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स्क्रीन की लत से बच्चों में उभरे ऑटिज्म जैसे लक्षण, सात राज्यों के जिला केंद्रों में संसाधनों की कमी से अटकी थेरेपीपड़ताल
21 सित॰ 2026, 12:38 pm (3 मिनट पहले)· 0

स्क्रीन की लत से बच्चों में उभरे ऑटिज्म जैसे लक्षण, सात राज्यों के जिला केंद्रों में संसाधनों की कमी से अटकी थेरेपी

अत्यधिक स्क्रीन समय के कारण बच्चों में बोलने की देरी और सामाजिक अलगाव जैसे वर्चुअल ऑटिज्म के लक्षण तेजी से बढ़ रहे हैं, जबकि सरकारी हस्तक्षेप केंद्रों में कर्मचारियों और स्पष्ट दिशानिर्देशों का गहरा संकट बना हुआ है।

बच्चे ने रोना शुरू किया तो शांत कराने के लिए हाथ में स्मार्टफोन थमा दिया गया। खाना खाने में नखरे दिखाए तो स्क्रीन पर वीडियो चला दी गई। माता-पिता किसी काम में व्यस्त हुए तो बच्चे को बहलाने के लिए स्क्रीन चालू कर दी गई। कोविड के दौर और उसके बाद देश भर के लाखों परिवारों में यह रोजमर्रा का सामान्य तरीका बन गया। अब वही बच्चे जब उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं जहां उन्हें खुलकर बातचीत करनी चाहिए थी, तब कई परिवार उन्हें लेकर थेरेपी केंद्रों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

बच्चों में देर से बोलना, आंखों से संपर्क न बनाना, सामाजिक मेलजोल से पूरी तरह दूरी बना लेना और अत्यधिक चंचलता जैसे गंभीर लक्षण सामने आ रहे हैं। चिकित्सा विशेषज्ञ और थेरेपिस्ट इस स्थिति को 'वर्चुअल ऑटिज्म' के नाम से चिह्नित कर रहे हैं, जिसका सीधा अर्थ है कि अत्यधिक स्क्रीन समय की वजह से बच्चों के व्यवहार में ऑटिज्म से मिलते-जुलते लक्षण उभर आए हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश में 451 डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर यानी डीईआईसी संचालित हैं। इन केंद्रों पर कुल 32 प्रकार की स्वास्थ्य स्थितियों के लिए थेरेपी दी जाती है, मगर इस पूरी आधिकारिक सूची में वर्चुअल ऑटिज्म का नाम तक शामिल नहीं है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सहित छह राज्यों की राजधानियों में स्थित सरकारी जिला प्रारंभिक हस्तक्षेप केंद्रों की पड़ताल में लगभग एक जैसी बदहाली और भारी कमियां सामने आई हैं।

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मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में बंद पड़े हैं थेरेपी कक्ष

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित शासकीय जयप्रकाश जिला चिकित्सालय में संचालित डीईआईसी की पड़ताल करने पर पता चला कि अप्रैल 2026 से अगस्त 2026 के बीच यहां ऑटिज्म से पीड़ित 31 बच्चे पहुंचे थे। इन 31 बच्चों में से केवल एक ही मामले को वर्चुअल ऑटिज्म के रूप में दर्ज किया गया। केंद्र के पास ऐसा कोई अलग पैमाना या मूल्यांकन उपकरण ही उपलब्ध नहीं है जिससे वर्चुअल ऑटिज्म की स्वतंत्र पहचान की जा सके। ऐसी स्थिति में यह बड़ा सवाल उठता है कि उस अकेले मामले की पहचान किस आधार पर की गई होगी।

इस सरकारी केंद्र पर ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट, स्पेशल एजुकेटर, पीडियाट्रिक असिस्टेंट और ऑप्थैल्मिक असिस्टेंट के पद पिछले एक पूरे साल से खाली पड़े हैं। थेरेपिस्ट की तैनाती न होने के कारण विशेष रूप से तैयार किया गया सेंसर इंटीग्रेशन एरिया ताले में बंद पड़ा है। केंद्र प्रबंधक उज्ज्वल सिंह का कहना है कि राज्य सरकार को रिक्त पदों के संबंध में पूरी जानकारी भेजी जा चुकी है, लेकिन बीते एक साल में कोई नई नियुक्ति नहीं हुई है।

