भारतीय खानपान की परंपरा में रोटी और चावल सदियों से बुनियादी भोजन का हिस्सा बने रहे हैं। देश के दक्षिणी राज्यों में चावल पर आधारित कई प्रकार के पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं, जबकि उत्तर भारत के घरों में लगभग हर दिन दोनों समय रोटी और चावल का सेवन आम बात है। बदलते समय और आधुनिक गतिहीन जीवनशैली के कारण कई तरह की मेटाबॉलिक समस्याएं सामने आने लगी हैं। इसी वजह से यह आम धारणा बन गई है कि भोजन में रोटी और चावल की मौजूदगी शरीर का वजन बढ़ाती है और खून में ग्लूकोज के स्तर में तेजी से उछाल लाती है। भोजन और मेटाबॉलिज्म के इस गणित को समझने के लिए विशेषज्ञ चिकित्सकीय दृष्टिकोण जानना जरूरी है।
शरीर की प्रकृति और कार्बोहाइड्रेट का गणित
वजन और ब्लड शुगर पर किसी भी खाद्य पदार्थ का असर सीधे तौर पर व्यक्ति की शारीरिक बनावट और मेटाबॉलिज्म पर निर्भर करता है। हर मनुष्य का शरीर भोजन को अलग तरीके से प्रोसेस करता है, इसलिए इसका प्रभाव भी हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता। यदि बुनियादी स्तर पर देखा जाए कि क्या रोटी और चावल खाने से वजन बढ़ सकता है और शुगर का स्तर चढ़ सकता है, तो इसका सीधा उत्तर सकारात्मक है। इसके पीछे मुख्य वजह इन दोनों अनाजों में कार्बोहाइड्रेट की भारी मात्रा का होना है।
पोषण के आंकड़ों के मुताबिक 100 ग्राम चावल में 29 ग्राम कार्बोहाइड्रेट मौजूद होता है, जबकि 100 ग्राम गेहूं से तैयार रोटी में 44 ग्राम कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है। भोजन के जरिए मिलने वाला कार्बोहाइड्रेट शरीर के भीतर ऊर्जा का निर्माण करता है। जब व्यक्ति शारीरिक परिश्रम के जरिए इस ऊर्जा को खर्च नहीं करता, तो यही अतिरिक्त ऊर्जा शरीर के भीतर वसा यानी चर्बी के रूप में जमा होने लगती है। शरीर में फैट का यह संचय धीरे-धीरे वजन को बढ़ाता है और साथ ही ब्लड शुगर के स्तर में भी गड़बड़ी पैदा करता है। हालांकि, देश में करोड़ों लोग रोजाना रोटी और चावल खाते हैं लेकिन हर किसी का वजन या शुगर नहीं बढ़ता, जिसके पीछे शारीरिक गतिविधि और हार्मोनल संतुलन की अहम भूमिका होती है।
इंसुलिन हार्मोन की भूमिका और इंसुलिन रेजिस्टेंस का खतरा
कार्बोहाइड्रेट को ऊर्जा में बदलने और उसे पचाने के लिए शरीर को इंसुलिन हार्मोन की जरूरत पड़ती है। जो लोग नियमित रूप से कड़ा शारीरिक परिश्रम करते हैं या तय समय पर वर्कआउट करते हैं, उनके शरीर में यह ऊर्जा तुरंत इस्तेमाल हो जाती है। ऐसे सक्रिय लोगों के लिए कार्बोहाइड्रेट कोई गंभीर संकट खड़ा नहीं करता। जिन लोगों के शरीर में प्राकृतिक रूप से पर्याप्त और प्रभावी इंसुलिन बनता है, वे इस अतिरिक्त कार्बोहाइड्रेट को बिना किसी परेशानी के पचा लेते हैं, जिससे न तो वजन अनियंत्रित होता है और न ही शुगर बढ़ती है।
