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प्रशासनिक बेरुखी के बाद हजारीबाग के ग्रामीणों ने उठाया फावड़ा, जंगल काटकर खुद तैयार कर रहे 5 किमी सड़कझारखंड
31 अक्तू॰ 2026, 9:04 am (1 घंटे पहले)· 2

प्रशासनिक बेरुखी के बाद हजारीबाग के ग्रामीणों ने उठाया फावड़ा, जंगल काटकर खुद तैयार कर रहे 5 किमी सड़क

हजारीबाग के हेसाकोचा गांव में सड़क की मांग अनसुनी होने पर करीब 250 ग्रामीणों ने खुद औजार उठाकर पांच किलोमीटर लंबे जर्जर रास्ते की मरम्मत शुरू कर दी है.

झारखंड के हजारीबाग जिले में स्थित टाटीझरिया प्रखंड की बेडम पंचायत का सुदूरवर्ती गांव हेसाकोचा इन दिनों सामूहिक आत्मनिर्भरता की अनोखी तस्वीर पेश कर रहा है. बुनियादी सुविधाओं और प्रशासनिक तंत्र से लगातार निराशा मिलने के बाद यहां के निवासियों ने व्यवस्था पर निर्भर रहने के बजाय खुद विकास का बीड़ा उठा लिया है. पिछले पांच दिनों से इस आदिवासी बहुल गांव के महिला, पुरुष और युवा कुदाल, फावड़ा, गैंता और सब्बल लेकर घने जंगल के बीच से गुजरने वाले पांच किलोमीटर लंबे जर्जर रास्ते को दुरुस्त करने में जी-जान से जुटे हैं. लगभग 250 ग्रामीणों की यह सामूहिक पहल आने वाली पीढ़ियों को सड़क की कमी के चलते दशकों से झेली जा रही दुश्वारियों से निजात दिलाने के दृढ़ संकल्प का नतीजा है.

जंगल के बीच सुबह से शाम तक चल रहा श्रमदान

इस दुर्गम इलाके में रोज सुबह से ही काम की गहमागहमी शुरू हो जाती है, जहां गांव का हर तबका अपनी हिस्सेदारी निभा रहा है. कोई पथरीली जमीन पर मिट्टी काट रहा है, कोई भारी पत्थरों को हटाकर किनारों पर कर रहा है, तो कोई उबड़-खाबड़ जमीन को पाटकर समतल बनाने में पसीना बहा रहा है. इस अभियान की सबसे मजबूत कड़ी गांव की महिलाएं हैं, जो पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर पत्थरों को तोड़ने और मिट्टी ढोने का कठिन काम कर रही हैं. श्रमदान में शामिल मुनिया मरांडी का कहना है कि अब शासन के भरोसे इंतजार करने का वक्त बीत चुका है, इसलिए गांव के भविष्य के लिए खुद ही रास्ता बनाना जरूरी हो गया था.

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बरसात में दलदल बनता है बेडम पंचायत को जोड़ने वाला संपर्क मार्ग

हेसाकोचा के लोगों के लिए यह मार्ग किसी जीवनरेखा से कम नहीं है, क्योंकि यही कच्चा रास्ता बेडम पंचायत को मुख्य सड़क नेटवर्क से जोड़ता है. घने जंगल के बीच स्थित होने की वजह से सरकारी स्तर पर इसकी मरम्मत की कभी कोई ठोस पहल नहीं हुई. ग्रामीणों ने जनप्रतिनिधियों और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगाकर कई बार पक्की सड़क की गुहार लगाई, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही हाथ लगे. नतीजतन, हर साल बारिश के मौसम में यह पूरा रास्ता दलदल और गहरे गड्ढों में तब्दील हो जाता है, जिससे ग्रामीणों का बाहरी दुनिया से संपर्क कट जाता है. बारिश खत्म होते ही ग्रामीणों को चलने लायक डगर तैयार करने के लिए हर साल खुद ही फावड़ा उठाना पड़ता है, लेकिन इस बार उन्होंने इसे व्यापक स्तर पर दुरुस्त करने का पक्का इरादा किया है.

खाट पर अस्पताल पहुंचते हैं मरीज, दलदल से गुजरते हैं स्कूली बच्चे

पक्की सड़क का न होना ग्रामीणों के लिए सिर्फ आवागमन की असुविधा नहीं, बल्कि जीवन और मौत का गंभीर संकट बना हुआ है. गांव में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं या एंबुलेंस पहुंचना नामुमकिन होने के कारण बीमार मरीजों और प्रसव पीड़ा से जूझ रही गर्भवती महिलाओं को परिजन खाट पर लिटाकर इसी पथरीले जंगल के रास्ते पांच किलोमीटर पैदल ढोने को मजबूर हैं. कई बार अस्पताल पहुंचने में हुई देरी मरीजों की जान पर भारी पड़ जाती है. वहीं गांव के छोटे बच्चों को भी स्कूल आने-जाने के लिए रोजाना कीचड़, पत्थरों और फिसलने वाले रास्तों से होकर जूझना पड़ता है. इसी वजह से गांव के बुजुर्ग और युवा इसे केवल मिट्टी-पत्थर का काम नहीं, बल्कि अपनों की जिंदगी बचाने की एक सामूहिक जंग मान रहे हैं.