उज्ज्वल सिंह ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में उनके पास सामान्य ऑटिज्म और वर्चुअल ऑटिज्म के बीच अंतर पहचानने के लिए कोई तकनीकी साधन नहीं है और इस संदर्भ में स्पष्ट नीतिगत दिशानिर्देशों की बेहद जरूरत है। चूंकि दोनों ही स्थितियों के लक्षण बिल्कुल एक जैसे दिखाई देते हैं और जांच का पैमाना भी एक ही है, इसलिए वर्चुअल ऑटिज्म से प्रभावित बच्चे भी सामान्य ऑटिज्म के आंकड़ों में ही गिने जा रहे हैं। यह एक बेहद गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि विशेषज्ञों का मानना है कि वर्चुअल ऑटिज्म का समय पर उपचार संभव है, जबकि जन्मजात ऑटिज्म को कभी पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता।

डीईआईसी की मनोवैज्ञानिक डॉ नम्रता दुबे ने बताया कि ओपीडी और फॉलोअप में आने वाले बच्चों की भारी तादाद और कर्मचारियों की कमी के कारण किसी भी बच्चे को सप्ताह में कई बार बुलाना संभव नहीं हो पाता। इसी मजबूरी के चलते बच्चों का फॉलोअप 15 दिन या एक महीने के लंबे अंतराल पर किया जाता है। यदि केंद्र में पूरे कर्मचारी मौजूद हों और बच्चे को समय पर उचित थेरेपी मिलने लगे, तो उनकी स्थिति में तेजी से सुधार आ सकता है।

निजी केंद्रों में लॉकडाउन के बाद मामलों में भारी उछाल

सरकारी व्यवस्था के बाद निजी क्षेत्र में चल रहे निदान और थेरेपी केंद्रों की स्थिति समझने के लिए भोपाल के रवि केंद्र का जायजा लिया गया। यह केंद्र तृप्ति मंगल द्वारा संचालित किया जाता है, जो पिछले 15 वर्षों से ऑटिज्म के क्षेत्र में सक्रिय हैं और जिनकी अपनी बेटी भी ऑटिज्म से प्रभावित है।

तृप्ति मंगल ने स्थिति की गंभीरता साझा करते हुए कहा, “लॉकडाउन से पहले हमारे पास साल भर में वर्चुअल ऑटिज्म के आठ से 15 नए मामले आते थे। लॉकडाउन के बाद हर महीने 30 से 40 मामले आने लगे।” उन्होंने आगे बताया कि कुछ मामलों की स्थिति बेहद चिंताजनक थी। कई बच्चे खुद को पीटने, नोंचने या काटने लगे थे और दूसरों को भी चोट पहुंचाने लगे थे। एक बच्चे से जब फोन छीना गया तो उसने गुस्से में थेरेपिस्ट का सिर तक फोड़ दिया था।

इसी निजी केंद्र पर आठ साल की बच्ची मायरा भी इलाज के लिए पहुंची थी। मायरा के जन्म के अगले ही दिन उसकी मां का देहांत हो गया था, जिसके बाद उसकी बुआ ने ही उसका लालन-पालन किया। मायरा जब भी रोती, उसे चुप कराने के लिए मोबाइल फोन पकड़ा दिया जाता और वह तुरंत शांत हो जाती। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि वह दो साल की उम्र तक एक शब्द भी नहीं बोली। जब वह छह साल की हुई तब परिजनों ने उसकी थेरेपी शुरू करवाई। जिस फोन ने कभी मायरा को चुप कराया था, आज उसके परिवार के लिए उसे स्क्रीन से दूर रखना सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।

