फिल्म वन नाइट ओनली का मुख्य विचार कुछ ऐसा है जैसे फिल्म द पर्ज की तर्ज पर वन-नाइट स्टैंड्स की कहानी रच दी गई हो। लेकिन जिस तरह पहली पर्ज फिल्म एक साधारण होम-इनवेजन थ्रिलर बनकर रह गई थी, ठीक उसी तरह यह फिल्म भी अपनी अनोखी थीम का सही इस्तेमाल करने में नाकाम साबित होती है। निर्देशक विल ग्लक, जिन्हें फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स और एनीवन बट यू जैसी लोकप्रिय रोमांटिक कॉमेडी फिल्मों के लिए जाना जाता है, इस बार एक अजीब किस्म की डिस्टोपियन दुनिया लेकर आए हैं। अगर इस कहानी को वैलेन्टाइन डे या हेलोवीन जैसे किसी आम त्यौहार की पृष्ठभूमि में भी रखा जाता, तो भी इसके प्लॉट में शायद ही कोई खास बदलाव आता। इसके बावजूद, यह विचित्र और अधूरा विचार दर्शकों को शुरुआत में थोड़ा आकर्षित जरूर करता है।
अनोखी डिस्टोपियन कहानी और पारंपरिक रॉम-कॉम का मेल
इस फिल्म की दुनिया का नियम यह है कि अविवाहित जोड़ों के लिए साल के 364 दिनों तक शारीरिक संबंध बनाना पूरी तरह प्रतिबंधित रहता है। इसके बाद एक खास रात आती है, जब सरकार की तरफ से लोगों को छूट दी जाती है। इसी रात की उलझन में न्यू यॉर्क का रहने वाला ओवेन (कैलम टर्नर), जो हाल ही में सिंगल हुआ है, अपने लिए किसी साथी की तलाश में निकलता है। घटनाओं के अजीब सिलसिले के बीच उसकी मुलाकात बार-बार एली (मोनिका बारबारो) से होती है। एली अपने लिए एक सच्चे और खास इंसान को खोज रही है। फिल्म में एली के काल्पनिक दिन के सपने ही एकमात्र ऐसे पल हैं जो दर्शकों को थोड़े मजेदार और चटपटे लगते हैं। दोनों मुख्य कलाकारों के बीच शारीरिक केमिस्ट्री तो दिखाई देती है, लेकिन भावनात्मक स्तर पर उनके बीच शुरुआती तालमेल की काफी कमी महसूस होती है।
किरदारों की ढीली बॉन्डिंग और नए विचारों की कमी
निर्देशक विल ग्लक ने एक पारंपरिक रॉम-कॉम को राजनीतिक थ्रिलर के भारी-भरकम कॉन्सेप्ट के साथ जोड़ने की कोशिश की है, जिससे किरदार अपनी स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्तियां खो बैठते हैं। कहानी की पृष्ठभूमि जनता पर सरकारी नियंत्रण और उनकी पसंद की आजादी छीनने पर आधारित है। लेकिन फिल्म का सतही और ढीला दृष्टिकोण इसी रूढ़िवादिता को दर्शाता है, जिससे स्क्रीन पर मनोरंजन और रोमांस दोनों का स्तर गिर जाता है। पूरी कहानी केवल संयोग पर चलती है, जिसके कारण ओवेन और एली खुद कोई ठोस फैसला नहीं ले पाते। इसका नतीजा यह होता है कि जिस फिल्म को ऊर्जा और उत्साह से भरपूर होना चाहिए था, वह बेहद सुस्त और नीरस नजर आती है।
कमज़ोर व्यंग्य और निराशाजनक कहानी का अंत
अगर यह अनोखा विचार महज एक बैकग्राउंड डिटेल होता, तो शायद दर्शक इसे नजरअंदाज कर देते। लेकिन फिल्म हर बातचीत को इसी दुनिया के नियम समझाने में खर्च कर देती है, जिससे स्क्रीन पर चल रही बातें आपस में मेल नहीं खातीं। सड़कों के किनारों और होर्डिंग्स पर 'वन नाइट' थीम वाले विज्ञापन दिखाए गए हैं, लेकिन काश यह रचनात्मक ऊर्जा कलाकारों के स्क्रीन टाइम पर खर्च की गई होती। ओवेन और एली के बीच पहली वास्तविक बातचीत होने में ही लगभग एक घंटे का समय लग जाता है। जब दोनों साथ मिलकर रात गुजारने की कोशिश करते हैं, तो उनकी बातें स्वाभाविक लगती हैं लेकिन उनका अंत कमजोर पंचलाइन्स पर होता है। कैलम टर्नर और मोनिका बारबारो की तमाम कोशिशों के बावजूद, पटकथा इस दुनिया को किसी सामाजिक या राजनीतिक व्यंग्य के रूप में सही ढंग से पेश नहीं कर पाती। अंततः फिल्म अपनी ही बनाई उलझनों में दब जाती है और दर्शकों को वह मनोरंजन नहीं दे पाती जिसका वादा इसकी कहानी करती है।


















