पार्टी आलाकमान की मौजूदगी में आयोजित एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान हिमाचल प्रदेश के प्रशासनिक तंत्र ने अपने शिक्षण ढांचे में आए ढांचागत बदलावों की रूपरेखा प्रस्तुत की. सत्ता संभालने के बाद से करीब पौने चार साल की कार्यप्रणाली का लेखा-जोखा पेश करते हुए राज्य के शीर्ष नेतृत्व ने बताया कि किस तरह बुनियादी स्तर से लेकर उच्च शैक्षणिक संस्थानों तक नीतिगत फैसले लागू किए गए हैं. इस दौरान उपलब्धियों के साथ-साथ नीतिगत अड़चनों और प्रशासनिक चुनौतियों को भी प्रमुखता से साझा किया गया.
नेतृत्व के समक्ष रखा गया प्राथमिक से उच्च शिक्षा का ब्योरा
इस विचार-विमर्श सत्र में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, लोकसभा में विपक्ष के प्रमुख राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा तथा पार्टी के प्रमुख संगठन पदाधिकारी केसी वेणुगोपाल उपस्थित रहे. पहाड़ी राज्य की ओर से मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में कैबिनेट सहयोगी रोहित ठाकुर और राजेश धर्माणी भी मौजूद थे. राज्य के दोनों मंत्रियों ने क्रमशः सामान्य विद्यालयी शिक्षा और तकनीकी शिक्षण संस्थानों में किए जा रहे नीतिगत परिवर्तनों का तकनीकी पक्ष रेखांकित किया.
बैठक में यह स्पष्ट किया गया कि बीते कुछ वर्षों में राज्य ने केवल प्राथमिक शिक्षण पद्धतियों को ही नहीं बदला, बल्कि कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर भी बड़े नीतिगत संशोधन प्रस्तावित किए हैं. राज्य सरकार ने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं और विभिन्न स्तरों पर पैदा होने वाली संवैधानिक व वैधानिक प्रक्रियाओं के अनुभव भी साझा किए.
रैंकिंग में छलांग और बुनियादी नीतियों का असर
समीक्षा के दौरान सबसे बड़ा आकर्षण राज्य का राष्ट्रीय शैक्षिक तालिकाओं में उल्लेखनीय सुधार रहा. सरकारी आंकड़ों के हवाले से बताया गया कि जिस व्यवस्था की गणना पहले 21वें पायदान पर की जाती थी, वह निरंतर सुधार कार्यक्रमों के बलबूते अब तीसरे स्थान तक पहुंच चुकी है. इसके अलावा समूचे पहाड़ी सूबे को शत-प्रतिशत साक्षरता के मुकाम पर पहुंचाने की उपलब्धि को भी रेखांकित किया गया.
सरकारी शिक्षण केंद्रों को निजी प्रतिस्पर्धियों के समकक्ष खड़ा करने के लिए पाठ्यक्रम में अंग्रेजी को एक मजबूत माध्यम बनाया गया है. साथ ही राज्य के 150 से अधिक सरकारी विद्यालयों को सीबीएसई मान्यता तंत्र से संबद्ध किया जा रहा है ताकि गांव-कस्बों के छात्र भी अखिल भारतीय मानकों के अनुरूप परीक्षा और मूल्यांकन का लाभ ले सकें.
दूरदराज के बच्चों के लिए डे-बोर्डिंग परिसर और वैश्विक अनुभव
पहाड़ी भूगोल और कठिन ग्रामीण परिवेश को ध्यान में रखते हुए राजीव गांधी डे-बोर्डिंग परिसरों के निर्माण की योजना को एक दूरगामी मॉडल बताया गया. इनका मकसद दुर्गम घाटियों में रहने वाले नौनिहालों को भी बड़े शहरों जैसी आधुनिक प्रयोगशालाएं, खेल मैदान और स्मार्ट कक्षाएं उपलब्ध कराना है.
इसके साथ ही अध्यापकों और मेधावी छात्र-छात्राओं को दुनिया की बेहतरीन शिक्षण प्रणालियों से रू-ब-रू कराने के लिए अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर विजिट का प्रबंध किया गया है. प्रशासन का तर्क है कि जब शिक्षक और छात्र वैश्विक शिक्षण पद्धतियों और नई तकनीकों को सीधे देखेंगे, तो वे कक्षाओं के भीतर परंपरागत तौर-तरीकों को छोड़कर नवाचार अपना सकेंगे.
विश्वविद्यालयों में कुलपति चयन पर विधिक खींचतान
उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता और प्रशासनिक सुधारों का जिक्र करते हुए राज्य ने राजभवन के साथ हुए विधायी संवाद को भी नेतृत्व के संज्ञान में लाया. मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि कुलपतियों की चयन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के मकसद से विधानसभा में एक विधेयक पारित कर औपचारिक संस्तुति हेतु लोकभवन भेजा गया था.
हालांकि लोकभवन की आपत्तियों के कारण यह प्रक्रिया लंबी खिंच गई और विधानसभा को पुनः उस विधेयक को पारित करके आगे भेजना पड़ा. सरकार ने नेतृत्व को आश्वस्त किया कि यह कदम विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक संचालन को जवाबदेह और नियमों के अनुकूल बनाने के उद्देश्य से ही उठाया गया था.
भर्ती प्रणाली में निष्पक्षता और आयोगों की भूमिका
उच्च शिक्षण संस्थानों में नियुक्तियों पर उठने वाले सवालों को समाप्त करने के लिए सरकार ने चयन प्रक्रिया को स्वतंत्र एजेंसियों के हवाले करने का निर्णय लिया है. इसके अंतर्गत विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों और शिक्षकों की भर्ती राज्य लोक सेवा आयोग के माध्यम से कराने की व्यवस्था बनाई गई है.
वहीं दूसरी ओर, शिक्षणेत्तर कर्मचारियों और सहायक पदों के लिए कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षाएं अनिवार्य की गई हैं. प्रशासन के अनुसार, इन दोनों स्वतंत्र आयोगों के जरिए भर्तियां होने से भाई-भतीजावाद समाप्त होगा, चयन केवल योग्यता के आधार पर होगा और आम उम्मीदवारों का सरकारी भर्ती प्रणाली में विश्वास मजबूत होगा.























