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ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारतीय हिंदू-सिख प्रतिनिधिमंडल भेजने के पीछे की कूटनीतिपड़ताल
9 जुल॰ 2026, 6:23 am (45 दिन पहले)· 2

ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारतीय हिंदू-सिख प्रतिनिधिमंडल भेजने के पीछे की कूटनीति

4 जुलाई को तेहरान में अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारत ने एक आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल के साथ हिंदू और सिख धर्मगुरुओं को भेजा था। इस बहुधर्मी प्रतिनिधित्व के जरिए भारत ने अपनी विविधता और स्वतंत्र विदेश नीति का संदेश दिया है।

4 जुलाई को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए भारत ने एक आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल तेहरान भेजा। इस दल में विदेश राज्य मंत्री पवित्र मार्गेरिटा के साथ-साथ पंडित विजय कुमार शर्मा और स्वामी सारंग मोहिली जैसे धार्मिक नेता भी शामिल थे। इस अनूठे प्रतिनिधिमंडल के चयन और इसके माध्यम से दिए गए कूटनीतिक संदेश ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है।

गैर-मुस्लिम प्रतिनिधियों का संदेश

अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में हिंदू और सिख धार्मिक हस्तियों की उपस्थिति भारत की एक बहुलवादी समाज के रूप में पहचान को दर्शाती है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार श्रीश कुमार पाठक के अनुसार, यह निर्णय यह स्पष्ट करने के लिए था कि भारत और ईरान के संबंध धर्म पर नहीं, बल्कि सभ्यतागत और कूटनीतिक आधार पर टिके हैं। इस कदम ने देश के भीतर सांप्रदायिक व्याख्याओं की गुंजाइश को भी कम करने का काम किया।

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इस आयोजन के दौरान पंडित विजय कुमार शर्मा के बयान सोशल मीडिया पर काफी चर्चित हुए। उन्होंने मानवीय मूल्यों पर जोर देते हुए कहा, मैं ईरान को धन्यवाद देता हूं क्योंकि वर्षों से दुनिया यह इंतजार कर रही थी कि कोई तो हो जो अमेरिका को उसकी जगह दिखाए। ईरान ने अमेरिका को घुटनों पर ला दिया। हुसैनियत का अर्थ है शोषितों के साथ खड़ा होना और अयातुल्ला खामेनेई हमेशा शोषितों और गरीबों के लिए खड़े रहे। इसी तरह, स्वामी सारंग मोहिली ने प्रस्थान से पूर्व अपनी यात्रा को एक व्यक्तिगत सम्मान के बजाय वसुधैव कुटुंबकम की भारतीय सनातन परंपरा का हिस्सा बताया।

प्रतिनिधियों के चयन का आधार

पंडित विजय कुमार शर्मा और स्वामी सारंग मोहिली का चयन अचानक नहीं था। दोनों नेताओं के ईरान के साथ अंतरधार्मिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के पुराने संबंध रहे हैं, जिससे वे इस तरह की कूटनीतिक यात्रा के लिए स्वाभाविक विकल्प थे। हालांकि, भारत या ईरान की सरकारों ने आधिकारिक तौर पर इस चयन का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारत के उस व्यापक दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता है जो महज प्रतीकों से ऊपर उठकर सभ्यतागत मूल्यों पर केंद्रित है।

भारत के कूटनीतिक समीकरण

भारत द्वारा एक विविध प्रतिनिधिमंडल भेजने के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण माने जा रहे हैं। पहला, केवल एक समुदाय के प्रतिनिधित्व से यह निर्णय घरेलू राजनीति का मुद्दा बन सकता था, जिसे एक व्यापक दल भेजकर टाल दिया गया। दूसरा, यह भारत को ईरान, इज़राइल, अमेरिका और खाड़ी देशों के बीच एक नाजुक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। तीसरा, एक बहुधर्मी दल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक स्वीकार्य माना जाता है।

इस संदर्भ में, अमेरिका की ओर से भारत की भागीदारी पर कोई आधिकारिक आलोचना नहीं की गई है और वाशिंगटन ने इस पर सार्वजनिक रूप से चुप्पी साधे रखी है। हालांकि, यह अंतिम संस्कार कूटनीतिक दृष्टि से काफी संवेदनशील रहा। ईरान की तस्नीम समाचार एजेंसी की खबरों के अनुसार, अमेरिका ने कई देशों से भागीदारी कम करने या न जाने का आग्रह किया था, जिसके चलते कम से कम 13 देशों ने या तो अपना प्रतिनिधित्व स्तर घटा दिया या वे शामिल नहीं हुए। भारत ने अपनी नीति पर अडिग रहते हुए आधिकारिक दल भेजकर अपनी स्वतंत्रता का प्रदर्शन किया है।

इज़राइल और ईरान के साथ भारत के हित

इस पूरी प्रक्रिया पर इज़राइल की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि भारत और इज़राइल के बीच पिछले एक दशक में रक्षा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में गहरे संबंध बने हैं, लेकिन भारत ईरान के साथ भी कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर बातचीत जारी रखे हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच संबंधों की गहराई के कारण यह कार्यक्रम रिश्तों में खटास नहीं लाएगा। भारत के लिए चाबहार पोर्ट जैसी परियोजनाएं महत्वपूर्ण हैं, जो पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुंच प्रदान करती हैं। ईरान भारत के लिए एक महत्वपूर्ण ऊर्जा भागीदार भी रहा है, जिसे नजरअंदाज करना भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के लिए कठिन है।

ईरान के साथ भारत के सहयोग का इतिहास

ईरान के साथ भारत का रिश्ता केवल आज का नहीं है। कोरोना महामारी के कठिन समय में भी दोनों देशों ने अपने नागरिकों की वापसी के लिए साथ मिलकर काम किया था। अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के बाद, नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास ने भारत सरकार और यहां के नागरिकों का आभार व्यक्त किया। तमाम राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, दोनों देश अपने राजनयिक चैनलों को खुला रखने और पारस्परिक हितों के मामलों पर सहयोग करने की प्रतिबद्धता दर्शाते रहे हैं।

सवाल-जवाब

भारत ने अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में प्रतिनिधिमंडल क्यों भेजा?
भारत ने अपने रणनीतिक हितों, विशेषकर चाबहार पोर्ट और ऊर्जा सुरक्षा के लिए ईरान के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए रखने के लिए यह प्रतिनिधिमंडल भेजा था।
प्रतिनिधिमंडल में कौन-कौन शामिल था?
प्रतिनिधिमंडल में विदेश राज्य मंत्री पवित्र मार्गेरिटा के साथ-साथ हिंदू और सिख धार्मिक नेता पंडित विजय कुमार शर्मा और स्वामी सारंग मोहिली शामिल थे।
क्या अमेरिका ने भारत की भागीदारी पर कोई प्रतिक्रिया दी?
नहीं, वाशिंगटन ने भारत के इस निर्णय पर कोई आधिकारिक आलोचना या टिप्पणी नहीं की है।
क्या इस यात्रा का भारत-इज़राइल संबंधों पर कोई असर पड़ेगा?
अभी तक इज़राइल की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई है और भारत-इज़राइल दोनों ही पक्ष इस घटना को अपने द्विपक्षीय संबंधों से अलग रखने का प्रयास कर रहे हैं।
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