विश्व बैंक की नई रैंकिंग में श्रीलंका एक बार फिर भारत से ऊपर पहुंच गया है, और यह किसी भी लिहाज से चौंकाने वाली बात है क्योंकि कुछ साल पहले तक यह द्वीप देश आर्थिक तबाही के कगार पर खड़ा था। आसमान छूती कीमतों, जरूरी सामान की भारी किल्लत और कर्ज के बोझ ने वहां इतना बड़ा जनआंदोलन खड़ा कर दिया था कि देश के राष्ट्रपति को मुल्क छोड़कर भागना पड़ा था। अब विश्व बैंक की 2026 की रिपोर्ट में श्रीलंका को अपर मिडिल इनकम यानी ऊपरी मध्यम आय वर्ग में रखा गया है, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था कहीं बड़ी होने के बावजूद इस मामले में उससे पीछे है। सवाल यह है कि इतनी बड़ी आर्थिक तबाही झेल चुका एक छोटा सा देश आखिर भारत से आगे कैसे निकल गया।
अपर मिडिल इनकम इकॉनमी होता क्या है
अपर मिडिल इनकम यानी ऊपरी मध्यम आय वर्ग की अर्थव्यवस्था वह होती है जो हाई इनकम यानी उच्च आय वर्ग में पहुंचने से सिर्फ एक कदम दूर होती है। विश्व बैंक के FY2027 वर्गीकरण के मुताबिक इस श्रेणी में आने के लिए किसी देश की औसत सालाना प्रति व्यक्ति आय 4,42,460 रुपये से 13,71,550 रुपये के बीच होनी चाहिए। इसे मापने के लिए ग्रॉस नेशनल इनकम यानी GNI प्रति व्यक्ति का इस्तेमाल होता है। इसका गणित बेहद आसान है। मान लीजिए किसी देश की कुल सालाना आय 10 लाख रुपये है और वहां की आबादी 10 लोगों की है, तो हर व्यक्ति की औसत आय 1 लाख रुपये मानी जाएगी, और यही 1 लाख रुपया उस देश की प्रति व्यक्ति GNI कहलाएगा। ध्यान देने वाली बात यह है कि विश्व बैंक देशों को श्रेणियों में बांटने के लिए यही औसत आंकड़ा इस्तेमाल करता है, ना कि किसी एक व्यक्ति की असली कमाई।
यह रैंकिंग सिर्फ एक टैग नहीं, बहुत कुछ तय करती है
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, कोलकाता के वाइस प्रेसिडेंट और अर्थशास्त्री नीलांजन घोष इसे स्कूल की रिपोर्ट कार्ड जैसा बताते हैं। जिस तरह रिपोर्ट कार्ड सिर्फ यह नहीं बताता कि आपने कैसा प्रदर्शन किया, बल्कि यह भी तय करता है कि आपको स्कॉलरशिप मिलेगी या नहीं, उसी तरह किसी देश की आय श्रेणी यह भी तय करती है कि उसे दूसरे देशों और वैश्विक संस्थाओं से किस तरह की आर्थिक मदद मिल सकती है। विश्व बैंक की यह आय श्रेणियां ही तय करती हैं कि किन देशों को सस्ता कर्ज, अनुदान और विकास सहायता मिलेगी, और इससे सरकारों तथा अर्थशास्त्रियों को अलग अलग अर्थव्यवस्थाओं की तुलना करने और समय के साथ उनकी प्रगति नापने का एक साझा पैमाना भी मिल जाता है। पाकिस्तान इसका अच्छा उदाहरण है कि निचली श्रेणी में फंसे रहने का क्या नतीजा होता है। भारत की तरह पाकिस्तान भी लोअर मिडिल इनकम यानी निचले मध्यम आय वर्ग में आता है, लेकिन बार बार आई आर्थिक तबाही ने उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF के कर्ज पर बुरी तरह निर्भर कर दिया है। पाकिस्तान पर फिलहाल IMF का 8.96 अरब डॉलर का कर्ज बकाया है, और उससे ज्यादा कर्ज सिर्फ अर्जेंटीना पर 56.83 अरब डॉलर, यूक्रेन पर 14.13 अरब डॉलर और मिस्र पर 9.38 अरब डॉलर का बकाया है। इसके उलट भारत ने 1991 के भुगतान संतुलन संकट के बाद से IMF से एक भी कर्ज नहीं लिया है।
श्रीलंका ने यह वापसी आखिर कैसे की
श्रीलंका भले ही अपर मिडिल इनकम वर्ग में लौट आया हो, लेकिन असली चुनौती अब वहां टिके रहने की है, क्योंकि देश इस श्रेणी की सीमा रेखा पर बहुत मुश्किल से खड़ा है। विश्व बैंक की 2026 रिपोर्ट के मुताबिक श्रीलंका की अर्थव्यवस्था 2025 में 5% की दर से बढ़ी, जिसकी वजह से उसकी प्रति व्यक्ति औसत आय विश्व बैंक की तय सीमा से ऊपर निकल गई और वह इस श्रेणी में वापस आ गया। इसी दौर में वियतनाम और फिलीपींस भी अपर मिडिल इनकम वर्ग में पहुंचे हैं। दिलचस्प बात यह है कि श्रीलंका 2019 में भी इस श्रेणी में शामिल हो चुका था, लेकिन ईस्टर संडे हमलों, कोविड-19 महामारी और 2022 के कर्ज संकट ने मिलकर उसकी