झारखंड की राजधानी रांची में कारीगर कपड़े निर्माण के क्षेत्र में एक अनोखी मिसाल पेश कर रहे हैं। बांस के धागे से बनाई जा रही साड़ियां और सलवार सूट अपनी खासियतों की वजह से लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। केवल 100 ग्राम वजन वाली यह पोशाकें पहनने में रुई की तरह बेहद हल्की और मुलायम महसूस होती हैं। पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ यह कपड़ा ठंड के मौसम में शरीर को प्राकृतिक रूप से गर्माहट भी प्रदान करता है।
पारंपरिक चित्रकारी और आधुनिक पहनावे का संगम
बांस के फाइबर से तैयार होने वाले इन कपड़ों पर झारखंड की प्रसिद्ध सोहराय और महाराष्ट्र की वरली पेंटिंग उकेरी जाती है। यह कलात्मक डिजाइन कुर्ती, सलवार सूट और साड़ियों के सौंदर्य में चार चांद लगा देता है। महिलाओं के पहनावे के अलावा यहां पुरुषों के लिए भी बांस के धागे से थान का कपड़ा तैयार किया जाता है, जिससे वे अपनी पसंद के अनुसार पैंट और शर्ट सिलवा सकते हैं। सुंदर बनावट और आरामदायक फैब्रिक के कारण इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
पूरी तरह हाथों से तैयार होती है हर पोशाक
कपड़ा निर्माण से जुड़े मोहम्मद सिराज के अनुसार, इन पोशकों की पूरी निर्माण प्रक्रिया हस्तनिर्मित होती है। इसमें किसी भी तरह की मशीनरी का इस्तेमाल नहीं किया जाता। धागा तैयार करने से लेकर पेंटिंग करने और कपड़े की सिलाई तक का सारा काम कारीगर अपने हाथों से करते हैं। एक सलवार सूट को तैयार करने में 4 से 5 कारीगरों को लगभग तीन से चार दिन का समय लग जाता है। बारीकी से किए जाने वाले इस काम के कारण ही यह फैब्रिक काफी टिकाऊ और गुणवत्तापूर्ण होता है।
देशभर में भारी मांग और कीमत का दायरा
हैंडमेड तकनीक और बांस के प्राकृतिक गुणों के चलते इन परिधानों की कीमत 1,200 रुपये से शुरू होकर 10,000 रुपये तक जाती है। इस विशेष कपड़े की मांग केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में इसके खरीदार मौजूद हैं। कई बार मांग इतनी ज्यादा बढ़ जाती है कि सामान आउट ऑफ स्टॉक हो जाता है। एक बार इस कपड़े का इस्तेमाल करने वाले ग्राहक इसके आराम और हल्केपन के कारण बार-बार इसे खरीदने के लिए लौटते हैं।



