ऐसी ही दास्तान बच्ची सोना की भी है। उसकी मां बताती हैं कि सोना जब तक दो साल की थी, तब तक वह पूरी तरह सामान्य थी। घरवाले उसे जो भी शब्द सिखाते, वह उन्हें आसानी से दोहराती थी। इसके बाद उसे फोन देखने का चस्का लग गया और परिवार में किसी ने उसे टोका भी नहीं। देखते ही देखते जब सोना दो साल सात महीने की हुई, तो उसने अचानक बोलना ही बंद कर दिया। तीन साल की उम्र होने पर परिजन उसे डॉक्टर के पास लेकर पहुंचे। अब वह रोज थेरेपी के लिए केंद्र आती है, लेकिन फिलहाल वह केवल वही गिने-चुने शब्द दोहरा पाती है जो उसने फोन से सुने थे।

राजस्थान की राजधानी जयपुर में कागजों में सिमटा केंद्र

राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि जयपुर के जेके लोन अस्पताल में एक डीईआईसी स्थापित है। हालांकि जब धरातल पर जाकर पड़ताल की गई, तो पाया गया कि यह केंद्र वास्तविक रूप से काम ही नहीं कर रहा है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार उन्हें सरकार से केंद्र शुरू करने का पत्र जरूर मिल चुका है, मगर जमीन पर शुरुआत नहीं हो सकी है।

प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य निदेशक डॉ मधु रितेश्वर ने बताया कि राजस्थान के करीब 23 स्थानों पर डीईआईसी को किसी न किसी स्वरूप में क्रियाशील बनाने के प्रयास चल रहे हैं। इनमें से करीब आठ स्थानों पर इमारतें बनकर तैयार हैं और वर्तमान में उनका हैंडओवर लेने की कागजी प्रक्रिया बाकी है।

अस्पताल में ऑटिज्म पर काम कर रहीं ऑडियोलॉजिस्ट और स्पीच थेरेपिस्ट ट्विंकल का कहना है कि पूरे राजस्थान से उनके पास वर्चुअल ऑटिज्म से पीड़ित बड़ी संख्या में बच्चे पहुंच रहे हैं। इन बच्चों की अत्यधिक चंचलता और हाइपरएक्टिविटी को नियंत्रित करने के लिए सबसे पहले उन्हें ऑक्यूपेशनल थेरेपी दी जाती है।

बिहार की राजधानी पटना में दो कमरों में चलता केंद्र, बुनियादी ढांचा नदारद

बिहार की राजधानी पटना स्थित गुरु गोबिंद सिंह अस्पताल में संचालित डीईआईसी महज दो कमरों में सिमटा हुआ है, जिसका सीधा मतलब है कि वहां न तो बच्चों के लिए पर्याप्त जगह है और न ही आवश्यक संसाधन। केंद्र प्रबंधक डॉ रविशंकर सिन्हा ने बताया कि साल 2024 के बाद से यहां न तो कोई ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट तैनात किया गया है और न ही कोई स्पेशल एजुकेटर मौजूद है। डॉ सिन्हा ने कहा कि थेरेपी के लिए जिन बेहद जरूरी चीजों की दरकार होती है, वह तक केंद्र में उपलब्ध नहीं हैं। संवेदी बगीचा यानी सेंसरी गार्डन और ऑडियोलॉजी कक्ष न होने के कारण बच्चों को उचित थेरेपी नहीं दी जा पा रही है और इस पूरे मामले से संबंधित विभाग को अवगत कराया जा चुका है।

पटना के नालंदा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में भी डीईआईसी के लिए स्थान निर्धारित किया गया था, लेकिन वर्तमान समय में उस जगह पर कैंसर के मरीजों का इलाज किया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हर रोज पहुंच रहे 5 से 10 नए मामले

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में यह प्रारंभिक हस्तक्षेप केंद्र किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी यानी केजीएमयू परिसर में स्थापित है। केंद्र प्रबंधक गौरव सक्सेना के मुताबिक यहां सात कर्मचारियों का स्टाफ तैनात है और अधिकांश प्राथमिक सुविधाएं मरीजों के लिए उपलब्ध हैं।

केजीएमयू के मनोवैज्ञानिक डॉ अमित आर्य ने बताया कि बाल ओपीडी में प्रतिदिन 70 से 80 बच्चे जांच के लिए पहुंचते हैं। इनमें से औसतन 20 बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण पाए जाते हैं, जबकि पांच से 10 मामले सीधे तौर पर वर्चुअल ऑटिज्म के लक्षणों से जुड़े होते हैं।

