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पुणे के किले पर हुई मौत में पुलिस का दावा, आरोपियों ने क्राइम पेट्रोल देखकर रची बचने की चालपड़ताल
6 जुल॰ 2026, 7:12 am (46 दिन पहले)· 4

पुणे के किले पर हुई मौत में पुलिस का दावा, आरोपियों ने क्राइम पेट्रोल देखकर रची बचने की चाल

पुणे के लोहागढ़ किले पर हुई केतन अग्रवाल की मौत के मामले में पुलिस का दावा है कि मुख्य आरोपी सिया गोयल और चेतन चौधरी ने वारदात से पहले क्राइम पेट्रोल के एपिसोड देखे थे ताकि वे पुलिस जांच से बच सकें, जिससे क्राइम शो के असर पर बहस फिर छिड़ गई है।

पुणे के पास एक किले पर हुई मौत, जिसे पुलिस ने शुरुआत में हादसा मानकर फाइल बंद कर दी थी, अब एक नई बहस खड़ी कर रही है। जांच अधिकारियों का दावा है कि केतन अग्रवाल की मौत के आरोपियों ने वारदात से पहले क्राइम पेट्रोल के कई एपिसोड देखे थे, ताकि यह समझ सकें कि पुलिस जांच किस तरह आगे बढ़ती है और सबूतों से कैसे बचा जा सकता है। इस दावे ने एक पुराने सवाल को फिर हवा दे दी है, क्या अपराध पर बनने वाले टीवी शो, जो लोगों को सतर्क करने के मकसद से बनाए जाते हैं, कहीं अपराधियों के लिए ट्रेनिंग मैनुअल तो नहीं बन रहे।

केतन अग्रवाल केस में अब तक क्या हुआ

26 साल के केतन अग्रवाल की मौत 18 जून को पुणे के लोहागढ़ किले पर हुई थी। वे अपनी मंगेतर सिया के साथ किला घूमने गए थे और एक खाई में गिरने से उनकी जान चली गई। शुरुआत में इसे हादसा मानकर मामला दर्ज किया गया, लेकिन कुछ दिनों बाद जांच का रुख पूरी तरह बदल गया। पुलिस ने 20 साल की सिया गोयल और उनके 22 साल के दोस्त चेतन चौधरी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस का आरोप है कि दोनों के बीच रिश्ता था और दोनों ने मिलकर साजिश रचकर केतन अग्रवाल को किले से धक्का देकर मार डाला। अब जांच अधिकारियों का कहना है कि इस मामले के मुख्य आरोपी सिया गोयल और चेतन चौधरी ने वारदात से पहले क्राइम पेट्रोल के एपिसोड सिर्फ इसलिए देखे थे ताकि वे समझ सकें कि पुलिस जांच कैसे होती है और वे खुद को कैसे बचा सकते हैं।

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ऐसे मामले पहले भी सामने आ चुके हैं

भारत में पुलिस के लिए क्राइम शो या क्राइम थ्रिलर का ज़िक्र किसी हत्या की साजिश समझाते वक्त करना नया नहीं है। 2025 में राजस्थान के जांच अधिकारियों ने दावा किया था कि एक शख्स ने पुलिस को चकमा देने के लिए बॉलीवुड फिल्म दृश्यम की तर्ज पर हत्या को अंजाम दिया। जांच अधिकारियों के मुताबिक, आरोपी रमेश लोहार ने 70 साल की चंदी बाई के गहने लूटने के लिए उनकी हत्या की, फिर शव जला दिया और अवशेष एक झील में फेंक दिए, यह सोचकर कि अगर शव कभी बरामद ही न हो तो वह पकड़ में नहीं आएगा। जब पुलिस ने उसका डिजिटल रिकॉर्ड खंगाला तो उसमें दृश्यम और क्राइम शो से जुड़ी गूगल सर्च के साथ साथ 'शव को सड़ने में कितना वक्त लगता है' और 'पुलिस मोबाइल ट्रैकिंग से अपराधियों को कैसे पकड़ती है' जैसे सवाल भी मिले।

