सर्दियों का मौसम दस्तक देते ही सेहत से जुड़ी कई तरह की गंभीर चुनौतियां सामने आने लगती हैं। विशेष रूप से वे लोग जो पहले से हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, उन्हें गिरते पारे के बीच अपनी सेहत का खास ख्याल रखने की आवश्यकता होती है। मौसम में ठंडक बढ़ने के साथ ही स्ट्रोक और ब्रेन हेमरेज के मामलों में अचानक बढ़ोतरी देखी जाती है। कई मामलों में तो रात में गहरी नींद के दौरान ही स्ट्रोक का आघात हो जाता है और व्यक्ति को इसकी भनक अगली सुबह सोकर उठने के बाद ही लग पाती है। इस मौसम में रक्तचाप और रक्त नलिकाओं पर पड़ने वाले असर को समझना बेहद जरूरी है ताकि गंभीर आपात स्थितियों से समय रहते बचाव किया जा सके।
तापमान गिरने से शरीर में क्यों पैदा होता है स्ट्रोक का खतरा
सर्दियों के दिनों में वातावरण का तापमान कम होते ही मानव शरीर को अपना भीतरी तापमान सामान्य बनाए रखने के लिए अतिरिक्त मशक्कत करनी पड़ती है। न्यूरोसर्जन डॉ मनीष कुमार धीरज के अनुसार, जब शरीर ठंड के सीधे संपर्क में आता है तो आंतरिक स्तर पर सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम सक्रिय हो उठता है। इस तंत्रिका तंत्र के सक्रिय होने से रक्त वाहिकाओं में सिकुड़न पैदा होती है और रक्तचाप में अप्रत्याशित उतार चढ़ाव आने लगता है।
जिन व्यक्तियों को पहले से ही हाई बीपी, डायबिटीज अथवा उच्च कोलेस्ट्रॉल की परेशानी है, उनके लिए यह शारीरिक बदलाव काफी संवेदनशील और जोखिम भरा साबित हो सकता है। रक्त नलिकाओं में पहले से मौजूद रुकावट या कमजोरी के चलते जब दबाव बढ़ता है, तो रक्त वाहिकाओं के फटने या उनमें रुकावट आने का जोखिम बढ़ जाता है, जिससे अंततः ब्रेन हेमरेज या स्ट्रोक की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
रात में सोते समय अचानक होने वाली गलतियां और उनसे बढ़ता जोखिम
सर्दियों के दौरान दिन की तुलना में रात का समय अधिक सतर्कता की मांग करता है। डॉ मनीष कुमार धीरज बताते हैं कि रात में सोते वक्त अक्सर लोग अनजाने में कंबल या रजाई हटा देते हैं और उनका शरीर सीधे सर्द हवा अथवा ठंडे वातावरण के संपर्क में आ जाता है। जब शरीर का तापमान अचानक गिरता है, तो तुरंत तीव्र सिम्पैथेटिक प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है, जो रक्तचाप के स्तर को एकाएक बिगाड़ देती है।
बुजुर्गों और बीपी या शुगर की बीमारियों से जूझ रहे लोगों में अचानक ठंड लगना किसी बड़ी मुसीबत का सबब बन सकता है। यही कारण है कि रात में सोते समय अपने शरीर को पूरी तरह गर्म और ढंककर रखना बेहद आवश्यक है। रात में अचानक बिस्तर से उठकर बिना गर्म कपड़ों के ठंडे फर्श पर पैर रखना या सर्द कमरे में जाना रक्तचाप को असामान्य रूप से बढ़ा सकता है, इसलिए हमेशा सावधानी बरतनी चाहिए।
ब्लड प्रेशर और डायबिटीज की दवाइयां खुद से बंद करने की न करें भूल
सर्दियों के मौसम में मरीजों के बीच दिखने वाली एक बहुत बड़ी लापरवाही पर बात करते हुए विशेषज्ञ ने आगाह किया है कि दवाइयों का नियमित सेवन कभी न छोड़ें। अक्सर देखा जाता है कि जब जांच में बीपी या शुगर का स्तर सामान्य दर्ज होता है, तो कई मरीज यह मान बैठते हैं कि वे अब पूरी तरह ठीक हो चुके हैं और बिना किसी चिकित्सकीय परामर्श के अपनी दवाइयां रोक देते हैं या उनकी खुराक खुद ही कम कर लेते हैं।
इस संबंध में स्पष्ट समझ होना जरूरी है कि जांच में सामान्य बीपी का स्तर केवल इस बात का संकेत है कि ली जा रही दवा असरदार तरीके से काम कर रही है, न कि यह दवा बंद करने का इशारा है। यदि किसी मरीज को यह महसूस होता है कि उसकी खुराक में बदलाव या कमी की जरूरत है, तो इसका फैसला केवल और केवल डॉक्टर की सलाह पर ही होना चाहिए। बिना अनुमति के दवा छोड़ना अचानक स्ट्रोक या हेमरेज को दावत देना साबित हो सकता है।
दवा लेने का सही वक्त: सुबह का नाश्ता या रात का समय?
