भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व कृष्ण जन्माष्टमी पूरे देश और दुनिया में अपार श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह त्योहार हर साल भाद्रपद मास में पड़ता है। वर्ष 2026 में भगवान श्री कृष्ण की 5253वीं जयंती मनाई जाएगी। हालांकि पंचांग की तिथियों की गणना के कारण इस बार जन्माष्टमी पर्व की मुख्य तारीख को लेकर श्रद्धालुओं के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई है कि व्रत और पूजा 3 सितंबर को रखी जाए या 4 सितंबर को। खगोलीय गणनाओं और नक्षत्रों के मेल को समझकर श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार सही तिथि, पूजा के शुभ मुहूर्त और व्रत पारण के समय का चयन कर सकते हैं।
खगोलीय गणनाएं और अष्टमी तिथि का समय
दृक पंचांग की गणना के मुताबिक जन्माष्टमी की तारीख का निर्धारण भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग पर निर्भर करता है। यह शुभ संयोग निशिता काल यानी मध्यरात्रि के समय होना अनिवार्य माना जाता है। वर्ष 2026 में अष्टमी तिथि का प्रारंभ 3 सितंबर को शाम 4:55 बजे से होगा, जो 4 सितंबर को दोपहर 2:43 बजे तक बनी रहेगी। इसके साथ ही रोहिणी नक्षत्र 3 सितंबर को दोपहर 2:59 बजे शुरू होकर 4 सितंबर को दोपहर 1:34 बजे समाप्त होगा। 3 सितंबर और 4 सितंबर की दरमियानी रात 1:08 बजे मध्यरात्रि का मुख्य क्षण इसी अष्टमी और रोहिणी के दुर्लभ संयोग के दौरान आ रहा है। इसी कारण अधिकांश गृहस्थ श्रद्धालु 3 सितंबर 2026, दिन गुरुवार को मुख्य रूप से जन्माष्टमी का त्योहार मनाएंगे।
स्मार्त और इस्कॉन-वैष्णव संप्रदाय की परंपराएं
जन्माष्टमी की तारीखों में एक दिन का अंतर विभिन्न संप्रदायों के नियमों के कारण देखने को मिलता है। आम गृहस्थ जीवन जीने वाले लोग स्मार्त परंपरा का पालन करते हैं। स्मार्त परंपरा में निशिता काल यानी आधी रात के समय अष्टमी तिथि की उपस्थिति को प्राथमिकता दी जाती है। इस गणना के तहत गुरुवार, 3 सितंबर 2026 को स्मार्त जन्माष्टमी मनाई जाएगी। दूसरी ओर, इस्कॉन और वैष्णव संप्रदाय से जुड़े मंदिर और अनुयायी उदयातिथि और नक्षत्र के अधिक कड़े नियमों का पालन करते हैं। वैष्णव परंपरा में जन्माष्टमी का पर्व शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। इस्कॉन मंदिरों में जन्माष्टमी के मुख्य धार्मिक कार्यक्रम और उपवास 4 सितंबर को ही आयोजित किए जाएंगे।
दही हांडी उत्सव का समय
जन्माष्टमी के अगले दिन दही हांडी का भव्य और उत्साहपूर्ण उत्सव मनाया जाता है। भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप की माखन चोरी की लीलाओं को याद करते हुए युवाओं की टोलियां हवा में ऊंचाई पर बांधी गई मटकी को फोड़ने का प्रयास करती हैं। वर्ष 2026 के उत्सव चक्र में दही हांडी का आयोजन 4 सितंबर, शुक्रवार को किया जाएगा। देश के विभिन्न शहरों, विशेषकर महाराष्ट्र और गुजरात में 4 सितंबर को दिनभर सांस्कृतिक कार्यक्रमों और मटकी फोड़ प्रतियोगिताओं का आयोजन धूमधाम से होगा।
मध्यरात्रि पूजा का निशिता काल शुभ मुहूर्त
जन्माष्टमी पर भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप के जन्म की मुख्य पूजा आधी रात को निशिता काल में की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण का प्राकट्य मथुरा में मध्यरात्रि के समय हुआ था। 3 सितंबर और 4 सितंबर 2026 की मध्यरात्रि को पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त रात 12:45 बजे से शुरू होकर रात 1:30 बजे तक रहेगा। यह शुभ अवधि कुल 44 मिनट की होगी। इसी 44 मिनट की समयावधि के दौरान मंदिरों और घरों में बाल गोपाल का अभिषेक, नए वस्त्र धारण कराना, भोग लगाना और मुख्य आरती संपन्न की जाती है।
व्रत नियम और पारण का सही समय
जन्माष्टमी पर पूरे दिन का उपवास रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए धर्म शास्त्रों में पारण यानी व्रत खोलने के स्पष्ट नियम बताए गए हैं। धर्म शास्त्र के आदर्श नियमों के अनुसार व्रत का पारण अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र दोनों के समाप्त होने के बाद किया जाना चाहिए। इस नियम के अनुसार 4 सितंबर 2026 को दोपहर 2:43 बजे के बाद पारण करना सबसे उत्तम माना गया है। इसके अलावा जो लोग दोपहर तक इंतजार नहीं कर सकते, उनके लिए एक वैकल्पिक समय भी उपलब्ध है। श्रद्धालु 4 सितंबर की सुबह 6:40 बजे के बाद सूर्योदय, नित्य देव पूजा और विसर्जन संपन्न करने के उपरांत भी अपना उपवास खोल सकते हैं।



















