डेयरी के पेशे में जुटे पशुपालकों के लिए दुधारू पशु की सही नस्ल चुनना मुनाफे की पहली सीढ़ी माना जाता है। उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले में कई किसान इन दिनों जाफराबादी नस्ल की भैंसों के पालन पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। यह नस्ल अपने विशालकाय शरीर, दमदार बनावट और दूध में फैट की बढ़िया मौजूदगी के चलते पारंपरिक डेयरियों में काफी मुफीद मानी जाती है। जब दूध में फैट की मात्रा संतोषजनक रहती है, तो दूध के सीधे वितरण के अलावा घी, मक्खन और पनीर जैसे वैल्यू-एडेड डेयरी उत्पाद तैयार करके भी बेहतर कमाई सुनिश्चित की जा सकती है। सुलतानपुर के एक स्थानीय पशुपालक ने इस नस्ल की दिनचर्या, रख-रखाव, चारे की व्यवस्था और दूध की खूबियों के व्यावहारिक पहलुओं को सामने रखा है।
विशालकाय कद-काठी और अलग शारीरिक बनावट
सुलतानपुर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र से जुड़े पशु चिकित्सा वैज्ञानिक डॉ. दिवाकर कुमार ने स्पष्ट किया है कि जाफराबादी का नाम देश की सबसे चुनिंदा और प्रमुख भैंस नस्लों में शुमार है। इसके शारीरिक गठन की भव्यता दूर से ही पहचानी जा सकती है। कृषि अनुसंधान से जुड़ी शीर्ष संस्था आईसीएआर के आधिकारिक दस्तावेजों में भी जाफराबादी को भारत की सबसे भारी भैंस नस्ल के तौर पर दर्ज किया गया है। इसका चौड़ा सीना, गठीला ढांचा और नीचे की ओर मुड़कर ऊपर उठते लंबे सींग इसे अन्य देशी नस्लों के मुकाबले बिल्कुल अनूठा रूप देते हैं। इसकी भारी-भरकम कद-काठी इस बात का सीधा प्रमाण है कि यह नस्ल शारीरिक तौर पर बेहद सहनशील और मजबूत होती है।
दूध की पैदावार और फैट की प्रचुरता
पशुपालन के जानकार और किसान हरिनाथ का कहना है कि जाफराबादी नस्ल की उपयोगिता सिर्फ उसके विशाल आकार तक सीमित नहीं है, बल्कि दूध उत्पादन में भी इसका प्रदर्शन काफी उल्लेखनीय रहता है। दूध में फैट की सघनता अधिक होने के कारण इससे गाढ़ा दूध और उच्च गुणवत्ता वाला घी तैयार करना आसान हो जाता है, जिससे खुले बाजार में इसके उत्पादों की मांग हमेशा बनी रहती है। हालांकि, दूध का उत्पादन और फैट का प्रतिशत हर पशु में बिल्कुल एक जैसा नहीं ठहरता। पशु की उम्र, उसके दैनिक आहार, स्वास्थ्य की स्थिति, मौसमी बदलाव और किसान द्वारा की जाने वाली नियमित देखभाल जैसे कई जरूरी कारक मिलकर यह तय करते हैं कि भैंस रोजाना कितना और किस गुणवत्ता का दूध देगी।
खरीदारी से पहले लागत और मुनाफे का सही आकलन
डेयरी शुरू करने या बढ़ाने की योजना बना रहे किसानों को केवल नस्ल का नाम देखकर फैसला लेने से बचना चाहिए। किसी भी पशु को अपने खूंटे पर लाने से पहले उसकी वास्तविक उम्र, स्वास्थ्य की मौजूदा स्थिति, दूध देने का इतिहास, गर्भधारण की स्थिति और नस्ल की शुद्धता की बारीकी से जांच कर लेनी चाहिए। इसके साथ ही पशु के रोजाना के दाने, हरे-सूखे चारे, चिकित्सा और रख-रखाव पर होने वाले नियमित खर्च का पहले से हिसाब लगाना अनिवार्य है। स्थानीय मंडियों और बाजारों में दूध का प्रचलित भाव क्या चल रहा है, इसका सीधा प्रभाव पशुपालक की शुद्ध बचत पर पड़ता है। एक निरोगी और शुद्ध नस्ल का पशु डेयरी को लाभ तो दिला सकता है, लेकिन अंतिम मुनाफा हमेशा दूध की कुल बिक्री और प्रतिदिन के खर्चों के संतुलन पर ही निर्भर करता है।



