मरीजों के जेहन में अक्सर यह उलझन बनी रहती है कि बीपी और शुगर की दवाइयां सुबह लेना ज्यादा मुफीद है या रात में। इस पर डॉ मनीष कुमार धीरज का कहना है कि दवा लेने के समय को लेकर कोई ऐसा एकतरफा नियम नहीं है जो हर मरीज पर एक समान लागू हो सके। हर व्यक्ति की चिकित्सीय स्थिति, उसके शरीर की जरूरत और बीमारी की गंभीरता के आधार पर ही समय तय किया जाता है।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी मरीज को रक्तचाप नियंत्रण के लिए दो अलग अलग दवाएं दी गई हैं, तो डॉक्टर प्रायः एक खुराक सुबह और दूसरी रात के वक्त लेने का निर्देश देते हैं। ठीक इसी प्रकार शुगर की दवाओं के समय का निर्धारण भी संबंधित व्यक्ति के ब्लड शुगर प्रोफाइल के अनुरूप किया जाता है। हालांकि, यदि कोई मरीज 24 घंटे में केवल एक बार ही बीपी की दवा लेता है, तो सुबह नाश्ते के उपरांत दवा का सेवन एक बेहतर विकल्प माना जा सकता है। फिर भी, दवा का सही समय पूरी तरह मरीज की स्थिति, दवा के प्रकार और डॉक्टर के निर्देशों पर निर्भर करता है, इसलिए अपनी मर्जी से समय में कोई फेरबदल नहीं करना चाहिए।
सर्दियों में स्ट्रोक से सुरक्षित रहने के जरूरी एहतियाती उपाय
सर्दियों के महीनों में स्ट्रोक जैसी जानलेवा स्थिति से बचने के लिए कुछ बुनियादी दैनिक सावधानियों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है
- शरीर को गर्म रखना: रात में सोते समय कंबल या रजाई ठीक प्रकार से ओढ़ें ताकि शरीर का सामान्य तापमान बना रहे और अचानक ठंड के संपर्क में आने से बचा जा सके।
- नियमित स्वास्थ्य परीक्षण: हाई बीपी और डायबिटीज से पीड़ित लोग समय समय पर अपने रक्तचाप और शुगर स्तर की जांच करते रहें ताकि उतार चढ़ाव की तुरंत जानकारी मिल सके।
- समय पर दवा का सेवन: चिकित्सक द्वारा सुझाई गई दवाइयों का सेवन नियत समय पर बिना किसी नागा के लगातार जारी रखें।
- दवाओं में फेरबदल से परहेज: रिपोर्ट सामान्य आने के बावजूद दवाइयां अपने मन से कभी बंद न करें और खुराक या समय बदलने से पहले डॉक्टर की राय अवश्य लें।
स्ट्रोक के चेतावनी भरे लक्षणों को पहचानें और तुरंत अस्पताल पहुंचें
स्ट्रोक की स्थिति में मरीज की जान बचाने और उसे लकवे से सुरक्षित रखने के लिए समय पर चिकित्सा सहायता मिलना सबसे अहम कड़ी है। इसके प्रमुख लक्षणों में चेहरे का एक तरफ झुक जाना या विकृत हो जाना, शरीर के किसी एक हिस्से विशेषकर हाथ या पैर में अचानक सुन्नपन या कमजोरी महसूस होना, बातचीत करने या दूसरों की बात समझने में भारी परेशानी होना और आंखों के आगे अचानक धुंधलापन या देखने में दिक्कत आना शामिल हैं।
यदि किसी व्यक्ति में ऐसे लक्षण नजर आएं, तो एक पल की भी देरी किए बिना उसे तत्काल नजदीकी अस्पताल ले जाना चाहिए। सुबह होने का इंतजार करना या किसी भी तरह के घरेलू नुस्खों और प्राथमिक उपचार के भरोसे बैठे रहना मरीज के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है, क्योंकि स्ट्रोक में हर एक मिनट कीमती होता है।



