अर्थव्यवस्था को दशकों की सबसे बड़ी गिरावट में धकेल दिया, जिसके बाद वह इस श्रेणी से बाहर हो गया था। नीलांजन घोष कहते हैं कि श्रीलंका की सर्विस सेक्टर, पर्यटन उद्योग, विदेशों में काम कर रहे लोगों की तरफ से भेजा गया पैसा यानी रेमिटेंस, और देश की अपेक्षाकृत छोटी आबादी ने उसकी प्रति व्यक्ति GNI को ऊपर उठाने में मदद की है। हालांकि वे यह भी साफ करते हैं कि विश्व बैंक की यह श्रेणी सिर्फ औसत आय के स्तर को दिखाती है, इसका यह मतलब कतई नहीं है कि श्रीलंका अपने हाल के कर्ज संकट या व्यापक आर्थिक मुश्किलों से पूरी तरह उबर चुका है। खुद विश्व बैंक भी इसे रिकवरी की कहानी बताता है, लेकिन साथ ही यह भी कहता है कि श्रीलंका ने यह सीमा रेखा बहुत ही मामूली अंतर से पार की है।
भारत अब भी लोअर मिडिल इनकम वर्ग में क्यों अटका है
भारत 2007 से लगातार लोअर मिडिल इनकम यानी निचले मध्यम आय वर्ग में बना हुआ है, भले ही इन वर्षों में उसकी प्रति व्यक्ति आय लगातार बढ़ती रही हो। दिक्कत यह है कि अगली श्रेणी में जाने के लिए तय सीमा भी लगातार ऊपर खिसकती रही है, और भारत की बढ़ती आबादी का मतलब यह है कि अर्थव्यवस्था में हुआ हर फायदा कहीं ज्यादा लोगों में बंट जाता है। इसे दो परिवारों के उदाहरण से समझा जा सकता है। एक परिवार सालाना 10 लाख रुपये कमाता है और उसमें 10 सदस्य हैं, यानी प्रति व्यक्ति आय 1 लाख रुपये हुई। दूसरा परिवार सिर्फ 8 लाख रुपये कमाता है लेकिन उसमें केवल 4 सदस्य हैं, यानी प्रति व्यक्ति आय 2 लाख रुपये बैठती है। भले ही पहला परिवार कुल मिलाकर ज्यादा कमा रहा हो, लेकिन प्रति व्यक्ति औसत के हिसाब से दूसरा परिवार कहीं बेहतर स्थिति में है। भारत के साथ ठीक यही हो रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जाती है, लेकिन विश्व बैंक देशों को उनकी अर्थव्यवस्था के आकार से नहीं, बल्कि प्रति व्यक्ति आय से आंकता है। चूंकि भारत की आय 1.4 अरब लोगों के बीच बंटती है, इसलिए उसकी प्रति व्यक्ति GNI अभी भी करीब 2,500 से 2,700 डॉलर के आसपास ही टिकी है, जो उसे लोअर मिडिल इनकम वर्ग में ही रोके रखती है।
भारत को हाई इनकम इकॉनमी बनने के लिए क्या करना होगा
यह मुकाम सिर्फ तेज ग्रोथ से हासिल नहीं होने वाला। इसे साइकिल से कार में अपग्रेड होने जैसा समझा जा सकता है। पैडल जोर से मारने से रफ्तार जरूर बढ़ती है, लेकिन बहुत लंबी दूरी तय करने के लिए एक बेहतर वाहन भी चाहिए होता है। भारत के लिए वह बेहतर वाहन बड़े सुधार यानी रिफॉर्म्स हैं, ना कि सिर्फ तेज ग्रोथ। विश्व बैंक के मुताबिक भारत को 2047 तक लोअर मिडिल इनकम से हाई इनकम इकॉनमी बनने के लिए हर साल औसतन करीब 7.8% की दर से बढ़ना होगा। लेकिन इतनी तेज ग्रोथ हासिल करने के साथ साथ भारत को मिडिल इनकम ट्रैप से बचने के लिए गहरे ढांचागत सुधार भी करने होंगे। अपने इंडिया कंट्री इकोनॉमिक मेमोरेंडम 2024 में विश्व बैंक कहता है कि भारत को ज्यादा उत्पादक नौकरियां बनानी होंगी, ज्यादा निवेश आकर्षित करना होगा, वर्कफोर्स में महिलाओं की भागीदारी बढ़ानी होगी, और शिक्षा तथा स्किल्स में ज्यादा निवेश करना होगा। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भारत में अब भी 45% से ज्यादा लोग खेती पर निर्भर हैं, जहां प्रोडक्टिविटी अपेक्षाकृत कम है। रिपोर्ट कहती है कि इनमें से ज्यादा लोगों को मैन्युफैक्चरिंग और हाई वैल्यू सर्विसेज की तरफ जाना होगा, जहां आमदनी कहीं ज्यादा होती है। नीलांजन घोष इसे यूं समेटते हैं कि भारत को अपर मिडिल इनकम की सीमा पार करने के लिए लगातार ग्रोथ के साथ साथ तेज रोजगार सृजन, बेहतर श्रम उत्पादकता, ह्यूमन कैपिटल निर्माण, शहरीकरण और ढांचागत बदलाव सबकी जरूरत है। उनके मुताबिक यह फर्क समझना बहुत जरूरी है, क्योंकि बड़ी अर्थव्यवस्था बनना और ज्यादा प्रति व्यक्ति आय वाली अर्थव्यवस्था बनना, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं।











