हिमाचल प्रदेश के श्रम एवं रोजगार विभाग में पिछले 13 वर्षों से निरंतर सेवाएं दे रहे आउटसोर्स कर्मचारियों के सामने अचानक आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। विभिन्न विभागीय कार्यालयों में तैनात 160 डाटा एंट्री ऑपरेटरों का निर्धारित सेवा काल 30 सितंबर को औपचारिक रूप से समाप्त हो रहा है। इस समयावधि के पूरा होते ही इन कर्मचारियों के भविष्य पर अनिश्चितता के काले बादल मंडराने लगे हैं, क्योंकि उनके अनुबंध के नवीनीकरण की प्रक्रिया पूरी तरह अटक गई है।
बिना लिखित पत्र के मौखिक निर्देशों पर कार्यालय आने से मनाही
हिमाचल प्रदेश आउटसोर्स कर्मचारी संघ की ओर से साझा की गई जानकारी के अनुसार, जिला रोजगार अधिकारियों को उच्च निदेशालय स्तर से अनौपचारिक व मौखिक निर्देश जारी किए गए हैं। इन निर्देशों के तहत अधिकारियों से कहा गया है कि वे अपने-अपने कार्यालयों में तैनात सभी आउटसोर्स डाटा एंट्री ऑपरेटरों को 1 अक्टूबर से काम पर न आने की सख्त हिदायत दे दें। हालांकि, विभाग की ओर से कर्मचारियों की छंटनी या सेवा समाप्ति को लेकर अब तक कोई आधिकारिक लिखित आदेश जारी नहीं किया गया है।
श्रम एवं रोजगार आउटसोर्स कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष यदोपति चौहान ने कर्मचारियों की पीड़ा उजागर करते हुए बताया कि इन सभी कर्मचारियों ने पिछले 13 वर्षों के लंबे सफर में पूरी निष्ठा, ईमानदारी और समर्पण के साथ सरकारी कामकाज संभाला है। सेवा विस्तार या नवीनीकरण न होने की स्थिति में इस तरह अचानक मौखिक फरमान सुनाए जाने से सैकड़ों परिवार संकट में पड़ गए हैं। चौहान ने सवाल उठाया कि इस स्थिति में ये कर्मचारी अपने घर-परिवार का भरण-पोषण कैसे करेंगे और बच्चों की परवरिश किस तरह हो पाएगी। मौखिक संदेशों में यहां तक कह दिया गया है कि यदि कोई कर्मचारी अपनी मर्जी से दफ्तर आता भी है, तो उसे उस अवधि का वेतन नहीं दिया जाएगा।
स्थायी नीति के दावों के बीच कर्मचारी शोषण का आरोप
कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष ने लगातार जारी इस अनिश्चितता को कर्मचारियों का गंभीर शोषण करार दिया है। उन्होंने रेखांकित किया कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू सार्वजनिक मंचों से आउटसोर्स कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए एक पारदर्शी व स्थायी नीति तैयार करने और किसी भी कर्मी को सेवा से बाहर न निकालने की बातें दोहराते रहे हैं। इसके विपरीत, जमीनी हकीकत यह बन चुकी है कि नीति तैयार होना तो दूर, वर्षों से निष्ठापूर्वक कार्य कर रहे पुराने कर्मियों को बिना किसी स्पष्ट आधार के बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।
योजनाएं बंद होने और बजट की कमी का विभागीय हवाला
विभागीय अधिकारियों की ओर से दी जा रही दलीलों का ब्योरा देते हुए यदोपति चौहान ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों का कहना है कि इन सभी डाटा एंट्री ऑपरेटरों की मूल नियुक्ति जिन विशेष योजनाओं के संचालन के लिए की गई थी, वे योजनाएं वर्तमान में निष्प्रभावी या बंद हो चुकी हैं। अधिकारियों के अनुसार, इन मदों में अब कोई अतिरिक्त बजट उपलब्ध नहीं बचा है।
अधिकारियों का यह भी कहना है कि जब तक प्रदेश सरकार कौशल विकास भत्ता योजना 2013 और बेरोजगार भत्ता योजना 2017 को पुनः प्रभावी रूप से संचालित नहीं करती, तब तक इन पदों पर सेवा विस्तार संभव नहीं हो सकेगा। वहीं, निदेशालय स्तर पर यह बात भी सामने आई है कि आउटसोर्सिंग कंपनियों के साथ अनुबंध नवीनीकरण संबंधी औपचारिक फाइल तैयार करके शासन को भेजी जा चुकी है। हालांकि, यह फाइल श्रम विभाग के प्रशासनिक सचिव के कार्यालय में पिछले कई दिनों से लंबित पड़ी है, जिसके चलते किसी भी निर्णय पर मुहर नहीं लग पाई है।
जल शक्ति विभाग में उपजे गतिरोध की पुनरावृत्ति
उल्लेखनीय है कि सरकारी विभागों में आउटसोर्स कर्मचारियों के सामने ऐसा संकट पहली बार नहीं देखा गया है। इससे पहले जल शक्ति विभाग में तैनात आउटसोर्स कर्मियों को लेकर भी कार्यदायी कंपनी नाइलिट की ओर से 1 अक्टूबर से दफ्तर न आने का फरमान सुनाया गया था। कंपनी ने उस समय यह तर्क दिया था कि सरकार के साथ उसका वार्षिक अनुबंध नवीनीकृत नहीं हो पाया है।
हालांकि, जब यह मामला सार्वजनिक हुआ और चर्चा का विषय बना, तब राज्य सरकार ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए स्थिति संभाली थी। सरकार ने यह आश्वस्त किया था कि किसी भी कर्मचारी को कार्यमुक्त नहीं किया जाएगा और संबंधित कंपनी के साथ अनुबंध का विधिवत नवीनीकरण किया जाएगा। इस संबंध में प्रदेश के जल शक्ति मंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर जानकारी साझा करते हुए कर्मियों को राहत प्रदान की थी। अब श्रम विभाग के 160 ऑपरेटर भी सरकार से इसी तरह के त्वरित व निर्णायक हस्तक्षेप की उम्मीद लगाए बैठे हैं।



















