कैंसर का जिक्र आते ही आज भी लोगों के जेहन में अनगिनत डर और आशंकाएं घर कर जाती हैं। विशेष तौर पर जब किसी मरीज की बीमारी एडवांस स्टेज यानी चौथे चरण में पहुंच जाती है, तो परिवार के लोग अक्सर मायूस होकर उम्मीदें छोड़ देते हैं। हालांकि, पिछले एक दशक के दौरान चिकित्सा विज्ञान ने चिकित्सा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। आज के समय में कैंसर की ऐसी अत्याधुनिक औषधियां और उपचार पद्धतियां मौजूद हैं, जिनकी सहायता से चौथे चरण के मरीज भी पांच से दस साल तक सामान्य और स्वस्थ जीवन व्यतीत कर रहे हैं। फरीदाबाद स्थित अमृता हॉस्पिटल की कैंसर स्पेशलिस्ट डॉ. सफलता ने एक खास बातचीत में कैंसर के उपचार में आए इन क्रांतिकारी बदलावों पर खुलकर चर्चा की है।
बदल गया है चौथे स्टेज के कैंसर का पूर्वानुमान
विशेषज्ञों के अनुसार, लगभग दस वर्ष पूर्व जब किसी व्यक्ति को चौथे चरण का कैंसर डिटेक्ट होता था, तो उसकी जीवन प्रत्याशा महज तीन से छह महीने तक ही आंकी जाती थी। लेकिन आज का दौर पूरी तरह बदल चुका है। वर्तमान समय में स्तन कैंसर, फेफड़ों का कैंसर और प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे तमाम मरीज पांच से लेकर दस वर्षों तक का सुदीर्घ जीवन जी रहे हैं। चिकित्सा क्षेत्र में लगातार हो रहे शोध, विशेषकर टारगेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और कीमोथेरेपी में आए आधुनिक सुधारों ने गंभीर रोगियों के लिए जीने की नई राहें तैयार की हैं।
बायोमार्कर और रिसेप्टर्स के आधार पर सटीक दवाएं
डॉ. सफलता स्पष्ट करती हैं कि हर कैंसर की प्रकृति अलग होती है और सभी का इलाज एक समान नहीं हो सकता। उदाहरण के लिए, ब्रेस्ट कैंसर में हार्मोन रिसेप्टर पॉजिटिव और एचईआर2 पॉजिटिव जैसे कई अलग-अलग वेरिएंट होते हैं। आधुनिक पैथोलॉजिकल जांचों के माध्यम से इन रूपों की सटीक पहचान की जाती है और उसी के अनुरूप औषधियां निर्धारित की जाती हैं। वर्तमान में इन खास रिसेप्टर्स को ध्यान में रखते हुए लगातार नई दवाइयों का अनुसंधान हो रहा है, और लगभग हर छह महीने के अंतराल पर बाजार में नई औषधियां आ रही हैं। इससे रोगियों के ठीक होने की संभावना में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। जिन मामलों में पूर्ण रूप से रिकवरी संभव नहीं होती, वहां भी इन दवाओं के जरिए जीवनकाल को कई वर्षों तक बढ़ाया जा सकता है।
लंग कैंसर के उपचार में भी आए व्यापक विकल्प
फेफड़ों के कैंसर के मामलों में भी चिकित्सा तकनीक ने लंबी छलांग लगाई है। डॉ. सफलता बताती हैं कि यदि लंग कैंसर के किसी मरीज में बीमारी दिमाग तक भी फैल चुकी है, तब भी आज के समय में सफल उपचार संभव है। इसके लिए ईजीएफआर और एएलके जैसे विशिष्ट म्यूटेशन की विस्तृत जांच की जाती है। यदि जांच के दौरान मरीज के शरीर में इनमें से कोई खास म्यूटेशन पाया जाता है, तो उसके आधार पर विशेष रूप से तैयार की गई टारगेटेड दवाइयां चलाई जाती हैं। इस पद्धति से उपचार पाने वाले मरीज भी पांच से दस साल तक सामान्य जीवन जी सकते हैं। इसके अतिरिक्त, आधुनिक डायग्नोस्टिक्स और औषधियों के मेल ने चिकित्सा परिणामों को पहले से कहीं अधिक प्रभावी बना दिया है।
कीमोथेरेपी को लेकर व्याप्त मिथक और वास्तविकता
आम जनता के मन में कीमोथेरेपी को लेकर अक्सर यह धारणा बनी रहती है कि यह प्रक्रिया अत्यधिक कष्टदायक होती है, लेकिन वास्तविकता इससे काफी अलग है। इसके कुछ सामान्य दुष्प्रभाव अवश्य हो सकते हैं, जिनके बारे में डॉक्टर उपचार शुरू होने से पहले ही रोगी को पूरी तरह अवगत करा देते हैं। इन कठिनाइयों को न्यूनतम करने के लिए आज तमाम बेहतरीन सहायक दवाइयां उपलब्ध हैं। पैक्लिटैक्सेल जैसी पारंपरिक कीमोथेरेपी औषधियों में भी अब ऐसे बदलाव किए गए हैं ताकि रोगी को कम से कम परेशानी का सामना करना पड़े। सपोर्टिव केयर यानी सहायक देखभाल में हुई तरक्की से थेरेपी के दौरान मरीज की ओवरऑल हेल्थ और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखने में बहुत मदद मिल रही है।
विकल्पों की अधिकता से बढ़ी राहत
भविष्य की संभावनाओं को लेकर चिकित्सा जगत पूरी तरह आशान्वित है। अब कैंसर रोगियों के पास केवल सर्जरी या पारंपरिक कीमोथेरेपी जैसे सीमित विकल्प नहीं बचे हैं। इसके अलावा टारगेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और सीएआर-टी सेल थेरेपी जैसी आधुनिक तकनीकें भी चिकित्सा जगत का हिस्सा बन चुकी हैं। किसी विशेष प्रकार के कैंसर और मरीज की शारीरिक स्थिति के आधार पर आज दस से पंद्रह विभिन्न प्रकार के औषधीय विकल्प मौजूद हो सकते हैं। इससे डॉक्टरों के लिए मरीज की विशिष्ट जरूरतों के अनुसार सटीक उपचार योजना तैयार करना बेहद आसान हो गया है।



