मार्च 2025 में उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में एक 62 साल के व्यक्ति का अधजला शव मिलने के बाद पुलिस ने एक शख्स और उसके दोस्त को गिरफ्तार किया था। जांच अधिकारियों के मुताबिक, मुख्य आरोपी रामजी तिवारी ने कबूल किया कि उसने कानपुर स्थित अपने घर में अपने पिता की हत्या की थी। पुलिस का आरोप है कि इसके बाद उसने और उसके साथी ने शव को गाड़ी से औरैया पहुंचाया, वहां सबूत मिटाने के लिए सड़क किनारे एक नहर के पास शव पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी। पुलिस ने बाद में बताया कि आरोपी ने शव ठिकाने लगाने की यह पूरी योजना बॉलीवुड फिल्म दृश्यम और क्राइम शो क्राइम पेट्रोल देखने के बाद बनाई थी। जांच अधिकारियों के अनुसार दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

2025 में ही हैदराबाद पुलिस ने 14 साल के एक लड़के को 10 साल की एक बच्ची की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया था। बच्ची ने उसे अपने घर से क्रिकेट बैट चुराते हुए पकड़ लिया था। जांच अधिकारियों के मुताबिक, आरोपी किशोर उसी इलाके में रहता था और बच्ची के छोटे भाई का क्रिकेट बैट चुराने के लिए छत के रास्ते घर में घुसा था। पुलिस का आरोप है कि जब बच्ची ने उसे पकड़ लिया और शोर मचाया, तो उसने चाकू से वार कर उसकी हत्या कर दी। जांच के दौरान पुलिस ने बताया कि किशोर ने खुद कबूल किया कि उसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर क्राइम थ्रिलर और रियलिटी क्राइम शो देखना पसंद है। एक असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस (एसीपी) ने भी मीडिया को बताया कि वह लड़का नियमित रूप से टीवी पर सीआईडी और दूसरे क्राइम शो देखता था।

क्राइम शो अपराधियों की ट्रेनिंग गाइड कैसे बन जाते हैं

ब्रिटेन की मनोचिकित्सक प्रोफेसर सारा निब्लॉक, जो यूके काउंसिल फॉर साइकोथेरेपी की सीईओ हैं, कहती हैं कि लोगों का ट्रू क्राइम कहानियों की तरफ आकर्षण दरअसल एक 'वाइकेरियस थ्रिल' यानी परोक्ष रोमांच से आता है, यानी किसी और की कहानी के जरिए खतरे और टकराव का अनुभव लेना, वह भी बिना खुद कोई जोखिम उठाए। शोधकर्ताओं का कहना है कि यही खिंचाव है जो भारत में क्राइम आधारित शो को सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले कार्यक्रमों में शामिल रखता है, भले ही इससे यह सवाल भी उठता रहे कि दर्शक मनोरंजन के साथ साथ इनसे क्या सीख रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 1995 के अपने चर्चित एयरवेव्स फैसले में, जो सचिव, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय बनाम क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल, (1995) 2 एससीसी 161 मामले में सुनाया गया था, कहा था कि टेलीविज़न का असर बाकी माध्यमों से कहीं ज़्यादा गहरा होता है, क्योंकि यह सीधे लोगों के घरों में पहुंचता है और आवाज़ तथा तस्वीरों को मिलाकर लोगों की सोच, मूल्यों और व्यवहार को गढ़ता है।

पंजाब स्थित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ लॉ में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. गीता और दिशांत सिंह के एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि क्राइम आधारित टीवी शो लोगों की सोच और व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं, भले ही इन्हें जागरूकता फैलाने और सार्वजनिक सुरक्षा को बढ़ावा देने के मकसद से बनाया जाता है। सीआईडी, क्राइम पेट्रोल, सावधान इंडिया, डायल 100, गुमराह, अदालत और व्योमकेश बख्शी जैसे लोकप्रिय शो लगातार सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले क्राइम सीरीज़ में गिने जाते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इन शो को बार बार देखने से दर्शक अजनबियों, पड़ोसियों और यहां तक कि रिश्तेदारों को लेकर भी शक करने लगते हैं, जिससे आम और बेहद मामूली स्थितियां भी चोरी, हमले और दूसरे अपराधों के डर को जन्म देने लगती हैं।

