हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के साणंद में सीजी सेमी के एक नए ओएसएटी (OSAT) प्लांट का उद्घाटन किया। यह अत्याधुनिक प्लांट सेमीकंडक्टर असेंबली और टेस्टिंग का काम करेगा। इस मौके पर नरेंद्र मोदी ने साणंद को भारत के भविष्य के सेमीकंडक्टर क्लस्टर की आधारशिला बताया और इसकी तुलना अमेरिका के सिलिकॉन वैली, जापान के सिलिकॉन आइलैंड और ताइवान के हिनचू से की।
सेमीकंडक्टर हब क्या है और इसकी भारत को जरूरत क्यों है?
सेमीकंडक्टर असल में वे सूक्ष्म चिप्स हैं जो आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को शक्ति प्रदान करते हैं। ये चिप्स डेटा प्रोसेस करने, बिजली के प्रवाह को नियंत्रित करने और उपकरणों को सुचारू रूप से चलाने का काम करते हैं। स्मार्टफोन्स, इलेक्ट्रिक वाहन (EV), मेडिकल उपकरण, सैटेलाइट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सिस्टम, सबमें इनकी अहम भूमिका होती है। वैश्विक अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से इन्हें रणनीतिक प्राथमिकता दी जा रही है। एक सेमीकंडक्टर हब डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और पैकेजिंग का पूरा इकोसिस्टम प्रदान करता है, जिससे हजारों नौकरियों के अवसर भी पैदा होते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय के अधीन काम कर रहा इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) इस दिशा में सरकार का प्रमुख कार्यक्रम है। यह मिशन चिप फैब्रिकेशन, सेमीकंडक्टर पैकेजिंग और डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के साथ-साथ चिप डिजाइनिंग स्टार्टअप्स को भी 50% तक वित्तीय सहायता प्रदान करता है। नीति आयोग के अनुसार, ये हब आधुनिक तकनीक, टेलीकॉम, रक्षा प्रणाली और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए रीढ़ की हड्डी के समान हैं। जब चिप निर्माता, सप्लायर और शोधकर्ता एक ही जगह पर काम करते हैं, तो लागत कम होती है और नवाचार तेज होता है। हालांकि भारत चिप डिजाइनिंग में पहले से ही अग्रणी है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग के मामले में हमें एक मजबूत इकोसिस्टम की जरूरत है। दुनिया में कोई भी औद्योगिक ताकत केवल एक फैक्ट्री के दम पर खड़ी नहीं हुई है। अमेरिका, ताइवान और जापान जैसे देशों ने क्लस्टर बनाकर ही अपनी औद्योगिक मजबूती हासिल की है।
आज की पीढ़ी के लिए चिप्स क्यों अनिवार्य हैं?
आज की डिजिटल जीवनशैली का हर पहलू सेमीकंडक्टर्स पर निर्भर है। सुबह उठते ही फोन चेक करने से लेकर सोशल मीडिया रील देखने, मैसेज भेजने या ऑनलाइन गेम खेलने तक, हर चीज के पीछे एक सेमीकंडक्टर चिप काम कर रही है। ये चिप्स डेटा प्रोसेस करती हैं, डिवाइस को 5G नेटवर्क से जोड़ती हैं और बैटरी की लाइफ बढ़ाती हैं। सीधे शब्दों में कहें तो चिप्स के बिना AI, 5G या आधुनिक डिजिटल जीवन की कल्पना करना नामुमकिन है।
साणंद और भारत का सेमीकंडक्टर सफर
अमेरिका या ताइवान जैसे देशों को वैश्विक टेक्नोलॉजी हब बनने में दशकों लगे हैं। साणंद अभी इस दिशा में अपने शुरुआती दौर में है और मुख्य रूप से चिप पैकेजिंग और टेस्टिंग पर केंद्रित है। हालांकि, यह भारत का अब तक का सबसे मजबूत सेमीकंडक्टर क्लस्टर बन गया है। साणंद में केवल पांच महीनों के भीतर माइक्रोन, केन्स सेमीकॉन और सीजी सेमी के तीन प्लांट्स ने कमर्शियल उत्पादन शुरू कर दिया है। ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग के लिए पहले से मौजूद बुनियादी ढांचा इसे निवेशकों के लिए एक आकर्षक केंद्र बनाता है।
सेमीकंडक्टर हब की सफलता के मंत्र
दुनिया भर के सफल चिप क्लस्टर्स में कुछ सामान्य विशेषताएं हैं। इनमें प्रमुख फैब्रिकेशन प्लांट या रिसर्च इंस्टीट्यूट का होना, कुशल कार्यबल, मजबूत यूनिवर्सिटी नेटवर्क, सप्लायर चेन और दीर्घकालिक नीतिगत समर्थन शामिल है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ऐसे हब को विकसित होने में कई साल नहीं, बल्कि दशक लग जाते हैं।
भारत के मिशन में आया बड़ा बदलाव
भारत अब केवल वादों या योजनाओं तक सीमित नहीं है। अब हमारे पास तीन चालू पैकेजिंग प्लांट्स हैं और 2028 तक गुजरात के धोलेरा में देश का पहला कमर्शियल चिप फैब्रिकेशन प्लांट आने की उम्मीद है, जो साणंद से लगभग 50 किमी दूर स्थित है। यदि धोलेरा का फैब समय पर काम शुरू करता है, तो पहली बार भारतीय डिजाइन वाले चिप्स का फैब्रिकेशन और पैकेजिंग भारत में ही हो सकेगी। यह भारत के विशाल चिप डिजाइनिंग वर्कफोर्स के साथ मिलकर एक संपूर्ण इकोसिस्टम बनाने में मदद करेगा।
क्या आयात पर निर्भरता कम होगी और गैजेट्स सस्ते होंगे?
नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, भारत फिलहाल अपनी जरूरत का 90-95% सेमीकंडक्टर आयात करता है और केवल 5-10% का ही घरेलू उत्पादन होता है। स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग से आयात बिल तो कम होगा, लेकिन आने वाले समय में इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के दाम तुरंत कम होने की संभावना कम है, क्योंकि हमें कच्चा माल, विशेष गैसें और चिप बनाने वाले उपकरण अभी भी विदेशों से मंगवाने पड़ते हैं।
अभी भी कौन सी चुनौतियां बाकी हैं?
भारत के सामने अभी भी कई बड़ी बाधाएं हैं। हम अभी भी चिप मेकिंग उपकरण, स्पेशल केमिकल्स और अल्ट्रा-प्योर गैसों के आयात पर निर्भर हैं। साथ ही फैब्रिकेशन इंजीनियरों की कमी और उन्नत चिप मैन्युफैक्चरिंग के अनुभव की सीमा भी एक चुनौती है। नीति आयोग के फ्रंटियर टेक हब की जून 2026 की रिपोर्ट 'फ्यूचर ऑफ इंडियाज सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री' में कहा गया है कि हमारा इकोसिस्टम अभी भी शुरुआती चरण में है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि ताइवान जैसे प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में किसी भी तरह की रुकावट भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा क्षेत्र को प्रभावित कर सकती है, इसलिए घरेलू निर्माण रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। हमें कम से कम एक दशक तक निवेश जारी रखने और अमेरिका, जापान, यूरोपीय संघ तथा दक्षिण कोरिया के साथ साझेदारी मजबूत करने की आवश्यकता है, जबकि चीन के साथ प्रतिस्पर्धा भी बरकरार है।











