हिमाचल प्रदेश के दिग्गज राजनेता और पूर्व सैनिक मेजर विजय सिंह मनकोटिया का पार्थिव शरीर बुधवार को उनके पैतृक गांव तियारा में पंचतत्व में विलीन हो गया। कांगड़ा जिले के शाहपुर स्थित उनकी पुश्तैनी हवेली से जब अंतिम विदाई यात्रा निकली, तो बैंड-बाजे की धुनों के बीच हजारों नागरिकों ने उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दी। 87 वर्ष की आयु में अंतिम सांस लेने वाले इस वरिष्ठ नेता का अंतिम संस्कार पूरे सैन्य सम्मान के साथ किया गया, जहां जनसैलाब ने उन्हें विदा किया।
विदेश से लौटे पुत्र ने दी मुखाग्नि
अंतिम संस्कार के लिए उनके पुत्र सूर्यवीर सिंह और पुत्री संयुक्ता कुमारी अमेरिका से सीधे गांव पहुंचे। सूर्यवीर सिंह ने हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार चिता को मुखाग्नि दी। इस दौरान श्मशान घाट और आसपास का पूरा इलाका अत्यंत भावुक वातावरण से घिर गया। क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों, पूर्व सैन्य कर्मियों और आम ग्रामीणों ने मनकोटिया के परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त कीं। वह अपने पीछे पत्नी जयश्री कुमारी को छोड़ गए हैं, जिनका मायका राजस्थान के कोटा कुनाड़ी क्षेत्र से जुड़ा है।
मंगलवार सुबह अचानक बिगड़ी थी तबीयत
उनके भाई अभय सिंह मनकोटिया ने अंतिम क्षणों की जानकारी साझा करते हुए बताया कि मंगलवार सुबह करीब आठ बजकर चालीस मिनट पर उन्हें अचानक असहजता महसूस हुई। अभय सिंह के अनुसार, उस वक्त उन्होंने बस इतना कहा था कि मुझे लिटा दो। इससे कुछ ही देर पहले तक वह बिल्कुल स्वस्थ नजर आ रहे थे, उन्होंने स्नान किया था और अपनी आगामी बैठक की तैयारियों में जुटे थे। उन्हें पहले से कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या नहीं थी। चिकित्सकों को फौरन घर बुलाया गया, लेकिन स्थिति तेजी से बिगड़ने लगी। अस्पताल ले जाते समय रास्ते में दिल का दौरा पड़ने के कारण उनका निधन हो गया।
शिक्षा से लेकर युद्ध के मैदान तक का सफर
मेजर मनकोटिया का जन्म 23 नवंबर, 1939 को कांगड़ा के तियारा गांव में हुआ था। उनकी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा 1948 से 1954 के बीच शिमला के प्रसिद्ध बिशप कॉटन स्कूल में हुई, जिसके उपरांत उन्होंने देहरादून के दून स्कूल में अध्ययन किया। सैन्य सेवा के प्रति उनके समर्पण की शुरुआत 1960 में हुई, जब उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में कदम रखा। कठिन प्रशिक्षण के दौरान असाधारण प्रदर्शन करते हुए उन्होंने प्रतिष्ठित 'स्वॉर्ड ऑफ ऑनर' और स्वर्ण पदक अपने नाम किया। एक जांबाज सैन्य अधिकारी के रूप में उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध के साथ-साथ 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों में भी सक्रिय योगदान दिया था।
राजनीतिक पारी और गांधी परिवार से नजदीकी
सेना से निवृत्त होने के बाद उन्होंने 1982 में शाहपुर विधानसभा क्षेत्र से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़कर शानदार जीत दर्ज की। वह कुल पांच बार विधायक चुने गए और वीरभद्र सिंह की सरकार में दो बार कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। वरिष्ठ पत्रकार संजीव शर्मा के अनुसार, वह पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के करीबी मित्रों में शामिल थे और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उन्हें अपने तीसरे बेटे जैसा स्नेह देती थीं। प्रधानमंत्री आवास में उनकी बेरोक-टोक पहुंच हुआ करती थी और इंदिरा गांधी की प्रेरणा से ही उन्होंने सक्रिय सियासत में कदम रखा था। अपने लंबे राजनीतिक सफर के दौरान वह 2007 के चर्चित ऑडियो सीडी विवाद के समय भी राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहे थे।



















