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विदेश पढ़ने जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या क्यों घट रही है, दो साल में 31% की गिरावट की पूरी वजहपड़ताल
2 घंटे पहले· 3

विदेश पढ़ने जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या क्यों घट रही है, दो साल में 31% की गिरावट की पूरी वजह

साल 2023 में 9.08 लाख भारतीय उच्च शिक्षा के लिए विदेश गए थे, लेकिन 2025 में यह आंकड़ा घटकर 6.26 लाख रह गया। महंगी फीस, सख्त वीजा नियम और कमजोर होते रुपये ने विदेश में पढ़ाई के सपने को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है।

रविकाश गुप्तारविकाश गुप्तावरिष्ठ संवाददाता 5 मिनट पढ़ें AI के लिए
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विदेश जाकर पढ़ाई करने का सपना अब पहले जैसा आकर्षक नहीं रह गया है, और इसका सबूत सरकारी आंकड़ों में साफ दिखता है। संसद में केंद्र सरकार की ओर से साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, साल 2023 में जहां 9.08 लाख से ज्यादा भारतीय उच्च शिक्षा के लिए विदेश गए थे, वहीं 2024 में यह संख्या गिरकर 7.7 लाख पर आ गई और 2025 में और लुढ़ककर सिर्फ 6.26 लाख रह गई। यानी महज दो साल के भीतर 31% से ज्यादा की भारी गिरावट। अब सवाल यह है कि क्या वाकई विदेशी डिग्री का आकर्षण खत्म हो रहा है, या फिर छात्र अलग देश और अलग रास्ते चुन रहे हैं।

छात्र अब विदेश जाने से क्यों कतरा रहे हैं

इसकी सबसे बड़ी वजह कई देशों की बदली हुई नीतियां हैं। कई मुल्कों ने स्टूडेंट वीजा के नियम कड़े कर दिए हैं, पढ़ाई के बाद काम करने का रास्ता अनिश्चित बना दिया है और छात्रों की आर्थिक जांच-पड़ताल पहले से ज्यादा सख्त कर दी है। दूसरी तरफ ट्यूशन फीस, किराया और रोजमर्रा के खर्च तेजी से बढ़े हैं, जिसने विदेशी पढ़ाई को कहीं ज्यादा महंगा बना दिया है।

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एचएसबीसी के एक हालिया सर्वे में सामने आया कि अब कई भारतीय परिवार सबसे ज्यादा ध्यान इस बात पर देते हैं कि खर्च किए गए पैसे का रिटर्न कितना मिलेगा, यानी क्या विदेशी डिग्री सचमुच किसी अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी तक ले जाएगी। एजुकेशन कंसल्टेंट विजय कुमार चौधरी ने लिंक्डइन पर लिखा, ‘परिवार पीछे नहीं हट रहे। वे हिसाब लगा रहे हैं।’ बढ़ती लागत और घटती निश्चितता के इसी मेल ने कई छात्रों को अपनी योजनाओं पर दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है।

क्या छात्र अब भारत के कॉलेज चुन रहे हैं

बहुत सारे छात्रों के लिए इसका जवाब हां है, पर हमेशा नहीं। कुछ छात्र इसलिए यहीं रुक रहे हैं क्योंकि उन्हें अब भारत में ही बेहतर मौके नजर आ रहे हैं, जबकि कुछ के लिए विदेश जाने का खर्च जायज ठहराना ही मुश्किल हो गया है।

बीते कुछ सालों में कई भारतीय संस्थान वैश्विक रैंकिंग में ऊपर चढ़े हैं। ताजा QS वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027 में दुनिया के टॉप 500 संस्थानों में 12 भारतीय विश्वविद्यालयों ने जगह बनाई, जो देश का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है। साथ ही निजी विश्वविद्यालयों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस और बिजनेस जैसे क्षेत्रों में कोर्स बढ़ाए हैं। छात्रों के सामने अब कई रास्ते खुले हैं।

  • GATE, CAT और UPSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी।
  • ग्रेजुएशन के बाद भारतीय स्टार्टअप या बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी।
  • नौकरी करते हुए ऑनलाइन डिग्री या प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन हासिल करना।

शिक्षा विशेषज्ञ कहते हैं कि अब छात्र सिर्फ यह नहीं पूछते कि ‘मैं कहां पढ़ सकता हूं’, बल्कि तेजी से यह पूछने लगे हैं कि ‘क्या यह डिग्री उतने पैसे के लायक होगी, जितने मैं खर्च कर रहा हूं’।

