मऊ में कमर के सबसे निचले हिस्से यानी टेलबोन के आसपास, दोनों नितंबों के बीच बार-बार मवाद निकलने और गांठ बनने की शिकायत लेकर मरीज अस्पताल पहुंच रहे हैं। डॉक्टर इसे पाइलोनाइडल साइनस बता रहे हैं, एक ऐसी बीमारी जिसमें त्वचा के भीतर एक छोटी सुरंग जैसी संरचना बन जाती है और अगर वक्त पर इलाज न हो तो आखिरकार सर्जरी ही एकमात्र रास्ता बचता है।
प्रेमा मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल के सर्जन डॉ. मोहम्मद अरशद के मुताबिक पाइलोनाइडल साइनस में त्वचा के नीचे एक साइनस ट्रैक तैयार हो जाता है। इस जगह घाव बन जाता है और वहां से रुक-रुककर मवाद बहता रहता है, जो मरीज के लिए शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से परेशानी की वजह बनता है।
यह दिक्कत किन लोगों को ज्यादा घेरती है
डॉ. अरशद बताते हैं कि यह बीमारी उन लोगों में ज्यादा देखी जा रही है जिनकी पीठ के निचले हिस्से या कमर पर बाल घने होते हैं और जो घंटों एक ही कुर्सी पर बैठे रहने वाली नौकरी करते हैं। ऐसे लोगों में बाल त्वचा के अंदर धंसने लगते हैं और धीरे-धीरे वहां संक्रमण पनप जाता है, जो आगे चलकर साइनस का रूप ले लेता है। लगातार बैठे रहने से नुकीले बाल त्वचा में गहराई तक घुस जाते हैं और भीतर ही भीतर एक सुरंग बना देते हैं। डॉक्टर के अनुसार अगर इसका इलाज सही तरीके से न हो, तो यह दोबारा उभरने का खतरा भी काफी बना रहता है।
मामूली समझने की भूल पड़ सकती है भारी
डॉक्टर की सलाह साफ है, पाइलोनाइडल साइनस के लक्षण दिखते ही देर किए बिना विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए। समय पर इलाज न मिले तो संक्रमण और फैलने लगता है, मवाद लगातार रिसता रहता है, इससे कपड़े खराब होते हैं और बैठने, उठने से लेकर सामान्य चलने-फिरने तक में परेशानी होने लगती है। अगर मरीज लंबे समय तक इस समस्या को टालता रहे, तो साइनस ट्रैक और बड़ा हो सकता है और संक्रमण आसपास के ऊतकों तक भी पहुंच सकता है। ऐसी हालत में छोटी सर्जरी की जगह बड़ा ऑपरेशन करना पड़ सकता है, जिसमें रिकवरी में भी ज्यादा वक्त लगता है। यही वजह है कि शुरुआती लक्षण दिखते ही डॉक्टर से संपर्क करना सबसे समझदारी भरा कदम माना जाता है।
सर्जरी में रॉम्बॉइड फ्लैप तकनीक से राहत
डॉ. अरशद के मुताबिक इलाज के दौरान रॉम्बॉइड फ्लैप तकनीक अपनाने से बीमारी के दोबारा लौटने की आशंका काफी हद तक कम हो जाती है। यह एक विशेष सर्जिकल तरीका है, जिसे अनुभवी सर्जन के हाथों ही किया जाना जरूरी होता है। इस तकनीक से सफल ऑपरेशन के बाद मरीज को बड़ी राहत मिलती है और महीनों से परेशान कर रही लगातार मवाद निकलने की दिक्कत भी पूरी तरह खत्म हो जाती है।













