दीपावली की दस्तक के साथ ही बाजारों में त्योहार की चहल-पहल अपने चरम पर पहुंच चुकी है। घरों के रंग-रोगन और साज-सज्जा के साथ-साथ श्रद्धालु लक्ष्मी पूजन की सामग्रियों को जुटाने में पूरी शिद्दत से लगे हैं। मेवाड़ के प्रवेश द्वार के रूप में विख्यात भीलवाड़ा शहर के हाट-बाजारों में इन दिनों एक मौसमी फल हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। इस छोटे से जंगली फल को स्थानीय लोग लाल बोर के नाम से पुकारते हैं, जिसकी मौजूदगी के बिना क्षेत्र में दिवाली की पूजा अधूरी मानी जाती है।
साल में सिर्फ दिवाली के वक्त होती है बाजार में आमद
सामान्य दिनों में यह फल मंडी या ठेले पर ढूंढने से भी नहीं मिलता। पूरे बारह महीनों में केवल दीपावली के पखवाड़े में ही इसकी आवक शहर के बाजारों में दर्ज की जाती है। भीलवाड़ा और आसपास के मेवाड़ अंचल में यह पुरानी मान्यता है कि मां लक्ष्मी की आराधना के समय पूजा की थाली में लाल बोर जरूर अर्पित किया जाना चाहिए। इसी धार्मिक जुड़ाव के चलते जैसे ही दिवाली की तिथियां नजदीक आती हैं, लोग इसकी खरीदारी के लिए दुकानों और फुटपाथों पर उमड़ पड़ते हैं।
चार दशकों से जारी है बिक्री, घर-घर में है पूजन की रीत
इस फल का कारोबार करने वाले स्थानीय व्यापारी रामपाल के अनुसार, लक्ष्मी पूजन में लाल बोर चढ़ाने की परंपरा सदियों पुरानी है। रामपाल स्वयं पिछले 40 वर्षों से हर दीपावली पर भीलवाड़ा के बाजार में इस खास फल की दुकान सजा रहे हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि भीलवाड़ा शहर और आसपास के इलाकों में लगभग हर गृहस्थ की पूजा थाली में लाल बोर एक अनिवार्य घटक रहता है, जिसके कारण त्योहार के ऐन पहले इसकी मांग में कई गुना उछाल आ जाता है।
व्यावसायिक खेती नहीं, जंगली झाड़ियों से होता है संग्रह
इस अनूठे फल की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसे किसी व्यावसायिक बागवानी या आधुनिक कृषि फार्म में मुनाफे के लिए नहीं उपजाया जाता। यह पूरी तरह से कुदरती उपज है, जो भीलवाड़ा जिले के ग्रामीण आंचल, पथरीले पहाड़ी भूभाग और जंगलों में खड़ी कांटेदार झाड़ियों पर प्राकृतिक तौर पर फलता है। ग्रामीण इलाकों के किसान और स्थानीय संग्राहक इसे जंगलों से तोड़कर शहरों तक पहुंचाते हैं। किसी भी रासायनिक खाद या कीटनाशक के बिना प्राकृतिक माहौल में पकने की वजह से इसका जायका और खट्टा-मीठा स्वाद बेहद अनोखा होता है।
आस्था के साथ स्वाद का भी अनोखा संगम
भीलवाड़ा के जनजीवन में लाल बोर का स्थान केवल धार्मिक अनुष्ठान तक ही सीमित नहीं है। रोशनी के इस महापर्व पर लोग मिठाइयों, सूखे मेवों और अन्य मौसमी फलों के साथ-साथ इस देसी फल को अपने खानपान का हिस्सा बनाने के लिए भी चाव से खरीदते हैं। इसकी ताजगी और विशेष स्वाद के मुरीद लोग इसे खाने के लिए भी घर लाते हैं, जिससे यह छोटा सा फल पूरे अंचल में दीपोत्सव की संस्कृति और जीवनशैली का एक अभिन्न अंग बन चुका है।



















