एक किशोर लड़की अपने माता-पिता के पास यह शिकायत लेकर आती है कि उसके साथ भेदभाव हो रहा है। वह कहती है कि उन्हें लगता है कि उनके बड़े भाई को उससे ज्यादा आजादी मिलती है और वे उस पर जितना भरोसा करते हैं, उतना उस पर कभी नहीं करेंगे।
रिश्तों में अनबन और माफी का महत्व
न्यू ब्रंसविक स्थित मॉन्कटन विश्वविद्यालय में मनोवैज्ञानिक जीन-मिशेल रॉबिचॉड उन स्थितियों पर अध्ययन करते हैं, जहाँ किशोर अपने माता-पिता के व्यवहार से आहत महसूस करते हैं। मोंट्रियल के जुइश जनरल हॉस्पिटल में अपनी पीएचडी के दौरान उन्होंने ऐसे कई परिवारों को देखा जिनके रिश्ते टूट चुके थे, अक्सर उन जख्मों की वजह से जो बचपन में दिए गए थे। यह देखकर वे इस बात पर शोध करने के लिए उत्सुक हुए कि माता-पिता का माफी मांगना परिवार की खुशहाली पर कैसा असर डालता है।
इस काल्पनिक मामले में सोफी नाम की एक लड़की को लगता है कि उसकी तुलना उसके सफल बड़े भाई से की जाती है। चूँकि माता-पिता उसे बागी मानते हैं, इसलिए वे उस पर ज्यादा पाबंदियां लगाते हैं। रॉबिचॉड अपनी क्लीनिकल प्रैक्टिस के दौरान मरीजों को शोध-आधारित सलाह देना चाहते थे। वे जानना चाहते थे कि क्या माता-पिता का माफी मांगना वास्तव में मददगार है और एक सही माफी कैसी होनी चाहिए।
माफी मांगने में आने वाली बाधाएं
बर्कले स्थित शोध के अनुसार, माफी मांगने से आहत हुए लोगों के मन में क्षमा का भाव पैदा होता है। पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय की मनोवैज्ञानिक करीना शूमैन ने इस दिशा में काम किया कि आखिर लोग माफी क्यों नहीं मांगते। शोध में तीन प्रमुख बाधाएं सामने आईं। पहली बाधा है 'चेहरा बचाने' की कोशिश। अपनी गलती मानना इंसान के लिए असहज होता है क्योंकि हम खुद को एक अच्छा व्यक्ति मानना चाहते हैं।
जब हमें एहसास होता है कि हमने कुछ गलत किया है, तो हम तुरंत बचाव में तर्क गढ़ने लगते हैं जैसे कि हम तनाव में थे या थके हुए थे। शूमैन बताती हैं कि अक्सर конфлик (विवाद) में दोनों पक्षों की जिम्मेदारी होती है, लेकिन इंसान अपनी गलती मानने के बजाय खुद को बेहतर साबित करने में लगा रहता है। इसके अलावा, शर्म की भावना भी माफी के आड़े आती है। जो लोग आत्म-करुणा (self-compassion) रखते हैं, वे अपनी गलतियों को स्वीकार करने में कम हिचकिचाते हैं।
तीसरी बाधा यह धारणा है कि माफी मांगने के बाद भी सामने वाला व्यक्ति उन्हें माफ नहीं करेगा। यदि पेरेंट्स को लगता है कि बच्चा उनकी बात नहीं समझेगा, तो वे माफी नहीं मांगते।
माफी के विभिन्न तरीके
रॉबिचॉड माफी को 'मनोवैज्ञानिक विटामिन' कहते हैं। उनके अनुसार, गलती करना भी बच्चों को मूल्य सिखाने का एक जरिया है। शोध के दौरान उन्होंने देखा कि विक्टिम-सेंटर्ड (पीड़ित पर केंद्रित) माफी अधिक प्रभावी होती है। इसमें माता-पिता कहते हैं कि उन्हें अपनी गलती का एहसास है और वे बच्चे का दर्द समझते हैं। इसके विपरीत, बचाव वाली माफी में माता-पिता अपनी गलतियों को जायज ठहराते हैं या बच्चों को ही दोष देते हैं, जो कि नुकसानदायक होता है।
माता-पिता जब बिना किसी बहाने के माफी मांगते हैं, तो बच्चे अधिक खुलकर बात करते हैं और झूठ बोलने की प्रवृत्ति कम हो जाती है। रॉबिचॉड के अनुसार, जो माता-पिता जिम्मेदारी लेते हैं, उनके परिवारों में थेरेपी के बाद सुधार की गति काफी बेहतर होती है।
क्या माफी से अधिकार कम होते हैं?
अक्सर माता-पिता को यह डर होता है कि बच्चों से माफी मांगने पर उनका अधिकार कम हो जाएगा या वे कमजोर दिखेंगे। हालांकि, रॉबिचॉड का शोध बताता है कि माफी मांगने से पेरेंटिंग के नियमों पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता। यह केवल टूटे हुए भरोसे को जोड़ने का एक माध्यम है।
रॉबिचॉड अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या गंभीर दुर्व्यवहार या बार-बार होने वाली गलतियों के मामले में माफी का प्रभाव कम हो जाता है। उनके अनुसार, कोई भी माता-पिता परफेक्ट नहीं हो सकता। हर किसी के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब तनाव या अन्य बाहरी कारणों से गलतियाँ हो जाती हैं। लेकिन माता-पिता का नियंत्रण इस बात में है कि गलती होने के बाद वे क्या करते हैं। माफी मांगना उन नकारात्मक परिणामों को कम कर सकता है जो एक गलती के कारण हो सकते हैं।













