर्व सांसद कपिल मुनि करवरिया तथा पूर्व विधान परिषद सदस्य सूर्यभान करवरिया ने अदालत से अंतरिम राहत पाने के लिए दूसरी बार जमानत की गुहार लगाई थी। मामले की विस्तृत सुनवाई जस्टिस सलील कुमार राय और जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की खंडपीठ के समक्ष संपन्न हुई। दोनों पक्षों की कानूनी दलीलों का बारीकी से परीक्षण करने के पश्चात खंडपीठ ने इस स्तर पर कोई भी रियायत देने से इनकार करते हुए तीनों दोषियों की दूसरी जमानत अर्जियों को सिरे से खारिज कर दिया। प्रयागराज की सत्ता और अपराध के गठजोड़ से जुड़ी राजनीति में यह मुकदमा ऐतिहासिक अहमियत रखता है।



