सामूहिक भागीदारी से खड़ी हुई व्यवस्था के सामने बड़ी मिसाल

हेसाकोचा गांव के लोगों की यह संगठित पहल जहां एक ओर वर्षों की व्यवस्थागत लापरवाही और प्रशासनिक उपेक्षा की पोल खोलती है, वहीं दूसरी ओर यह साबित करती है कि जनशक्ति एकजुट हो जाए तो बड़े से बड़े काम को मुमकिन बनाया जा सकता है. इस प्रयास को देख रहे सामाजिक कार्यकर्ता राजू यादव का कहना है कि हेसाकोचा के ग्रामीणों ने पूरी दुनिया को यह पैगाम दिया है कि बदलाव के इंतजार में हाथ पर हाथ रखकर बैठने के बजाय पहल खुद अपने हाथों से करनी पड़ती है. ग्रामीणों का कहना है कि उनके इस श्रमदान को स्थायी रूप तभी मिलेगा जब शासन इस रास्ते पर अविलंब पक्की सड़क का निर्माण कराए, ताकि लोगों को हर साल की मशक्कत और खाट पर जिंदगी ढोने के दर्द से हमेशा के लिए आजादी मिल सके.

सवाल-जवाब

हेसाकोचा गांव में लोग खुद सड़क की मरम्मत क्यों कर रहे हैं?
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से बार-बार गुहार लगाने के बावजूद सड़क न बनने पर ग्रामीणों ने खुद फावड़ा उठाकर पांच किलोमीटर लंबे रास्ते को दुरुस्त करने का फैसला किया.
यह गांव झारखंड के किस जिले और प्रखंड में स्थित है?
यह गांव झारखंड के हजारीबाग जिले में टाटीझरिया प्रखंड की बेडम पंचायत के अंतर्गत आता है.
इस श्रमदान में कितने ग्रामीण शामिल हैं और यह कितने दिनों से चल रहा है?
इस श्रमदान में गांव के करीब 250 महिला, पुरुष और युवा शामिल हैं और यह अभियान पिछले पांच दिनों से चल रहा है.
सड़क न होने से ग्रामीणों को सबसे बड़ी परेशानी क्या झेलनी पड़ती है?
सड़क के अभाव में एंबुलेंस न पहुंचने पर गंभीर मरीजों और गर्भवती महिलाओं को पांच किलोमीटर तक खाट पर ढोना पड़ता है, तथा बच्चों को कीचड़ भरे रास्ते से स्कूल जाना पड़ता है.
बारिश के दिनों में इस रास्ते की क्या स्थिति हो जाती है?
जंगल के बीच से गुजरने वाला यह कच्चा रास्ता हर साल बारिश के बाद पूरी तरह जर्जर और कीचड़युक्त हो जाता है, जिससे आवागमन ठप पड़ जाता है.
श्रमदान कर रहे ग्रामीणों की मुख्य मांग क्या है?
ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन उनके इस श्रमदान को संज्ञान में लेते हुए जल्द से जल्द एक स्थायी पक्की सड़क का निर्माण कराए.
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टिप्पणियाँ 5

Dr. Aditya Sharma@aditya-sharma·5 मिनट पहले

प्रशासन की सुस्ती ने इन लोगों को खुद फावड़ा उठाने पर मजबूर कर दिया, पर कब तक ये लोग अपनी किस्मत अपने हाथों से लिखते रहेंगे?

Arjun Mehta@arjun-mehta·28 मिनट पहले

मुनिया मरांडी की बात एकदम सच है, शासन के भरोसे हाथ पर हाथ धरे बैठने से कुछ नहीं होता।

Ravikash Gupta@ravikash·28 मिनट पहले

अर्जुन भाई, बात तो सही है लेकिन बिना प्रशासन की मदद के ये कच्ची सड़क कब तक टिक पाएगी? पहली बरसात में सब बह जाएगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·52 मिनट पहले

प्रशासन पर गुस्सा ठीक है, पर पांच किलोमीटर सड़क क्या सच में सिर्फ फावड़े से ठीक हो जाएगी?

Rohan Verma@rohan-verma·52 मिनट पहले

करण भाई, फावड़े से पक्की सड़क तो नहीं बनेगी, पर जब नेता और अफसर पांच साल तक झांकने न आएं, तो लोग बैठ थोड़ी रहेंगे। कम से कम आने-जाने लायक तो हो जाएगा रास्ता।

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