समस्या तब पैदा होती है जब जरूरत से ज्यादा कार्बोहाइड्रेट आहार का हिस्सा बन जाता है। इसे पचाने के लिए अग्न्याशय को बहुत ज्यादा मात्रा में इंसुलिन का उत्पादन करना पड़ता है। शुरुआत में ज्यादा इंसुलिन बनने से ग्लूकोज नियंत्रित हो जाता है, लेकिन अगर यह स्थिति लंबे समय तक बार-बार बनी रहे, तो शरीर की कोशिकाएं अत्यधिक इंसुलिन के प्रति प्रतिक्रिया देना बंद कर देती हैं। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है। एक बार इंसुलिन रेजिस्टेंस की शुरुआत होने के बाद वजन तेजी से बढ़ने लगता है और व्यक्ति में टाइप 2 डायबिटीज विकसित होने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
पोर्शन कंट्रोल और फाइबर की अहमियत
अतिरिक्त वजन और शुगर की समस्या से बचने के लिए भोजन छोड़ने की जगह पोर्शन कंट्रोल यानी मात्रा को नियंत्रित करना सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है। 100 ग्राम चावल में लगभग 28 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है। यदि कोई व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ है और उसका वजन नियंत्रण में है, तो इतनी मात्रा में चावल या रोटी खाने से शरीर पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ता। इसके विपरीत, जो लोग पहले से ही डायबिटीज से जूझ रहे हैं या जिनका वजन सामान्य से काफी अधिक है, उन्हें अपनी थाली में कार्बोहाइड्रेट की इस मात्रा को तुरंत घटाकर आधा कर देना चाहिए।
चावल और गेहूं की सामान्य रोटी में फाइबर की मात्रा बेहद सीमित होती है। बढ़े हुए वजन और डायबिटीज के मरीजों के लिए फाइबर सबसे जरूरी पोषक तत्व है। फाइबर युक्त भोजन आंतों में धीमी गति से पचता है, जिसके कारण लंबे समय तक पेट भरे होने का अहसास बना रहता है और बार-बार भूख नहीं लगती। इसके अलावा, उच्च फाइबर वाले आहार को पचाने के लिए शरीर को धीरे-धीरे और कम मात्रा में इंसुलिन जारी करना पड़ता है, जिससे ब्लड शुगर में अचानक तेज उछाल नहीं आता। वजन और शुगर को नियंत्रण में रखने के लिए रोजाना कम से कम 30 मिनट का व्यायाम अनिवार्य रूप से करना चाहिए, जिसमें दौड़ना, रस्सी कूदना और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग शामिल हो सकते हैं।
आदर्श थाली की बनावट और जीवनशैली में जरूरी सुधार
संतुलित मेटाबॉलिज्म बनाए रखने के लिए दैनिक खानपान में हरी पत्तेदार सब्जियों की मात्रा को प्राथमिकता देनी चाहिए। किसी भी मुख्य भोजन के दौरान थाली का आधा हिस्सा पूरी तरह से हरी सब्जियों और सलाद से भरा होना चाहिए। इसके अलावा रिफाइंड अनाज की जगह साबुत अनाज को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसमें छिलके वाला गेहूं, चोकर युक्त आटा, भूरा या बिना पॉलिश वाला चावल, साबुत चना और बादाम शामिल हैं।
दैनिक दिनचर्या में हर रोज कम से कम एक ताजे फल का सेवन अवश्य करना चाहिए। इसके साथ ही सूखे मेवे यानी ड्राई फ्रूट्स और विभिन्न प्रकार के बीजों को अल्पाहार के रूप में शामिल करना लाभकारी रहता है। शरीर के मेटाबॉलिज्म और पाचन तंत्र को ठीक रखने के लिए दिनभर में पर्याप्त मात्रा में पानी पीने की आदत बनाए रखनी चाहिए। भोजन की सही मात्रा, नियमित शारीरिक व्यायाम और फाइबर युक्त प्राकृतिक खाद्य पदार्थों का संयोजन ही वजन और ब्लड शुगर दोनों को सुरक्षित दायरे में रखने का सबसे सुरक्षित मार्ग है।



