क्या विदेश में नौकरी करना भी अब कम आकर्षक हुआ

बहुत से भारतीय आज भी विदेश में करियर बनाना चाहते हैं, लेकिन यह रास्ता पहले से मुश्किल हो गया है। पहले विदेशी डिग्री अक्सर पढ़ाई के बाद वर्क वीजा और फिर पूरी नौकरी तक पहुंचा देती थी। अब कई देशों ने इमिग्रेशन नियम कड़े कर दिए हैं, जिससे यह बदलाव कम भरोसेमंद हो गया है। नतीजा यह है कि कुछ छात्र विदेश में नौकरी के लिए आवेदन करने से पहले पहले भारत में काम का अनुभव जुटाना चुन रहे हैं। इसके बावजूद हुनरमंद भारतीय एम्प्लॉयमेंट वीजा के जरिए विदेश जाना जारी रखे हुए हैं, खासकर कई खास क्षेत्रों में।

कमजोर रुपये ने पढ़ाई कैसे महंगी कर दी

विदेश की ज्यादातर यूनिवर्सिटी अपनी फीस अपनी ही मुद्रा में वसूलती हैं। इसलिए जब रुपया अमेरिकी डॉलर, ब्रिटिश पाउंड या दूसरी विदेशी मुद्राओं के मुकाबले कमजोर होता है, तो भारतीय परिवारों को ज्यादा खर्च करना पड़ता है, भले ही यूनिवर्सिटी अपनी फीस न बढ़ाए। इसका असर सिर्फ ट्यूशन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि रहने-खाने से लेकर बाकी हर खर्च पर पड़ता है।

मिसाल के तौर पर, अगर किसी कोर्स की लागत 50,000 अमेरिकी डॉलर है, तो डॉलर के मुकाबले रुपये में हर एक रुपये की गिरावट कुल बिल में करीब 50,000 रुपये जोड़ देती है। इसी तरह की बढ़ोतरी हर महीने चुकाए जाने वाले रहने-सहने के खर्च पर भी असर डालती है।

क्या दाखिला मिलने के बाद भी छात्र योजना छोड़ देते हैं

एडमिशन लेटर मिल जाना तो बस एक कदम है। छात्रों को इसके बाद पैसों का इंतजाम करना होता है, वीजा हासिल करना होता है और यह भरोसा भी होना चाहिए कि यह निवेश आगे चलकर फायदा देगा। कुछ छात्र अब अपना दाखिला एक साल के लिए टाल देते हैं, किसी दूसरे देश का रुख कर लेते हैं, या फिर पूरी तरह पीछे हट जाते हैं, अगर रवाना होने से पहले अचानक खर्च बढ़ जाए या वीजा नियम बदल जाएं। ट्यूशन या रहने के खर्च में अचानक हुई बढ़ोतरी अक्सर इसकी बड़ी वजह बनती है।

विदेशी यूनिवर्सिटी भारत में कैंपस क्यों खोल रही हैं

कुछ समय पहले तक भारतीय छात्रों को विदेशी यूनिवर्सिटी की डिग्री पाने के लिए विदेश जाना ही पड़ता था। लेकिन अब कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वही शिक्षा भारत में ही ला रहे हैं। यह बदलाव यूजीसी के 2023 के नियमों के बाद आया, जो पात्र विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में अपने कैंपस खोलने की इजाजत देते हैं।

तब से कई संस्थानों ने गिफ्ट सिटी और नवी मुंबई जैसी जगहों पर कैंपस खोलने का ऐलान किया है या कोर्स शुरू कर दिए हैं। डीकिन यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ वुलोंगोंग, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन, यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल और इलिनॉय इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी जैसे संस्थानों ने भारत में कैंपस की घोषणा की है या शुरुआत कर दी है। इन यूनिवर्सिटी के लिए भारत दुनिया के सबसे बड़े उच्च शिक्षा बाजारों में से एक है। इनमें से कई को अपने देश में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के दाखिले में धीमी रफ्तार का सामना करना पड़ रहा है, जिससे भारत उनके लिए विस्तार की एक आकर्षक जगह बन गया है।

