रात में सोते समय अचानक बुदबुदाना, अस्पष्ट आवाजें निकालना या फिर साफ शब्दों में बातें करना एक बेहद आम अनुभव है। कई बार व्यक्ति ऐसी बातें बोलता है जिनका कोई अर्थ समझ नहीं आता, जबकि कुछ मामलों में लोग पूरे वाक्य धाराप्रवाह बोलते दिखाई देते हैं। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को सोम्निलोक्वी अथवा स्लीप टॉकिंग के नाम से जाना जाता है। अधिकांश लोगों के लिए यह कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या नहीं होती और कभी-कभार ऐसा होना पूरी तरह स्वाभाविक माना जाता है। इसके बावजूद, यदि रात को बोलने का यह सिलसिला लगातार बना रहे या इसके साथ असामान्य शारीरिक लक्षण दिखाई देने लगें, तो यह किसी अंतर्निहित स्लीप डिसऑर्डर की ओर इशारा कर सकता है।
नींद में बोलने के पीछे क्या हैं मुख्य वजहें
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, नींद में बात करने के पीछे कोई एक निश्चित कारण नहीं होता। यह स्थिति नींद के किसी भी अलग-अलग चरण के दौरान उभर सकती है। कई लोगों में मानसिक तनाव और एंग्जायटी यानी घबराहट की स्थिति इस समस्या को काफी हद तक बढ़ा देती है। जब दिमाग अत्यधिक मानसिक थकान से गुजर रहा हो या व्यक्ति को नियमित रूप से पर्याप्त और गहरी नींद न मिल पा रही हो, तब सोते समय बोलने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
इसके अतिरिक्त, अचानक तेज बुखार आ जाना, नींद की भारी कमी होना या दैनिक जीवन में सामान्य से अधिक तनाव होना भी इस आदत को सक्रिय कर सकता है। उम्र के लिहाज से देखा जाए तो बच्चों में नींद में बोलने की प्रवृत्ति काफी अधिक देखी जाती है, लेकिन जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं और उनकी उम्र बढ़ती है, यह आदत स्वाभाविक रूप से कम या खत्म हो जाती है।
क्या सपनों से जुड़ा होता है नींद का बड़बड़ाना
अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या व्यक्ति वही बोलता है जो वह सपने में देख रहा होता है। नींद में बात करने और सपने देखने के बीच कुछ मामलों में संबंध हो सकता है, परंतु हर बार ऐसा होना जरूरी नहीं है। सोते समय व्यक्ति के मुंह से निकलने वाले शब्द उसके सपने की वास्तविक कहानी या उसकी असल सोच को प्रतिबिंबित नहीं करते। इसलिए नींद में कही गई बातों को किसी व्यक्ति की सच्ची भावनाएं या आंतरिक विचार मानकर कोई भी व्यक्तिगत राय या निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होता।
कब जरूरी हो जाती है डॉक्टर की सलाह
यदि नींद में बोलने की यह स्थिति केवल कभी-कभार घटती है और इससे व्यक्ति की नींद में कोई खलल नहीं पड़ता, तो सामान्य तौर पर किसी प्रकार की चिंता की आवश्यकता नहीं होती। हालांकि, यदि यह आदत अचानक शुरू हो जाए, इसकी आवृत्ति बहुत अधिक बढ़ जाए, या फिर इसके साथ कुछ गंभीर लक्षण दिखाई देने लगें, तो सतर्क होना बेहद आवश्यक हो जाता है। उदाहरण के लिए, नींद में जोर-जोर से चीखना, अचानक हिंसक शारीरिक हरकतें करना, चौंक कर उठ जाना, सांस लेने में तकलीफ महसूस होना या दिनभर अत्यधिक सुस्ती और नींद आना ऐसे लक्षण हैं जो किसी गंभीर विकार की तरफ इशारा करते हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत किसी योग्य डॉक्टर अथवा स्लीप स्पेशलिस्ट से परामर्श लेना उचित रहता है।
रात की बेहतर नींद के लिए जीवनशैली में बदलाव
स्लीप टॉकिंग की समस्या को नियंत्रित करने और नींद की गुणवत्ता सुधारने के लिए दैनिक दिनचर्या में कुछ साधारण सावधानियां बरती जा सकती हैं। सबसे पहले, प्रतिदिन सोने और सुबह जागने का एक निश्चित समय निर्धारित करें और उसका कड़ाई से पालन करें। शाम ढलने के बाद अत्यधिक कैफीन के सेवन से बचें ताकि मस्तिष्क उत्तेजित न रहे। इसके साथ ही, रात को बिस्तर पर जाने से ठीक पहले स्मार्टफोन और लैपटॉप जैसे डिजिटल उपकरणों के उपयोग को सीमित करना बहुत फायदेमंद साबित होता है। मानसिक तनाव को दूर करने के लिए अपनी दिनचर्या में रिलैक्सेशन तकनीक और ध्यान जैसी मन को शांत करने वाली आदतों को शामिल करना चाहिए।



