क्या बच्चे और किशोर ज़्यादा प्रभावित होते हैं

इसकी संभावना काफी हद तक है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (एएपी) का कहना है कि बच्चे और किशोर हिंसक कंटेंट के असर के प्रति बड़ों के मुकाबले कहीं ज़्यादा संवेदनशील होते हैं। एएपी के मुताबिक, आठ साल से छोटे बच्चे अक्सर कल्पना और हकीकत में फर्क नहीं कर पाते, जिससे उनके स्क्रीन पर देखी गई हरकतों की नकल करने की आशंका बढ़ जाती है। संस्था यह भी कहती है कि हिंसक कंटेंट का बार बार सामना बच्चों को दुनिया को असल से कहीं ज़्यादा खतरनाक मानने पर मजबूर कर सकता है।

इसके बावजूद एएपी यह नतीजा नहीं निकालती कि सिर्फ हिंसक कंटेंट ही गंभीर अपराध की वजह बनता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि आपराधिक व्यवहार एक साथ कई वजहों से बनता है, जिनमें पारिवारिक माहौल, दोस्तों का असर, बचपन का सदमा, मानसिक सेहत, गरीबी, नशे की लत और आवेग में लिया गया फैसला शामिल हैं। इस लिहाज से क्राइम शो शायद यह असर डाल सकते हैं कि अपराध को किस तरीके से अंजाम दिया जाए, लेकिन यह शायद ही बता पाते हैं कि आखिर अपराध किया ही क्यों जाए।

स्क्रीन पर दिखाई गई सज़ा भी नकल करने वालों को क्यों नहीं रोक पाती

इन मामलों में बार बार उठने वाला एक सवाल यह है कि क्राइम शो में दिखाई गई सज़ा, जिसमें लगभग हमेशा अपराधी पकड़ा जाता है और उसे सज़ा भी मिलती है, फिर भी उन लोगों को क्यों नहीं रोक पाती जो बाद में वैसा ही अपराध दोहराते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक इसकी एक वजह यह है कि कुछ अपराधी सज़ा या नतीजे से कहीं ज़्यादा ध्यान अपराध को अंजाम देने के तरीके पर देते हैं। कुछ मामलों में सनसनीखेज क्राइम कहानियों को बार बार देखना हिंसा को सामान्य बना देता है या फिर उन लोगों को अपराध करने का तरीका ही सुझा देता है, खासकर उन लोगों को जो पहले से ही ऐसा करने की मंशा रखते थे।

सवाल-जवाब

केतन अग्रवाल की मौत कैसे हुई थी?
26 साल के केतन अग्रवाल 18 जून को पुणे के लोहागढ़ किले पर अपनी मंगेतर सिया के साथ घूमने गए थे, तभी वे एक खाई में गिर गए और उनकी मौत हो गई।
पुलिस ने इस मामले में किसे गिरफ्तार किया है?
पुलिस ने 20 साल की सिया गोयल और 22 साल के चेतन चौधरी को गिरफ्तार किया है, दोनों पर साजिश रचकर केतन अग्रवाल को किले से धक्का देकर मारने का आरोप है।
आरोपियों का क्राइम पेट्रोल से क्या संबंध बताया जा रहा है?
जांच अधिकारियों का दावा है कि आरोपियों ने वारदात से पहले क्राइम पेट्रोल के एपिसोड देखे थे ताकि वे समझ सकें कि पुलिस जांच कैसे काम करती है और वे कैसे बच सकते हैं।
क्या क्राइम शो से प्रभावित होकर अपराध करने के और मामले सामने आए हैं?
हां, राजस्थान में दृश्यम फिल्म से प्रेरित हत्या, उत्तर प्रदेश के औरैया में शव जलाने का मामला और हैदराबाद में एक किशोर द्वारा हत्या के मामलों में भी क्राइम शो और क्राइम थ्रिलर देखने का जिक्र आया है।
क्या विशेषज्ञ मानते हैं कि क्राइम शो अकेले अपराध की वजह बनते हैं?
नहीं, अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स सहित शोधकर्ता कहते हैं कि अपराध पारिवारिक माहौल, मानसिक सेहत, गरीबी और नशे जैसी कई वजहों से होता है, क्राइम शो सिर्फ तरीका सुझा सकते हैं, वजह नहीं बताते।
क्या बच्चे क्राइम शो से ज़्यादा प्रभावित होते हैं?
एएपी के मुताबिक आठ साल से छोटे बच्चे कल्पना और हकीकत में फर्क नहीं कर पाते, इसलिए वे स्क्रीन पर देखी गई हरकतों की नकल करने के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होते हैं।
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