गुजरात के गांधीनगर में लगातार दूसरे साल बढ़ रहे मरीज

गुजरात की राजधानी गांधीनगर स्थित डीईआईसी में आठ साल की एक बच्ची अपने माता-पिता के साथ इलाज के लिए आई थी। बच्ची के पिता तुषार भारतीय हैं, जबकि उसकी मां यूक्रेन की रहने वाली हैं। तुषार ने बताया कि उनकी बेटी का जन्म साल 2019 में हुआ था। उस समय कोरोना महामारी का दौर चल रहा था और लॉकडाउन के कारण कोई भी बाहर नहीं जा सकता था। बच्ची पूरे दिन घर में बैठकर मोबाइल फोन देखती रहती थी। इसी अत्यधिक स्क्रीन एक्सपोजर की वजह से उसमें वर्चुअल ऑटिज्म की समस्या बहुत ज्यादा बढ़ गई।

केंद्र की प्रबंधक डॉ पूजा पटेल के अनुसार यहां जरूरी स्टाफ उपलब्ध है। मनोवैज्ञानिक शिखा शुक्ला ने बताया कि बीते दो वर्षों से केंद्र पर वर्चुअल ऑटिज्म के मरीजों की आमद में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उन्होंने कहा कि वे अभिभावकों को मनो-शिक्षा दे रहे हैं कि यदि शुरुआती दौर में ही बच्चे पर ध्यान देकर हस्तक्षेप शुरू कर दिया जाए, तो उसके व्यवहार और सीखने की क्षमता में बहुत बड़ा सुधार आ सकता है।

दिल्ली में कोविड के बाद मामलों में 40 से 50 प्रतिशत तक की वृद्धि

देश की राजधानी दिल्ली में कुल तीन डीईआईसी काम कर रहे हैं, जिनमें से एक गुरु गोबिंद सिंह सरकारी अस्पताल में स्थित है। इस केंद्र की प्रबंधक डॉ अनीता पंडित हैं। केंद्र से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता ट्विंकल ने बताया कि कोविड-19 महामारी के बाद से वर्चुअल ऑटिज्म के मामलों में 40 से 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यहां हर रोज छह से सात ऐसे बच्चे पहुंच रहे हैं। उन्होंने कहा कि अक्सर माता-पिता इस गलतफहमी में बैठे रहते हैं कि उनका बच्चा आगे चलकर अपने आप बोलना शुरू कर देगा, लेकिन वास्तविकता में हर बार ऐसा नहीं होता।

दिल्ली के इस केंद्र पर वर्तमान में सात कर्मचारी कार्यरत हैं, जबकि सुचारू रूप से कार्य करने के लिए कम से कम 10 कर्मियों की आवश्यकता है। ट्विंकल के अनुसार यहां विशेष रूप से स्पीच थेरेपिस्ट, स्पेशल एजुकेटर और बाल रोग विशेषज्ञों की भारी किल्लत बनी हुई है।

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में नायर अस्पताल में हस्तक्षेप केंद्र

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में कोई स्वतंत्र डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर स्थापित नहीं है, लेकिन बृहन्मुंबई नगर निगम यानी बीएमसी शहर के नायर अस्पताल में एक अर्ली इंटरवेंशन केंद्र का संचालन करता है। इसके अलावा दक्षिण मुंबई के नागपाड़ा इलाके में बच्चों के लिए अर्ली इंटरवेंशन एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर मौजूद है।

नागपाड़ा केंद्र की प्रमुख डॉ सुरभि राठी ने बताया कि उनके यहां प्रतिदिन लगभग 120 बच्चे उपचार के लिए आते हैं। डॉ राठी ने विस्तार से बताते हुए कहा कि वर्चुअल ऑटिज्म एक नई अवधारणा है, इसलिए अभी बहुत सीमित मामले ही अलग से दर्ज किए जा रहे हैं। केंद्र में आने वाले हर 10 बच्चों में से एक बच्चा वर्चुअल ऑटिज्म से जुड़ा हो सकता है। फिलहाल इसे अलग श्रेणी के तहत दर्ज नहीं किया जा रहा है, लेकिन भविष्य में इसका अलग ब्योरा और रिकॉर्ड रखने की योजना बनाई जा रही है।

