जापान की सरजमीं पर चल रहे एशियन गेम्स 2026 में भारतीय निशानेबाजों ने अपनी अचूक सटीकता से देश को गौरवान्वित किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही निशानेबाज आशिमा अहलावत ने महिलाओं की ट्रैप टीम स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत के नाम रजत पदक दर्ज कराया। आशिमा ने यह पदक अपनी साथी निशानेबाजों मनीषा कीर और नीरू ढांडा के साथ मिलकर जीता। तीनों एथलीटों के संतुलित प्रदर्शन की बदौलत भारतीय दल पोडियम तक पहुंचने में सफल रहा।
विश्वविद्यालय परिसर में उत्सव और कुलपति की सराहना
आशिमा वर्तमान में दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में एमए कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनकी इस बड़ी कामयाबी की खबर पहुंचते ही दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रांगण में उत्सव का माहौल बन गया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर आशिमा को औपचारिक बधाई दी। प्रो. योगेश सिंह के अनुसार, ऐसी गौरवशाली उपलब्धियां न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का मान बढ़ाती हैं, बल्कि विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा में भी चार चांद लगाती हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आशिमा की यह सफलता अन्य विद्यार्थियों और उभरते हुए युवा खिलाड़ियों के लिए एक प्रेरक मिसाल बनेगी।
विश्वविद्यालय स्तर पर पहले भी लहरा चुकी हैं परचम
जापान में चमकी आशिमा का घरेलू प्रतियोगिताओं में भी दबदबा रहा है। इससे पहले अप्रैल 2026 के दौरान अमृतसर स्थित जीएनडीयू परिसर में ऑल इंडिया इंटर-यूनिवर्सिटी शूटिंग (महिला) टूर्नामेंट का आयोजन किया गया था। इस राष्ट्रीय विश्वविद्यालय प्रतियोगिता के ट्रैप इवेंट में आशिमा दिल्ली विश्वविद्यालय की उस महिला टीम का हिस्सा थीं जिसने स्वर्ण पदक अपने नाम किया था। केवल टीम ही नहीं, बल्कि इसी चैंपियनशिप की व्यक्तिगत ट्रैप स्पर्धा में भी उन्होंने अपनी असाधारण लय दिखाते हुए सिल्वर मेडल जीता था।
खरकड़ा गांव से अंतरराष्ट्रीय पोडियम तक की कहानी
हरियाणा के रोहतक जिले में स्थित खरकड़ा गांव की रहने वाली आशिमा का जन्म 27 सितंबर 2003 को हुआ था। उनके भीतर निशानेबाजी का जुनून वर्ष 2018 के राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान जागा। उस समय भारतीय निशानेबाजों, विशेषकर मनु भाकर और हीना सिद्धू के शानदार प्रदर्शन ने इस युवा खिलाड़ी को बेहद आकर्षित किया। उसी समय आशिमा ने एक पेशेवर निशानेबाज बनने की ठान ली थी।
पढ़ाई की अनोखी शर्त और मां का संघर्ष
आशिमा की मां सुमित्रा अहलावत हमेशा इस बात को लेकर सतर्क थीं कि खेल की व्यस्तताओं के चलते बेटी की पढ़ाई पर कोई असर न पड़े। उन्होंने निशानेबाजी में आगे बढ़ने के लिए बेटी के सामने एक कड़ी शर्त रखी थी कि बारहवीं बोर्ड परीक्षा में कम से कम 98 फीसदी अंक लाने होंगे। आशिमा ने इस चुनौती को स्वीकार किया और 98.6 प्रतिशत अंक हासिल करके न सिर्फ शर्त पूरी की, बल्कि लेडी श्रीराम कॉलेज में दाखिला भी सुनिश्चित किया।
शुरुआत में आशिमा 10 मीटर एयर पिस्टल से अभ्यास करती थीं। इसके बाद पूर्व भारतीय निशानेबाज रंजन सोढ़ी के परामर्श पर उन्होंने शॉटगन ट्रैप शूटिंग की तरफ रुख किया। बेटी की खेल यात्रा को पंख देने के लिए मां सुमित्रा को रोहतक से दिल्ली में बसना पड़ा। करियर के शुरुआती दिनों में संसाधनों की भारी किल्लत रही और पहली शॉटगन तथा पर्याप्त गोलियों का प्रबंध करने में ही परिवार को लगभग आठ महीने लग गए थे।



