इसका आप पर असर

  • छात्रों और परिवारों के लिए: विदेश में पढ़ाई अब पहले से महंगी और कम भरोसेमंद हो गई है, इसलिए दाखिले से पहले फीस, वीजा नियम और नौकरी की संभावना का हिसाब लगाना जरूरी हो गया है।
  • भारत में पढ़ने वालों के लिए: टॉप 500 में 12 भारतीय यूनिवर्सिटी और गिफ्ट सिटी व नवी मुंबई में खुल रहे विदेशी कैंपस से देश में ही अच्छी डिग्री के मौके बढ़ रहे हैं।

सवाल-जवाब

2023 से 2025 के बीच विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या कितनी घटी?
साल 2023 में 9.08 लाख से ज्यादा छात्र विदेश गए थे, जो 2024 में 7.7 लाख और 2025 में 6.26 लाख रह गए, यानी दो साल में 31% से ज्यादा की गिरावट।
यह गिरावट के आंकड़े कहां से आए हैं?
ये आंकड़े केंद्र सरकार ने संसद में साझा किए हैं।
छात्रों के विदेश न जाने की मुख्य वजहें क्या हैं?
सख्त स्टूडेंट वीजा नियम, अनिश्चित वर्क पाथवे, बढ़ती फीस और खर्च, और कमजोर होता रुपया इसकी बड़ी वजहें हैं।
QS वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027 में कितनी भारतीय यूनिवर्सिटी टॉप 500 में हैं?
इस रैंकिंग में 12 भारतीय विश्वविद्यालयों ने दुनिया के टॉप 500 में जगह बनाई, जो देश का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है।
रुपये की गिरावट का असर फीस पर कैसे पड़ता है?
अगर किसी कोर्स की लागत 50,000 अमेरिकी डॉलर है, तो डॉलर के मुकाबले हर एक रुपये की गिरावट कुल बिल में करीब 50,000 रुपये जोड़ देती है।
कौन-कौन सी विदेशी यूनिवर्सिटी भारत में कैंपस खोल रही हैं?
डीकिन यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ वुलोंगोंग, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन, यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल और इलिनॉय इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने भारत में कैंपस की घोषणा की है या शुरुआत कर दी है।
विदेशी यूनिवर्सिटी को भारत में कैंपस खोलने की इजाजत कैसे मिली?
यूजीसी के 2023 के नियमों के तहत पात्र विदेशी विश्वविद्यालय अब भारत में अपने कैंपस स्थापित कर सकते हैं।
रविकाश गुप्ता
लेखक के बारे मेंरविकाश गुप्तावरिष्ठ संवाददाता लखनऊ
विशेषज्ञताभारत समाचार, वैश्विक बिज़नेस, वित्तीय बाज़ार, क्रिप्टोकरेंसी, ब्लॉकचेन, शेयर बाज़ार विश्लेषण, कॉर्पोरेट न्यूज़, स्टार्टअप, आर्थिक रुझान, डिजिटल एसेट्स, निवेश अंतर्दृष्टि

रविकाश गुप्ता एक वरिष्ठ संवाददाता एवं संपादक हैं जो भारत की ख़बरों, वैश्विक बिज़नेस, वित्तीय बाज़ार और क्रिप्टोकरेंसी को कवर करते हैं। वे आर्थिक रुझानों, क्रिप्टो घटनाक्रमों और दुनियाभर की बड़ी बाज़ार-हलचल वाली घटनाओं पर रिपोर्ट करते हैं।

रविकाश गुप्ता एक वरिष्ठ संवाददाता एवं संपादक हैं जो भारत-केंद्रित रिपोर्टिंग और बिज़नेस, वित्तीय बाज़ार व क्रिप्टोकरेंसी की वैश्विक कवरेज में विशेषज्ञता रखते हैं। वे ब्रेकिंग न्यूज़, आर्थिक घटनाक्रम, कॉर्पोरेट मामले, शेयर बाज़ार, ब्लॉकचेन नवाचार और आधुनिक वित्तीय तंत्र को आकार देने वाले डिजिटल एसेट रुझान कवर करते हैं। स्पष्टता, विश्लेषण और समय पर रिपोर्टिंग पर मज़बूत ज़ोर के साथ रविकाश वैश्विक आर्थिक बदलावों, उभरती तकनीकों, स्टार्टअप इकोसिस्टम और बदलते क्रिप्टो परिदृश्य की अंतर्दृष्टि देते हैं। उनका काम व्यापक आर्थिक रुझानों को वास्तविक बाज़ार असर से जोड़ता है और पाठकों को पारंपरिक वित्त व डिजिटल एसेट्स की तेज़ी से बदलती दुनिया — दोनों समझने में मदद करता है।

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