31 देशों में लागू हैं बच्चों के स्क्रीन समय से जुड़े नियम

इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के दिशानिर्देशों के अनुसार दो साल की उम्र तक के नन्हे बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखा जाना चाहिए। भारत सहित दुनिया के 31 देशों में बच्चों के स्क्रीन समय को सीमित करने के लिए बाकायदा नियम और दिशा-निर्देश तय किए गए हैं।

भोपाल के उम्मीद चाइल्ड डेवलपमेंट सेंटर्स के निदेशक डॉ जफर मीनई का कहना है कि प्रारंभिक पहचान के लिए माता-पिता को चार प्रमुख संकेतों पर पैनी नजर रखनी चाहिए। पहला यह कि क्या बच्चे ने बोलना शुरू करने के तीन से चार महीने बाद अचानक बोलना बंद कर दिया है? दूसरा, क्या बच्चा अपनी बात कहने के लिए बोलने के बजाय इशारों का सहारा ले रहा है? तीसरा, क्या बच्चा अपनी ही धुन में खोया रहता है और आसपास के माहौल पर ध्यान नहीं देता? चौथा, क्या 18 महीने की उम्र पार करने के बाद भी बच्चा 'रुको', 'बैठ जाओ' या 'ऐसा मत करो' जैसे बेहद सामान्य निर्देशों को समझने में असमर्थ है?

मेदांता मेडिसिटी की निदेशक डॉ नीलम मोहन वर्तमान में इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की अध्यक्ष हैं और वे वर्षों से वर्चुअल ऑटिज्म के विषय पर शोध व कार्य कर रही हैं। उनका मानना है कि जन-जागरूकता फैलाने के लिए व्यापक राष्ट्रीय नीतियां बनाई जानी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इस गंभीर मुद्दे को नीति आयोग की आगामी बैठकों में प्रमुखता से उठाएंगी। इस पड़ताल में उत्तर प्रदेश से विकास श्रीवास्तव, राजस्थान से सौरभ, बिहार से रंजीत, दिल्ली से राजीव नयन चतुर्वेदी, गुजरात से दीपक और महाराष्ट्र से संतोष गायकवाड़ ने क्षेत्रीय जानकारी उपलब्ध कराई।

सवाल-जवाब

वर्चुअल ऑटिज्म क्या है और यह क्यों होता है?
यह बच्चों में अत्यधिक स्क्रीन समय के कारण ऑटिज्म जैसे लक्षण, जैसे बोलने में देरी और सामाजिक दूरी, उत्पन्न होने की स्थिति है।
वर्चुअल ऑटिज्म और सामान्य ऑटिज्म में क्या अंतर है?
विशेषज्ञों के अनुसार वर्चुअल ऑटिज्म थेरेपी और स्क्रीन बंद करने से ठीक हो सकता है, जबकि सामान्य ऑटिज्म एक स्थायी स्थिति है।
इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार बच्चों के लिए स्क्रीन गाइडलाइन क्या है?
गाइडलाइन के मुताबिक दो वर्ष की उम्र तक के बच्चों को किसी भी तरह की स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखा जाना चाहिए।
माता-पिता को किन लक्षणों पर तुरंत ध्यान देना चाहिए?
यदि बच्चा बोलने के बाद अचानक बोलना बंद कर दे, इशारों से बात करे, अपनी धुन में रहे या 18 महीने पर निर्देश न समझे, तो सचेत हो जाएं।
क्या सरकारी डीईआईसी में वर्चुअल ऑटिज्म का अलग से इलाज उपलब्ध है?
नहीं, वर्तमान में सरकारी केंद्रों की 32 स्वीकृत स्वास्थ्य स्थितियों में वर्चुअल ऑटिज्म शामिल नहीं है और न ही इसकी अलग जांच का कोई टूल है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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